मेवाड़ की ऐतिहासिक धरा पर अनगिनत प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर स्थापित हैं, जिनकी कहानियां पराक्रम और अटूट श्रद्धा की मिसाल पेश करती हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध स्थान राजसमंद जिले में देवगढ़ और आमेट की सीमा के पास अरावली की श्रृंखलाओं के बीच स्थित है, जिसे सीम माता मंदिर के रूप में जाना जाता है। लगभग 800 वर्षों के प्राचीन इतिहास को अपने आंचल में समेटे इस पावन धाम तक पहुंचना आसान नहीं है, क्योंकि भक्तों को यहां तक आने के लिए दुर्गम रास्तों और सात पहाड़ियों को पार करना पड़ता है। जमीन के धरातल से लगभग 1000 फीट की ऊंचाई पर विराजमान यह देवी स्थल आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए गहरी आस्था का बड़ा केंद्र है, और विशेषकर नवरात्रि के पावन पर्व पर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।
सीमाओं पर विराजने के कारण पड़ा नाम और भौगोलिक स्थिति
अरावली की प्राकृतिक हरियाली और पथरीली वादियों के बीच घिरे इस मंदिर का नामकरण भी इसकी भौगोलिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। लोक मान्यताओं के अनुसार, यह माता कुल पांच गांवों की सीमाओं के मध्य विराजमान हैं, जिसके कारण इन्हें सीम माता पुकारा जाता है। इन पहाड़ियों का रास्ता काफी कठिन और संकरा है, फिर भी माता के प्रति अटूट विश्वास रखने वाले श्रद्धालु हर बाधा को पार करके यहां पहुंचते हैं। इस स्थान से जुड़ी एक और अनोखी जनश्रुति काफी प्रसिद्ध है, जिसके मुताबिक साल में एक बार पूरी पहाड़ी का रंग बदलकर बिल्कुल सोने जैसा चमकने लगता है। इस दुर्लभ और अद्भुत प्राकृतिक दृश्य को देखने के लिए भी लोग खासे उत्साहित रहते हैं और इस अनोखे पल के साक्षी बनना चाहते हैं.
मुगलकाल और मेवाड़ के इतिहास से जुड़ा गौरवशाली संबंध
सीम माता का यह धाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इसका सीधा नाता मेवाड़ के वीरतापूर्ण इतिहास से भी जोड़ा जाता है। परंपराओं और किंवदंतियों के अनुसार, जब मुगलकाल के दौरान विभिन्न रियासतों पर लगातार आक्रमण हो रहे थे, तब स्थानीय ठाकुर परिवारों ने अपनी कुलदेवी और आराध्य से अपनी रक्षा की गुहार लगाई थी। ऐसी मान्यता है कि कमेरी गांव के ठाकुर प्रताप सिंह चुण्डावत और उनके पूरे परिवार की युद्ध के विकट समय में माता ने प्रत्यक्ष रूप से सहायता की थी। किंवदंतियों में यह भी कहा जाता है कि माता अपने भक्त ठाकुर प्रताप सिंह को साक्षात दर्शन देती थीं। युद्ध के उस कालखंड में माता द्वारा उपहार स्वरूप दी गई तलवार आज भी इस मंदिर में सुरक्षित रखी हुई है, जिसे देखने और नमन करने दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं.
पीढ़ियों से चली आ रही सेवा और नवरात्र का उल्लास
इस ऐतिहासिक मंदिर की एक अन्य अनूठी विशेषता इसकी प्राचीन पूजा परंपरा से जुड़ी हुई है। यहां किसी अन्य समिति या बाहरी पुजारी के बजाय एक ही गुर्जर परिवार की दसवीं पीढ़ी लगातार माता की सेवा और पूजा-अर्चना करती आ रही है। मंदिर के वर्तमान पुजारी भगवान लाल गुर्जर ने इस स्थल के गौरवशाली इतिहास और चली आ रही परंपराओं के बारे में विस्तार से बताया है। सदियों से चली आ रही यह निरंतर सेवा इस बात की गवाही देती है कि स्थानीय लोगों की इस मंदिर के प्रति कितनी गहरी और अटूट आस्था है। साल में आने वाले दोनों प्रमुख नवरात्र यानी चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां नौ दिनों तक भारी चहल-पहल रहती है और भक्तजन माता के चरणों में हाजिरी लगाकर अपने परिवार के लिए सुख, समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं। मेवाड़ की इस पावन शक्तिपीठ में इतिहास, संस्कृति और लोकविश्वास का अनूठा संगम आज भी जीवंत नजर आता है.




















