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ऊंटों के रिसाले से आधुनिक पैदल सेना तक: जयपुर में 13 ग्रेनेडियर्स ने मनाया 561 वर्षों का शौर्यराजस्थान
5 अक्तू॰ 2026, 3:33 pm (36 मिनट पहले)· 0

ऊंटों के रिसाले से आधुनिक पैदल सेना तक: जयपुर में 13 ग्रेनेडियर्स ने मनाया 561 वर्षों का शौर्य

जयपुर में भारतीय सेना की 561 वर्ष पुरानी सैन्य इकाई 13 ग्रेनेडियर्स 'गंगा जैसलमेर रीसाला' ने अपनी गौरवशाली विरासत और युद्ध अभियानों को याद किया.

भारतीय सेना की सबसे पुरानी और अनुभवी सैन्य टुकड़ियों में शामिल 13 ग्रेनेडियर्स 'गंगा जैसलमेर रीसाला' ने 3 अक्टूबर को जयपुर में अपनी 561 वर्ष पुरानी गौरवशाली परंपरा और अदम्य साहस को याद किया। वर्ष 1465 से चली आ रही इस ऐतिहासिक सैन्य इकाई की जड़ें रेगिस्तानी युद्ध कौशल से जुड़ी हैं। इस बटालियन में सेवा देने वाले सैनिकों का एक बड़ा हिस्सा राजस्थान के सीकर, झुंझुनू और नागौर जिलों से आता है, जो पीढ़ियों से इस रेजिमेंट का मान बढ़ाते रहे हैं।

ऊंटों की टुकड़ी से स्टैंडर्ड इन्फेंट्री तक का सफर

इस ऐतिहासिक सैन्य इकाई की शुरुआत मूल रूप से ऊंटों पर सवार होकर थार के बीहड़ों में रेगिस्तानी युद्ध लड़ने वाली एक विशेष टुकड़ी के रूप में हुई थी। समय बदलने के साथ-साथ युद्ध नीतियों और रक्षा तकनीक में भी बदलाव आया, जिसके चलते इस रिसाले का स्वरूप भी आधुनिक रूप लेता गया। आज यह इकाई भारतीय सेना की एक बेहद सशक्त स्टैंडर्ड इन्फेंट्री बटालियन के रूप में अपनी सेवाएं दे रही है और देश की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभा रही है।

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1965 और 1971 के युद्धों में अदम्य पराक्रम

इस बटालियन के नाम सीमा सुरक्षा के कई अविस्मरणीय अध्याय दर्ज हैं। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इस बटालियन ने प्रसिद्ध तनोट माता मंदिर की रक्षा की थी और सांचू तथा साधेवाला की अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य चौकियों को अपने कब्जे में लिया था। इसके बाद 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी इकाई ने शानदार पराक्रम दिखाया। सैनिकों ने सीमा पार करते हुए पाकिस्तान के लगभग 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अधिकार जमाया और रणहाल तथा बिजनोट जैसे रणनीतिक स्थानों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।

तीन पीढ़ियों का जुड़ाव और राज्यवर्धन राठौड़ का संदेश

जयपुर में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में सैनिक कल्याण मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। कर्नल राठौड़ का इस बटालियन के साथ गहरा पारिवारिक नाता है, क्योंकि उनके परिवार की तीन पीढ़ियों ने इस गौरवशाली रिसाले में सेवाएं दी हैं। उनका यह संबंध प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर 1965 तथा 1971 के ऐतिहासिक युद्धों तक फैला रहा है। बटालियन के शौर्य, परंपरा और बलिदान को नमन करते हुए कर्नल राठौड़ ने रेखांकित किया कि ऐसी गौरवमयी सैन्य विरासत महज इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली नई पीढ़ियों के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत है।

सवाल-जवाब

13 ग्रेनेडियर्स 'गंगा जैसलमेर रीसाला' कितनी पुरानी सैन्य इकाई है?
यह 561 वर्ष पुरानी सैन्य इकाई है, जिसकी शुरुआत 1465 में हुई थी और यह भारतीय सेना की सबसे पुरानी इकाइयों में से एक है.
इस बटालियन में ज्यादातर सैनिक किन क्षेत्रों से आते हैं?
इस बटालियन के सैनिकों में एक बड़ी संख्या राजस्थान के सीकर, झुंझुनू और नागौर जिलों से आती है.
1965 के भारत-पाक युद्ध में इस बटालियन की क्या भूमिका थी?
बटालियन ने तनोट माता मंदिर की रक्षा की थी और सांचू तथा साधेवाला की महत्वपूर्ण सैन्य चौकियों पर नियंत्रण स्थापित किया था.
1971 के युद्ध में 13 ग्रेनेडियर्स ने कौन से रणनीतिक इलाके जीते थे?
बटालियन ने पाकिस्तान के लगभग 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा किया और रणहाल व बिजनोट जैसे अहम स्थान अपने नियंत्रण में लिए थे.
कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का इस बटालियन से क्या संबंध है?
कर्नल राठौड़ के परिवार की तीन पीढ़ियों ने इस रिसाले में प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर 1965 और 1971 के युद्धों तक सेवाएं दी हैं.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 मिनट पहले

1465 से चली आ रही इस यूनिट का इतिहास और 1965-71 के युद्धों में इनके पराक्रम की कहानियां सचमुच रोंगटे खड़े कर देती हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·6 मिनट पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा। 1465 से आज तक का सफर वाकई अद्भुत है और तनोट माता मंदिर वाली बात पढ़कर सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

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