जयपुर के स्थानीय निकाय चुनावों में इस बार एक अनूठा और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से निर्वाचन आयोग को सौंपे गए शपथ-पत्रों में सोने के गहनों की कीमतें एक-दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खा रही हैं। बाजार में कीमती धातुओं के दाम आम तौर पर एक जैसे होते हैं, लेकिन चुनावी दस्तावेजों में हर प्रत्याशी ने अपने ही हिसाब से सोने का मूल्यांकन कर डाला है। आलम यह है कि शहर के अलग-अलग वार्डों से ताल ठोक रहे नेताओं के दस्तावेजों में प्रति तोला सोने का भाव 1.10 लाख रुपये से शुरू होकर 1.60 लाख रुपये तक पहुंच गया है। इस अंतर की वजह से संपत्ति के ब्योरे को लेकर काफी चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों के दस्तावेजों में भारी अंतर
सत्तारूढ़ दल से जुड़े कई उम्मीदवारों के हलफनामों में सोने के अलग-अलग दाम देखने को मिले हैं। वार्ड 9 की मंजू अग्रवाल ने अपने दस्तावेजों में 20 तोला सोना दर्शाया है, जिसकी कुल कीमत 32 लाख रुपये आंकी गई है, यानी उनके यहां प्रति तोला भाव 1.60 लाख रुपये बैठा। इसी तरह वार्ड 6 की स्नेहलता साबू ने 5 तोला सोने का मूल्य 7 लाख रुपये यानी 1.40 लाख रुपये प्रति तोला दर्ज किया। वार्ड 19 के शाहनवाज ने ढाई तोला सोने के लिए 3.50 लाख रुपये यानी 1.40 लाख रुपये प्रति तोला का भाव लिखा। वार्ड 110 की ज्योति खंडेलवाल ने 45 तोला सोना 65 लाख रुपये का बताया, जो करीब 1.44 लाख रुपये प्रति तोला पड़ता है। इसके अलावा वार्ड 21 के अजय सिंह चौहान ने डेढ़ तोला सोना 2 लाख रुपये यानी 1.33 लाख रुपये प्रति तोला और वार्ड 42 के अशोक रावतानी ने साढ़े तीन तोला सोना 5.14 लाख रुपये यानी 1.47 लाख रुपये प्रति तोला के हिसाब से घोषित किया है।
कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशियों के ब्योरे में भी कीमतों की विविधता
कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों की ओर से दाखिल किए गए हलफनामे भी इस मामले में पीछे नहीं रहे और उनमें भी ऐसा ही विरोधाभास नजर आया। वार्ड 4 की कविता ने 2 तोला सोना 2.20 लाख रुपये में दिखाया, जिसके हिसाब से प्रति तोला कीमत महज 1.10 लाख रुपये बैठती है जो कि सबसे कम दामों में से एक है। वार्ड 18 की वंदिता शर्मा ने चार तोला सोने का मूल्य 6 लाख रुपये यानी डेढ़ लाख रुपये प्रति तोला दर्ज किया। इसी क्रम में वार्ड 110 की सुनीता मेठी ने सबसे अधिक 70 तोला सोना 105 लाख रुपये का बताया, जिसका औसत भी 1.50 लाख रुपये प्रति तोला रहा। वहीं वार्ड 85 के महेंद्र पाल ने 10 तोला सोने के लिए 16.30 लाख रुपये यानी 1.63 लाख रुपये प्रति तोला का सबसे ऊंचा भाव दर्ज किया। वार्ड 53 के राजीव चौधरी ने साढ़े चार तोला सोना 6 लाख रुपये यानी 1.33 लाख रुपये प्रति तोला और वार्ड 60 के रामफूल ने ढाई तोला सोना 4 लाख रुपये यानी 1.60 लाख रुपये प्रति तोला के भाव से हलफनामे में शामिल किया।
निर्दलीय उम्मीदवारों के हलफनामों का हाल
किसी भी राजनीतिक दल का ठप्पा न लगाकर मैदान में उतरे निर्दलीय प्रत्याशियों के दस्तावेजों में भी सोने की कीमतों को लेकर भारी उतार-चढ़ाव दिखाई दिया। वार्ड 15 के पंकज गोयल ने आधा तोला सोना 75 हजार रुपये में दिखाया, जिससे प्रति तोला कीमत डेढ़ लाख रुपये बनती है। वार्ड 101 के मनोज मुद्गल ने पांच तोला सोने का मूल्य 7.50 लाख रुपये यानी डेढ़ लाख रुपये प्रति तोला घोषित किया। इसके अलावा वार्ड 54 के राजेंद्र पटेल ने 1.8 तोला सोना 2.79 लाख रुपये में दर्ज किया, जो प्रति तोला 1.55 लाख रुपये बैठता है। इन सभी आंकड़ों से साफ है कि बाजार के मानक दामों को दरकिनार कर उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति के आकलन में अलग-अलग पैमानों का इस्तेमाल किया है।
बाजार भाव और चुनावी दस्तावेजों के आंकड़ों में बड़ा फासला
नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तारीख यानी 31 अगस्त के आसपास बाजार में मानक सोने का भाव करीब 1,59,000 रुपये प्रति तोला और आभूषण वाला सोना करीब 1,45,500 रुपये प्रति तोला के आसपास चल रहा था। इसके बावजूद प्रत्याशियों के दस्तावेजों में 1.10 लाख रुपये से लेकर 1.63 लाख रुपये तक का भारी अंतर देखने को मिला। वित्तीय और राजनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि संपत्ति के ब्योरे में बाजार मूल्य के करीब की राशि दर्शाना अनिवार्य होता है, लेकिन कई बार कागजी कार्रवाई के दौरान पुराने अनुमानित भाव या मनमाने आंकड़े लिख दिए जाते हैं।
चुनावी प्रक्रिया और मतदाताओं के बीच चर्चा का नया विषय
यह अनोखा विरोधाभास अब आम जनता और चुनाव प्रबंधन से जुड़े लोगों के बीच कौतूहल का विषय बन गया है। इस तरह के शपथ-पत्र मुख्य रूप से संपत्ति और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए लाए जाते हैं, लेकिन जब एक ही शहर के भीतर एक ही समय पर सोने की कीमत में इतनी भिन्नता नजर आए, तो सवाल उठना लाजिमी है। चुनावी दंगल में आमने-सामने खड़े ये नेता मैदान के बाहर अपने कागजों में भी अलग-अलग रास्ते चुनते नजर आ रहे हैं। अब मतदाता भी इस बात पर गौर कर रहे हैं कि उनके वार्ड से खड़े होने वाले प्रतिनिधि ने अपनी संपत्ति का हिसाब किस तरह लगाया है और वह असल बाजार की स्थिति से कितना मेल खाता है।





















