नोएडा के सेक्टर 126 क्षेत्र में स्थित सुपरनोवा बहुमंजिला इमारत से गिरकर जान गंवाने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर संभव जैन का मामला सिर्फ एक आकस्मिक दुर्घटना या आत्महत्या की सामान्य घटना नहीं है। पुलिस की शुरुआती छानबीन और उनके परिजनों से मिली विस्तृत जानकारियों के आधार पर यह घटना ऐसे कई गंभीर सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक सवालों को सामने लाती है, जिन पर आधुनिक समाज को गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। एक ऐसा युवा पिता जिसके घर में कुछ ही समय पहले पहली संतान की किलकारी गूंजी थी, वह अचानक अपने नवजात के महंगे मेडिकल उपचार, सिर पर लदे भारी कर्ज, गंभीर शारीरिक अस्वस्थता और बिखरते दांपत्य जीवन के बेहद कठिन चक्रव्यूह में घिर गया था। जिंदगी के इन तमाम मोर्चों पर एक साथ जूझते हुए संभव जैन का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिखर गया और अंततः उन्होंने यह आत्मघाती कदम उठा लिया।
नवजात के इलाज का भारी आर्थिक बोझ और मेडिकल चुनौतियां
पारिवारिक पृष्ठभूमि और पुलिस जांच के अनुसार, संभव जैन का विवाह वर्ष 2024 में संपन्न हुआ था। इसके बाद वर्ष 2025 में उनके दांपत्य जीवन में बेटे का आगमन हुआ। बच्चे के आने की यह खुशी परिवार में अधिक दिनों तक नहीं टिक सकी, क्योंकि शिशु का जन्म समय से पूर्व यानी प्रीमैच्योर डिलीवरी के रूप में हुआ था। जन्म के तुरंत बाद से ही बच्चे की शारीरिक स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई थी, जिसके चलते उसे लंबे समय तक अस्पताल के आईसीयू और निरंतर गहन चिकित्सीय देखरेख में रखना पड़ा।
परिजनों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, बच्चे की जान बचाने और उसके निरंतर उपचार में अब तक लगभग 40 लाख रुपये की भारी भरकम रकम खर्च हो चुकी थी। इसके बाद भी बच्चे का इलाज जारी था और लगातार चिकित्सीय खर्च का मीटर तेजी से घूम रहा था। किसी भी संवेदनशील पिता के लिए अपने कलेजे के टुकड़े को अस्पताल के जीवन रक्षक उपकरणों के बीच दर्द से तड़पते देखना और उसी समय इलाज के लाखों रुपयों की व्यवस्था करने के लिए चारों तरफ हाथ-पैर मारना एक ऐसा असहनीय बोझ बन जाता है, जो अंदर ही अंदर इंसान को तोड़कर रख देता है। संभव भी इसी दोहरी मानसिक और आर्थिक पीड़ा से हर रोज गुजर रहे थे।
वैवाहिक विवाद, अदालती मुकदमा और अलगाव का समझौता
घर में नवजात के आगमन और उसके गंभीर इलाज के तनाव के बीच संभव की व्यक्तिगत जिंदगी में भी दरारें आनी शुरू हो गई थीं। बच्चे के जन्म के महज कुछ महीनों के भीतर ही संभव और उनकी पत्नी के बीच मतभेद गहराने लगे। आपसी विवाद इतना बढ़ गया कि मामला सुलझने की बजाय सीधे तलाक की दहलीज पर पहुंच गया और पत्नी द्वारा अदालत में विधिवत कानूनी मुकदमा दायर कर दिया गया।
नोएडा के थाना सेक्टर 126 के प्रभारी सुमनेश कुमार के अनुसार, दोनों पक्षों के मध्य विवाद को निपटाने के लिए 15 लाख रुपये की राशि पर आपसी सेटलमेंट तय हुआ था। इस निर्धारित रकम में से संभव जैन ने लगभग 7 लाख रुपये की पहली किस्त अदा भी कर दी थी, जबकि लगभग 7.50 लाख रुपये का भुगतान बाकी था। घटना के बाद सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर इस मामले को लेकर तरह-तरह के अपुष्ट दावे किए जा रहे थे, जिनमें सेटलमेंट की राशि 3 करोड़ रुपये तक होने की अफवाहें फैलाई जा रही थीं। थाना प्रभारी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए इन दावों को पूरी तरह खारिज किया और बताया कि परिवार के कथनानुसार वास्तविक समझौता 15 लाख रुपये का ही था। हालांकि 15 लाख रुपये की यह देनदारी, बच्चे के 40 लाख रुपये के इलाज का कर्ज, निजी नौकरी की अनिश्चितता और बिखरते परिवार के दर्द ने मिलकर संभव को भीतर तक खोखला कर दिया था।
शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां और बढ़ता अवसाद
गंभीर पारिवारिक और आर्थिक संकटों के अतिरिक्त संभव जैन अपनी शारीरिक स्थिति को लेकर भी परेशान चल रहे थे। उनका शरीर काफी भारी था और वजन लगभग 140 किलोग्राम तक पहुंच चुका था। अत्यधिक मोटापे और वजन के कारण उन्हें कई अन्य शारीरिक एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां घेर चुकी थीं। लंबे समय से चल रही शारीरिक व्याधियां, समाज तथा कार्यस्थल की अपेक्षाएं, बढ़ता वजन और साथ में घर की निरंतर कलह ने उन्हें गहरे नैदानिक अवसाद यानी डिप्रेशन की ओर धकेल दिया था।
अपनी जिंदगी खत्म करने के उस खौफनाक कदम से कुछ ही देर पहले संभव ने अपने पिता के साथ व्हाट्सएप पर बातचीत की थी। उस संवाद में उन्होंने अपने मन के भीतर चल रहे भयंकर डिप्रेशन और जीवन को समाप्त करने की बात खुलकर बयां की थी। पिता ने उस चैट के जरिए उन्हें ढांढस बंधाने, हौसला देने और तुरंत घर लौट आने की बारंबार विनती की, लेकिन तब तक संभव का सब्र पूरी तरह टूट चुका था। आत्महत्या करने से पूर्व उन्होंने अपने मोबाइल कैमरे में एक वीडियो भी रिकॉर्ड किया था, जिसमें उनकी घुटन, लाचारी और मन का असहनीय दर्द साफ महसूस किया जा सकता था।
पुरुषों की मानसिक सेहत और सामाजिक अपेक्षाओं पर सवाल
संभव जैन का यह दुखद प्रकरण उस सामाजिक धारणा की पोल खोलता है, जो यह मानकर चलती है कि पुरुषों को कभी रोना नहीं चाहिए या वे कभी कमजोर नहीं पड़ सकते। हमारे पारंपरिक परिवेश में अक्सर यह सिखाया जाता है कि हर हाल में पुरुष को मजबूत दिखना है, जिससे वे अपनी तकलीफें, डर और आर्थिक असहायता किसी के सामने खुलकर साझा नहीं कर पाते। जब किसी रिश्ते में अलगाव होता है तो कानूनी और सामाजिक सहयोग की व्यवस्थाएं अक्सर एकतरफा समझी जाती हैं, जबकि गंभीर तनाव, भारी कर्ज और संतान की बीमारी के बीच फंसे पुरुषों की मनोस्थिति पर समाज बहुत कम ध्यान देता है।
अवसाद किसी भी जेंडर को देखकर नहीं आता, वह स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से अपनी चपेट में ले सकता है। जब तक परिवारों, दफ्तरों और समाज में ऐसा सुरक्षित माहौल नहीं बनेगा जहां पुरुष अपनी आर्थिक बेबसी, शारीरिक परेशानियों और मानसिक पीड़ा को बिना किसी झिझक के बयां कर सकें, तब तक ऐसे अदृश्य दबाव लोगों की जान लेते रहेंगे। अपनों की चुप्पी, उनके बदले हुए व्यवहार और उनके आंतरिक तनाव को समय रहते समझना ही जीवन रक्षा का सबसे बड़ा उपाय हो सकता है।



















