धार्मिक मान्यताओं में किसी भी उपवास का पूरा फल तभी प्राप्त होता है जब उसका समापन सही विधि और शुभ समय पर किया जाए। देवी आराधना के महापर्व नवरात्रि पर भी यह नियम पूरी तरह लागू होता है। श्रद्धालु अपनी कुल परंपरा के अनुसार अष्टमी, नवमी या दशमी तिथि पर व्रत का पारण करते हैं। कुछ भक्त अष्टमी अथवा नवमी के दिन कन्या पूजन संपन्न करने के बाद भोजन ग्रहण करते हैं, जबकि पूरे नौ दिनों तक उपवास रखने वाले साधक दशमी तिथि पर ही अन्न ग्रहण करते हैं।
व्रत पारण की तारीखें और शुभ मुहूर्त
साल 2026 में नवरात्रि व्रत पारण के लिए 19 अक्टूबर और 20 अक्टूबर दोनों दिन महत्वपूर्ण हैं। जो श्रद्धालु नवमी तिथि के दिन उपवास खोलते हैं, उनके लिए शुभ समय 19 अक्टूबर की सुबह 10 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 20 अक्टूबर की दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि के भीतर कभी भी पारण का संकल्प पूरा किया जा सकता है।
दूसरी ओर, जो साधक पूरे नौ दिनों का कठिन व्रत रखकर दशमी तिथि पर पारण करने का संकल्प लेते हैं, वे 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट के बाद व्रत खोल सकते हैं। इसके अलावा जो लोग अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन के तुरंत बाद व्रत खोलते हैं, वे 19 अक्टूबर को प्रातः काल हवन और कन्या पूजन की विधि संपन्न कर अपना उपवास समाप्त कर सकते हैं।
शास्त्र सम्मत पारण की संपूर्ण पूजन विधि
पारण के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद मां दुर्गा की विधिवत पूजा अर्चना की जाती है। सबसे पहले धूप, दीप, गंध, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देवी का ध्यान करें। इसके पश्चात दुर्गा सप्तशती अथवा वैदिक मंत्रों के साथ हवन संपन्न किया जाता है। हवन कुंड में आहुति देकर वातावरण को शुद्ध और सात्विक बनाया जाता है।
हवन संपन्न होने के उपरांत घर पर कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है। नौ कन्याओं और एक बटुक भैरव के चरण धोकर उन्हें आसन पर बैठाया जाता है। इसके बाद रोली और अक्षत से तिलक कर उन्हें हलवा, चना और पूरी का सात्विक भोग परोसा जाता है। कन्याओं को भोजन कराने के बाद दक्षिणा और उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। कन्या पूजन पूरा होने के बाद मां दुर्गा को अर्पित किए गए इसी प्रसाद को स्वयं ग्रहण कर साधक अपना उपवास खोलते हैं।
कलश विसर्जन का सही समय और नियम
नवरात्रि के पहले दिन स्थापित किए गए मंगल कलश का विसर्जन भी विधि विधान से किया जाना आवश्यक होता है। अलग-अलग परिवारों में कलश विसर्जन नवमी अथवा दशमी तिथि पर करने की परंपरा है। जो लोग नवमी तिथि को कलश विसर्जन करना चाहते हैं, उनके लिए 19 अक्टूबर की सुबह 10 बजकर 51 मिनट से 20 अक्टूबर की दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक का समय उपयुक्त रहेगा।
वहीं दशमी तिथि पर विसर्जन करने वाले भक्त 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट के बाद पवित्र जल में कलश विसर्जित कर सकते हैं। विसर्जन से पूर्व कलश पर रखे नारियल को प्रसाद रूप में ग्रहण किया जा सकता है या सम्मानपूर्वक प्रवाहित किया जा सकता है, तथा कलश के पवित्र जल को पूरे घर में छिड़क कर सुख-शांति की कामना की जाती है।


















