चित्रकूट के घने जंगलों में एक तपस्वी साधु महाराज ऐसी जीवनशैली जी रहे हैं जिसे देखकर आज की सुविधा-संपन्न पीढ़ी हैरान रह जाए। इनके पास खाना पकाने के लिए एक भी बर्तन नहीं है, फिर भी ये हर दिन अपनी प्रसादी खुद तैयार करते हैं, वो भी सीधे पत्थर पर आटा गूंथकर।
चित्रकूट की पौराणिक पहचान
चित्रकूट को धार्मिक मान्यताओं में बेहद पावन स्थान माना गया है। ऐसी मान्यता है कि यहीं भगवान राम ने तुलसीदास को साक्षात दर्शन दिए थे। इस क्षेत्र से होकर मंदाकिनी नदी गुजरती है, जिसे पयस्विनी के नाम से भी पहचाना जाता है। इसी नदी के किनारे बसे रामघाट पर हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आस्था से डुबकी लगाने पहुंचते हैं।
नरसिंह धारा की गुफा में तप
चित्रकूट के इन्हीं घने जंगलों की पहाड़ियों पर बनी गुफाओं में सदियों से कई संत-महात्मा तपस्या में लीन रहते आए हैं, वो भी जंगली जानवरों की मौजूदगी के बीच। इसी इलाके में नरसिंह धारा नाम की जगह है, जहां पहाड़ों से एक जलधारा नीचे उतरती है। घने जंगल के बीच बसे इस स्थल पर भगवान नरसिंह की एक प्राचीन मूर्ति स्थापित है। पास ही पहाड़ी में बनी एक गुफा में साधु महाराज भगवान की भक्ति में डूबे रहते हैं, इन्हें सांसारिक सुख-सुविधाओं का कोई लोभ नहीं।
बिना बर्तन प्रसादी बनाने का तरीका
स्नान करने के बाद साधु महाराज सबसे पहले ध्यान लगाते हैं, फिर नियमित पूजा-अर्चना करते हैं। भगवान को जल चढ़ाने के बाद वो अपनी प्रसादी बनाने में जुट जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में इनके पास आटा गूंथने या पकाने के लिए कोई बर्तन मौजूद नहीं होता।
दिन में सिर्फ एक बार गुफा से बाहर
साधु महाराज दिनभर में केवल एक बार ही अपनी गुफा से बाहर आते हैं। गुफा के नजदीक बहने वाली साफ जलधारा से वो पानी भरते हैं। झरने के पास पड़े एक बड़े पत्थर को ही इन्होंने अपना रसोईघर बना लिया है, उसी सपाट पत्थर पर आटा गूंथा जाता है।
जंगली जानवरों के बीच सादा जीवन
घने जंगल में साधु महाराज तक पहुंचने वाले कई श्रद्धालु उन्हें भोजन सामग्री भेंट कर जाते हैं। लेकिन जब कभी भोजन की व्यवस्था नहीं हो पाती, तब साधु महाराज जंगल में मिलने वाले फल-कंदमूल खाकर ही दिन गुजार लेते हैं। एक छोटी सी गुफा उनका आश्रय है। रात के समय अक्सर शेर-भालू जैसे जंगली जानवर वहां से गुजरते हैं, यहां तक कि जानवरों के झुंड भी निकलते हैं, लेकिन आज तक इन्होंने साधु महाराज को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।
एक ही रामरोट में सबकी प्रसादी
साधु महाराज घास-फूस और सूखी लकड़ियों से आग जलाते हैं और उसी पर अपना रामरोट पकाते हैं। यह रामरोट करीब 1 किलोग्राम वजन का होता है। साधु महाराज खुद बताते हैं कि आटा चाहे 1 किलो हो या 5 किलो, वो हमेशा एक ही रामरोट तैयार करते हैं और उसी में से सभी को भोजन-प्रसादी बांटते हैं।
त्याग और साधना से भरी दिनचर्या
तैयार प्रसादी को साधु महाराज पहले पेड़ के पत्तों पर भगवान को अर्पित करते हैं, उसके बाद खुद पत्तल पर बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। कुटिया में आने वाले श्रद्धालुओं को भी वो भोजन कराते हैं। नियमित रूप से सुबह-शाम एक-एक घंटे साधना करने वाले साधु महाराज कई बार पूरी रात भगवान का नाम लेते हुए बिता देते हैं। त्याग, संतोष और तपस्या से भरा इनका यह जीवन आज के दौर में एक अनोखी मिसाल है।




















