सनातन परंपरा में भाई दूज भाई और बहन के अटूट स्नेह और विश्वास का सबसे महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है। हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व पांच दिवसीय दीपोत्सव का औपचारिक समापन भी करता है। इस पावन अवसर पर बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनके सुखी जीवन, तरक्की और लंबी आयु की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की सुरक्षा, सम्मान और सहयोग का आजीवन संकल्प दोहराते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन पवित्र यमुना नदी में स्नान करने का भी विशेष आध्यात्मिक महात्म्य बताया गया है, जिसके अनुसार यमुना में डुबकी लगाने वाले भाई और बहन को सभी संचित पापों से मुक्ति मिलती है।
भाई दूज 2026 की सही तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त
साल 2026 में भाई दूज का मुख्य पर्व 11 नवंबर 2026 को उल्लासपूर्वक मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि का आरंभ 10 नवंबर 2026 को दोपहर 02:00 बजे से हो रहा है, जो 11 नवंबर 2026 को दोपहर 03:53 बजे तक प्रभावी रहेगी। उदया तिथि और अपराह्न काल के संयोग के चलते मुख्य पूजा और तिलक 11 नवंबर को ही संपन्न होंगे। इस दिन भाइयों के तिलक और विधिवत पूजन का सबसे उत्तम एवं शुभ मुहूर्त दोपहर 01:10 बजे से लेकर दोपहर 03:20 बजे तक रहेगा। परिवारजनों को इसी समयावधि के भीतर तिलक की रस्में पूरी करने की सलाह दी जाती है।
पूजन सामग्री की पूरी सूची
भाई दूज के अनुष्ठान को शांति और श्रद्धा के साथ संपन्न करने के लिए बहनों को पूजा से पूर्व आवश्यक सामग्रियों का प्रबंध कर लेना चाहिए। पूजन की थाली में एक सुंदर दीपक, अक्षत यानी बिना टूटे साबुत चावल, ताजे फूल, फल, रोली अथवा कुमकुम, शुद्ध हल्दी, मिष्ठान, देसी घी, सूखा गोला यानी नारियल और आचमन व पूजा के लिए स्वच्छ जल शामिल होना चाहिए। इन सभी सामग्रियों को सजाकर ही पूजा का आरंभ करना कल्याणकारी माना जाता है।
तिलक और व्रत की प्रामाणिक पूजा विधि
इस पावन दिन पर दोनों भाई-बहन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठें और उबटन तथा तेल लगाकर स्नान की परंपरा पूरी करें। पवित्र स्नान के बाद स्वच्छ और सुंदर वस्त्र धारण करें और घर के मंदिर में सभी देवी-देवताओं का षोडशोपचार अथवा विधिविधान से पूजन करें। इसके उपरांत बहनें अपनी पूजा की थाली तैयार करें, जिसमें हल्दी, कुमकुम, अक्षत और जलता हुआ दीपक सुसज्जित हो। सबसे पहले इस सजी हुई थाली को भगवान के श्रीचरणों में अर्पित करके आशीर्वाद लें।
इसके बाद भाई को उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करवाकर एक साफ लकड़ी की चौकी पर बैठाएं। भाई को परंपरा के अनुसार अपने सिर को किसी स्वच्छ रुमाल या कपड़े से ढंककर रखना चाहिए। अब बहनें भाई के मस्तक पर कुमकुम, हल्दी और अक्षत का पावन तिलक लगाएं। तिलक करने के बाद भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी कलावा बांधें। जिन परिवारों में सूखा नारियल या गोला देने की रस्म है, वहां कलावा बांधने के तुरंत बाद भाई के हाथ में सूखा गोला भेंट किया जाता है, जबकि जहां यह रिवाज नहीं है, वे इसे छोड़ सकते हैं।
तिलक और कलावा बंधन के पश्चात बहनें दीपक से भाई की प्यार से आरती उतारें और फिर उनका मुंह मीठा करवाएं। अनुष्ठान पूरा होते ही भाई अपनी क्षमता और प्रेम से बहनों को उपहार भेंट करते हैं। इस दिन भाई और बहन का एक साथ बैठकर भोजन करना अत्यंत शुभ और प्रेमवर्धक माना जाता है। यदि बहन विवाहित हैं, तो परंपरा यही कहती है कि भाई को अपनी बहन की ससुराल जाकर उसके घर भाई दूज का पर्व मनाना चाहिए।



















