उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित बांसडीह तहसील के अंतर्गत बकवा पतीसा गांव अपनी एक अनूठी और चमत्कारी आध्यात्मिक विरासत को समेटे हुए है। यहां स्थापित प्राचीन शिव मंदिर करीब 200 साल पुराना माना जाता है, जिसे श्रद्धालु पतीश्वर नाथ धाम के नाम से पुकारते हैं। इस पवित्र स्थल के प्रकट होने का वृत्तांत देवी सीता के धरती से प्राकट्य की पौराणिक स्मृति से मिलता-जुलता बताया जाता है। दो शताब्दियों से यह स्थान दूर-दराज के श्रद्धालुओं के लिए अगाध श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है, जहां पहुंचने वाले भक्तों को अलौकिक शांति और आस्था की अनुभूति होती है।
जुताई के दौरान हल टकराने से धरती से निकला स्वयंभू विग्रह
इस पावन धाम के ऐतिहासिक प्राकट्य के संबंध में स्वामी ओम संत महाराज का कहना है कि मंदिर के गर्भगृह में स्थापित यह शिवलिंग इंसानी हाथों द्वारा तराशा या स्थापित नहीं किया गया है, बल्कि यह पूरी तरह स्वयंभू है। सदियों पहले जब इस भूभाग पर एक किसान अपने खेत में खेती के लिए हल चला रहा था, तभी हल का अगला नुकीला हिस्सा जमीन की गहराई में किसी बेहद कठोर वस्तु से जा टकराया। जमीन के भीतर रुकावट महसूस होने पर जब उस जगह की सावधानीपूर्वक खुदाई कराई गई, तो मिट्टी के गर्भ से एक अद्भुत और दिव्य शिवलिंग दृष्टिगोचर हुआ।
हैरान करने वाली बात यह है कि उस जमाने में हल के टकराने से शिवलिंग पर जो निशान बना था, वह आज भी विग्रह पर प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। हालांकि मौजूदा समय में एक श्रद्धालु द्वारा मनोकामना पूरी होने के उपलक्ष्य में इस पर पीतल की सुरक्षात्मक परत चढ़वा दी गई है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, प्राकट्य के तुरंत बाद इस विग्रह को वहां से हटाकर दूसरी जगह ले जाने अथवा जमीन से पूरी तरह बाहर निकालने के कई प्रयास किए गए। तमाम कोशिशों के बावजूद कोई भी इस अलौकिक विग्रह को अपनी जगह से तिल भर भी नहीं हिला सका। अंततः श्रद्धालुओं ने इसे महादेव का प्रत्यक्ष आदेश मानकर ठीक उसी स्थान पर भगवान शंकर के भव्य देवालय का निर्माण कराया।
संतान प्राप्ति और मन्नत पूरी होने की अटूट परंपरा
साल 2006 से इस पावन तीर्थ की अनवरत सेवा संभाल रहे मंदिर के महंत हरि ओम का कहना है कि यहां सच्चे मन से हाजिरी लगाने वाले हर भक्त की मुराद अवश्य पूरी होती है। क्षेत्रीय निवासियों के बीच एक बेहद चर्चित प्रसंग हल्दी गांव के निवासी उपाध्याय जी का सुनाया जाता है। उनके परिवार में तीन पुत्र थे, परंतु विडंबना यह थी कि तीनों ही बेटों के यहां कोई संतान नहीं थी और वंश आगे नहीं बढ़ पा रहा था। जब उन्हें बकवा पतीसा के इस चमत्कारी शिवधाम की महिमा का संज्ञान हुआ, तो वे यहां पहुंचे और उन्होंने महादेव के चरणों में अपनी मनोकामना रखी।
भगवान शिव की असीम कृपा से उनकी प्रार्थना स्वीकार हुई और कुछ ही समय में उनके परिवार में संतान का आगमन हुआ, जिससे उनके वंश की बेल आगे बढ़ सकी। इस कृपा से अभिभूत होकर उपाध्याय जी ने महादेव के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने शिवलिंग पर पीतल की एक भव्य चादर चढ़वाई और साथ ही चांदी का एक आकर्षक सर्प विग्रह भी श्रद्धापूर्वक अर्पित किया, जो आज भी मंदिर के आकर्षण का अंग है।
परिसर के अन्य चमत्कार और ग्रामीणों का अटूट विश्वास
मंदिर प्रांगण के बाहर आटा चक्की की दुकान चलाने वाले बकवा गांव के निवासी अखिलानंद पांडेय बताते हैं कि इस पावन धाम से जुड़ी मान्यताएं पीढ़ियों पुरानी हैं। स्थानीय लोग इसे केवल एक पत्थर का विग्रह नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष भगवान शिव की जीवंत उपस्थिति मानते हैं। उनके अनुसार, चमत्कार और दैवीय कृपा का यह अनुभव सिर्फ मुख्य शिवलिंग तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि गांव में निर्मित राधा-कृष्ण मंदिर से जुड़े प्रसंग भी इसकी महिमा को विस्तार देते हैं।
क्षेत्रीय मान्यता के अनुसार, जब पूर्व प्रधान हरेंद्र सिंह के पिता ने राधा-कृष्ण मंदिर का निर्माण कराकर वहां प्रतिमा स्थापित की थी, तब मंदिर परिसर में धार्मिक परंपरा के अनुसार झंडा गाड़ने की रस्म निभाई जा रही थी। उसी दौरान एक विशेष घटना घटी, जब झंडे के लिए लगाए गए बांस से कुंकड़ निकला और उसके तुरंत बाद उनके परिवार में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बकवा पतीसा गांव के लोग इन तमाम घटनाओं को देवालय की असीम कृपा और प्रभु की शक्ति का सीधा प्रमाण मानते हैं। चूंकि गांव का नाम बकवा पतीसा है, इसलिए इस देवस्थल को पतीश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्धि मिली और आज भी यहां भक्त अपनी झोलियां फैलाने आते हैं।



















