सनातन परंपरा और भारतीय संस्कृति में अपने ईष्ट देव, गुरुजनों और बड़ों के प्रति आदर प्रकट करने के लिए प्रणाम को सबसे सहज और श्रेष्ठ माध्यम स्वीकार किया गया है। देव आराधना के समय अक्सर श्रद्धालु विग्रह के सम्मुख लेटकर दंडवत नमन करते दिखाई देते हैं। पूजा स्थलों और देवालयों में एक विशिष्ट बात सहज ही ध्यान आकर्षित करती है कि पुरुष श्रद्धालु तो धरातल पर लेटकर साष्टांग नमन करते हैं, परंतु स्त्रियां इस मुद्रा में प्रणाम नहीं करतीं। इस व्यवस्था के मूल में सनातन परंपराओं से जुड़े शास्त्रोक्त विचार और लोक मान्यताएं विद्यमान हैं।
प्रणाम की परंपरा और अहंकार के विसर्जन का भाव
ईश्वर की आराधना में नमन केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के अभिमान को मिटाने का अनुष्ठान भी है। जब कोई भक्त प्रभु के समक्ष दंडवत होता है, तब वह अपने समस्त सांसारिक मद और अहंकार को त्यागकर प्रभु की शरण में पूर्ण रूप से लीन हो जाता है। सनातन धर्म में उपासना की विधियों में इस समर्पण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, क्योंकि अपने अस्तित्व को शून्य मानकर ही ईश्वरीय कृपा का अनुभव किया जा सकता है।
क्या है साष्टांग नमस्कार का स्वरूप?
साष्टांग शब्द का शाब्दिक अभिप्राय आठ अंगों के संयोग से होने वाले वंदन से है। इस मुद्रा में साधक भूमि पर पूर्ण रूप से लेटकर अपना मस्तक परमात्मा के चरणों में समर्पित करता है। शास्त्रों में वर्णित प्रसिद्ध श्लोक के माध्यम से इसके स्वरूप को स्पष्ट किया गया है
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा तथा।
मनसा वाचा दृष्ट्या प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते॥
इस श्लोक का अर्थ है कि दोनों चरण, दोनों हाथ, घुटने, छाती, मस्तक, मन, वाणी और दृष्टि, इन आठों माध्यमों से किया गया वंदन ही अष्टांग नमस्कार कहलाता है। जब साधक का मन, वचन और शरीर पूरी तरह एकाग्र होकर देव चरणों में टिक जाता है, तभी यह पूर्ण नमन का रूप लेता है।
शास्त्रों में भूमि स्पर्श से जुड़ी वर्जनाएं
इस संदर्भ में धर्मसिंधु ग्रंथ से संदर्भित एक श्लोक का उल्लेख भी परंपरा में किया जाता रहा है
ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्रामं च पुस्तकम्।
वसुन्धरा न सहते कामिनी कुच मर्दनम्॥
इस श्लोक के अनुसार कुछ विशिष्ट वस्तुओं और अंगों के धरातल से सीधे घर्षण अथवा स्पर्श को लेकर मर्यादा तय की गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह व्याख्या की जाती है कि स्त्री के वक्षस्थल का सीधे भूमि से स्पर्श अनुचित माना गया है और इसी मर्यादा की रक्षा के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं।
मातृत्व की गरिमा और स्त्रियों के लिए अलग व्यवस्था
शास्त्रों और मान्यताओं में नारी को सृजन की शक्ति और मातृत्व का आधार माना गया है। साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में लेटने से स्त्री के उदर और वक्षस्थल का भूमि से सीधा संपर्क होता है। धार्मिक दृष्टिकोण से स्त्री का गर्भ और वक्ष अत्यंत पवित्र माने गए हैं, क्योंकि वे नई सृष्टि के पोषण और मातृत्व के प्रतीक हैं। इसी पावनता की सुरक्षा और मर्यादा को ध्यान में रखते हुए स्त्रियों के लिए पूरी तरह जमीन पर लेटकर दंडवत करने का निषेध बताया गया है।
स्त्रियों के लिए नमन की उचित पद्धति
धार्मिक विधानों के अनुसार स्त्रियों को ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने के लिए जमीन पर घुटने टेककर बैठने, सिर झुकाने या करबद्ध होकर हाथ जोड़ने का निर्देश दिया गया है। उपासना का मूल तत्व बाहरी मुद्राओं से कहीं अधिक अंतर्मन की निष्ठा, श्रद्धा और विनयशीलता पर निर्भर करता है। यदि हृदय में प्रभु के प्रति सच्चा समर्पण भाव हो, तो हाथ जोड़कर किया गया साधारण वंदन भी पूर्ण फल प्रदान करने वाला माना जाता है।



















