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सरोजिनी नगर के श्री विनायक मंदिर का सफर और 1950 के दशक से आज तक की अनूठी गाथाधर्म
7 अक्तू॰ 2026, 2:37 pm (25 मिनट पहले)· 0

सरोजिनी नगर के श्री विनायक मंदिर का सफर और 1950 के दशक से आज तक की अनूठी गाथा

दिल्ली के सरोजिनी नगर स्थित श्री विनायक मंदिर की स्थापना 1950 के दशक में दक्षिण भारतीय समुदाय की पहल पर हुई थी। आज यह राजधानी में आस्था और पारंपरिक अनुष्ठानों का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।

देश की राजधानी दिल्ली में सरोजिनी नगर स्थित श्री विनायक मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक चेतना और गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यह पावन धाम केवल दक्षिण भारतीय समाज के लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर पृष्ठभूमि के भक्त यहाँ विघ्नहर्ता भगवान गणेश के दर्शन करने पहुँचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणपति बप्पा के दरबार में शीश नवाने से जीवन की तमाम बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और सुख, शांति एवं समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। दिल्ली में बसे दक्षिण भारतीय प्रवासियों के लिए यह परिसर दशकों से न केवल धार्मिक आराधना, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का भी सशक्त जरिया रहा है। इस मंदिर के गर्भगृह में रिद्धि-सिद्धि के साथ कर्पगा विनायकर की दैनिक उपासना विशुद्ध दक्षिण भारतीय वैदिक विधि-विधान से की जाती है।

1950 के दशक में जगी थी पारंपरिक पूजा स्थल की आवश्यकता

राजधानी में इस भव्य मंदिर के निर्माण की पृष्ठभूमि 1950 के दशक में तैयार हुई थी। उस दौर में दिल्ली में काम और आजीविका के सिलसिले में बसे दक्षिण भारतीय परिवारों ने यह शिद्दत से महसूस किया कि उनके पास अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों और वैदिक पद्धतियों के अनुसार पूजा-अर्चना करने के लिए एक समर्पित धार्मिक स्थल होना चाहिए। इसी सामूहिक विचार को मूर्त रूप देने के उद्देश्य से स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्ध समाजसेवियों ने मिलकर 'श्री विनायक मंदिर समिति' का गठन किया। इस संस्थागत प्रयास को औपचारिक स्वरूप देते हुए 16 अप्रैल 1953 को इसे 'रजिस्ट्रार ऑफ़ सोसाइटीज़, दिल्ली' के तहत पंजीकृत कराया गया। समिति का प्राथमिक संकल्प राजधानी की धरती पर भगवान विनायक के एक पावन धाम की स्थापना करना था।

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चंदे से तैयार हुआ पहला ढांचा और 1961 का ऐतिहासिक कुंभाभिषेकम

समिति के गठन के बाद श्रद्धालुओं के स्वैच्छिक आर्थिक सहयोग और चंदे की बदौलत भगवान विनायक के लिए आरंभिक छोटे मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ। इस मूल मंदिर संरचना में एक मुख्य 'गर्भ-गृह' और भक्तों की परिक्रमा के लिए उसके चारों ओर 'प्राकारम' (परिक्रमा मार्ग) का निर्माण किया गया था। इस पुनीत कार्य को कांची कामकोटि पीठम के जगद्गुरु पूज्य श्री परमाचार्य जी तथा श्रृंगेरी शारदा पीठम के जगद्गुरु श्री शंकराचार्य स्वामी जी का पावन आशीर्वाद प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के कुशल शिल्पकारों यानी स्थपतियों द्वारा विशेष रूप से तराशी गई श्री सिद्धि-बुद्धि समेत कर्पक विनायक की विग्रह मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा 24 अगस्त 1961 को संपन्न हुई। उस समय इस पूरे रिहायशी क्षेत्र को विनय नगर के नाम से पुकारा जाता था, जिसे आज दिल्लीवासी सरोजिनी नगर के नाम से जानते हैं। भारत के विभिन्न कोनों से पधारे विशाल भक्त समुदाय की साक्षी में पारंपरिक दक्षिण भारतीय स्थापत्य और कर्मकांड शैली में कुंभाभिषेकम का भव्य आयोजन संपन्न किया गया था।

परिसर का क्रमिक विस्तार और शिव परिवार की स्थापना

इस साधारण और विनम्र शुरुआत के बाद भक्तों की निरंतर बढ़ती निष्ठा और सहयोग ने मंदिर के स्वरूप को लगातार भव्यता प्रदान की। समय बीतने के साथ मंदिर प्रांगण में शास्त्रीय नियमों के अनुसार भगवान हनुमान और नवग्रहों की पाषाण प्रतिमाएं भी स्थापित की गईं। मंदिर में प्रतिदिन होने वाले पारंपरिक अभिषेकम और दैनिक पूजा-पाठ के अतिरिक्त विशेष धार्मिक पर्वों पर भव्य अभिषेक, वैदिक होमम यानी हवन और संकीर्तन का आयोजन किया जाता है, जो दिल्ली-एनसीआर के भक्तों को भारी संख्या में आकर्षित करता है। स्थानीय श्रद्धालुओं के गहरे आग्रह और भक्तिभाव को देखते हुए जून 1983 में मंदिर प्रांगण में भगवान शिव के एक अलग मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इस पावन देवालय में पवित्र नर्मदा नदी से लाए गए स्वयंभू ओंकारेश्वर शिवलिंग को स्थापित किया गया है। इसके साथ ही देवी पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और नंदीकेश्वर की नक्काशीदार भव्य मूर्तियों की विधिवत प्रतिष्ठा की गई है।

सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की विशेष पूजा

इस प्रतिष्ठित मंदिर में सामान्य दिनों के अलावा विशेष अवसरों पर देश के शीर्ष नेतृत्व की उपस्थिति भी देखी जाती रही है। सरकार के प्रमुख के तौर पर सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरोजिनी नगर के श्री विनायक मंदिर पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना की। इस पावन अवसर पर प्रधानमंत्री ने देवालय के गर्भगृह में बैठकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा संपन्न की और राष्ट्र सेवा के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता व संकल्प को दोहराया। प्रधानमंत्री ने भगवान विघ्नहर्ता से समस्त देशवासियों के कल्याण, सुख-शांति और भारत की निरंतर समृद्धि की प्रार्थना की।

सवाल-जवाब

श्री विनायक मंदिर दिल्ली में कहाँ स्थित है?
यह प्रसिद्ध मंदिर देश की राजधानी दिल्ली के सरोजिनी नगर में स्थित है, जिसे पूर्व में विनय नगर कहा जाता था।
मंदिर की स्थापना के लिए समिति का पंजीकरण कब कराया गया था?
मंदिर निर्माण के लिए गठित 'श्री विनायक मंदिर समिति' को 16 अप्रैल 1953 को रजिस्ट्रार ऑफ़ सोसाइटीज़, दिल्ली के पास रजिस्टर कराया गया था।
भगवान विनायक की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा किस तारीख को हुई थी?
श्री सिद्धि-बुद्धि समेत कर्पक विनायक की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा 24 अगस्त 1961 को कुंभाभिषेकम के साथ संपन्न हुई थी।
मंदिर निर्माण में किन धार्मिक पीठों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था?
मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कांची कामकोटि पीठम के जगद्गुरु पूज्य श्री परमाचार्य जी और श्रृंगेरी शारदा पीठम के जगद्गुरु श्री शंकराचार्य स्वामी जी के आशीर्वाद से हुई थी।
परिसर में भगवान शिव का मंदिर कब स्थापित किया गया?
श्रद्धालुओं की मांग पर जून 1983 में नर्मदा नदी से लाए गए स्वयंभू ओंकारेश्वर शिवलिंग के साथ शिव मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंदिर में पूजा-अर्चना क्यों की?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार के प्रमुख के रूप में सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना की।
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