पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर को हो रहा है, जो पूर्वजों की विदाई का सबसे अहम अवसर माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अंतिम तिथि को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। यह दिन उन सभी पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए समर्पित होता है जो इस अवधि में भूलोक पर आते हैं और फिर अपने लोक प्रस्थान करते हैं। यदि किसी कारणवश परिवार के मृत सदस्यों का श्राद्ध उनकी निर्धारित मृत्यु तिथि पर न हो सका हो, या परिजन उनके देहांत की सही तारीख भूल चुके हों, तो इस अमावस्या पर किया गया श्राद्ध सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों को पूर्ण तृप्ति प्रदान करता है। पूर्वजों को प्रसन्न मन से विदा करने के लिए श्राद्ध की थाली में सात विशेष खाद्य पदार्थों को शामिल करने का विशेष महत्व बताया गया है।
गाय के दूध की खीर और चावल का महत्व
श्राद्ध के भोजन में सबसे प्रमुख स्थान खीर का होता है। बिना मीठे पकवान के पूर्वजों का भोग अधूरा समझा जाता है। इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि यह खीर केवल गाय के दूध से ही तैयार की जाए, भैंस के दूध का प्रयोग वर्जित माना गया है। इसके साथ ही थाली में सादे चावल अवश्य परोसने चाहिए। परंपरा के अनुसार, पूर्वजों को चावल अर्पित करने से पितृ दोष के प्रभावों में कमी आती है और घर में शांति का वातावरण बनता है।
उड़द दाल के पारंपरिक व्यंजन
अमावस्या के दिन बनने वाले भोजन में उड़द की दाल का कोई न कोई रूप होना बेहद आवश्यक है। धार्मिक विधि-विधान के तहत उड़द की दाल पकाई जा सकती है या फिर इसके स्वादिष्ट पकोड़े तैयार किए जा सकते हैं। परिवार अपनी सुविधा अनुसार उड़द की दाल भरी कचौड़ियां या दही बड़े बनाकर भी थाली में सजा सकते हैं। यह अनाज श्राद्ध कर्म में अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।
गरमा-गरम पूड़ी और मौसमी सब्जियां
पितरों की थाली में सामान्य रोटी के स्थान पर पूड़ी परोसने की प्राचीन परंपरा है, क्योंकि पूड़ी को पूर्वजों का अत्यंत प्रिय आहार माना गया है। इसके अतिरिक्त भोजन में ताजी मौसमी सब्जियों का समावेश अनिवार्य रूप से होना चाहिए। इस विशेष तिथि पर पारंपरिक रूप से कद्दू की सब्जी बनाना सबसे उत्तम और फलदायी माना जाता है, जो सात्विक भोजन की मुख्य पहचान है।
ताजे फल और पूर्वजों की पसंदीदा डिश
अन्न के अलावा थाली में ऋतु के अनुकूल ताजे फलों का भोग भी लगाना चाहिए। बाजार में उपलब्ध कोई भी स्वच्छ मौसमी फल इस थाली में श्रद्धापूर्वक रखा जा सकता है। इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण नियम यह भी है कि मृत परिजन को अपने जीवनकाल में जो पकवान सबसे अधिक पसंद थे, उन्हें भी विशेष रूप से तैयार किया जाए। उदाहरण के तौर पर यदि उन्हें कढ़ी, राजमा, छोले अथवा रबड़ी पसंद थी, तो इन व्यंजनों को बनाकर अर्पित करने से पूर्वज परम संतुष्ट होते हैं।
भोग बनाते समय इन नियमों का रखें ध्यान
श्राद्ध का भोजन बनाते समय शुद्धता और सात्विकता का पूर्ण पालन करना अनिवार्य है। इस भोजन में लहसुन और प्याज का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। पूरी तरह सात्विक, स्वच्छ और पवित्र मन से तैयार किया गया भोजन जब पितरों को समर्पित किया जाता है, तभी वे प्रसन्न होकर परिवार को अपना आशीर्वाद देते हैं और पितृ लोक लौटते हैं।



















