श्राद्ध पक्ष की अवधि पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक बेहद पावन अवसर मानी जाती है. इस दौरान लोग अपने पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसे पारंपरिक अनुष्ठान विधि-विधान से संपन्न करते हैं. इन धार्मिक कर्मों का मुख्य उद्देश्य पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान करना और परिवार पर बने पितृदोष समेत अन्य बाधाओं से मुक्ति पाना होता है. हिंदू धार्मिक मान्यताओं में प्रकृति के तत्वों, विशेष रूप से वृक्षों और वनस्पतियों को देवत्व का प्रतीक माना गया है. इसी कारण पितृपक्ष के दिनों में कुछ विशेष पवित्र पौधों का रोपण करना अथवा उनका दान करना अत्यधिक फलदायी और कल्याणकारी माना जाता है. 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इस पक्ष का समापन होने जा रहा है. ऐसे में इस अंतिम तिथि से पहले यदि उचित स्थान पर विशेष पौधे लगाए जाएं या उनका दान किया जाए, तो पूर्वजों का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है.
तुलसी का पौधा और तर्पण में इसका महत्व
सनातन परंपरा में तुलसी के पौधे को सर्वोपरि और अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है. पितृपक्ष की अवधि में घर के आंगन या बालकनी में तुलसी का नया पौधा स्थापित करना और नियमित रूप से सुबह-शाम दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करना देवताओं के साथ-साथ पितरों को भी असीम संतुष्टि देता है. धार्मिक विधानों के अनुसार श्राद्ध और तर्पण के जल में तुलसी की पत्तियां डालकर अर्घ्य देने से पूर्वजों की आत्मा पूरी तरह तृप्त हो जाती है. ऐसा करने से घर में व्याप्त पितृदोष का प्रभाव क्षीण होता है. यदि किसी कारणवश घर की चारदीवारी में तुलसी का रोपण करना संभव न हो, तो किसी मंदिर में अथवा योग्य व्यक्ति को पितरों के नाम से तुलसी के पौधे का दान अवश्य कर देना चाहिए.
पीपल का वृक्ष और अड़चनों का निवारण
धार्मिक ग्रंथों में पीपल के पेड़ को समस्त देवों और पूर्वजों का मुख्य आश्रय स्थल बताया गया है. मान्यता है कि इस वृक्ष की शाखाओं और मूल में दिव्य शक्तियों का वास होता है. पितृपक्ष के पावन दिनों में पीपल का पौधा लगाना और उसमें जल देकर उसकी सेवा-सुश्रूषा करना पूर्वजों को अतिशीघ्र प्रसन्न करने का सरल मार्ग माना जाता है. इस पौधे को उचित स्थान पर रोपने से जीवन में आ रही अनचाही रुकावटें समाप्त होती हैं और पितृकृपा से मार्ग प्रशस्त होता है. यदि घर के भीतर अथवा परिसर में पीपल का वृक्ष लगाना व्यावहारिक न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या से पूर्व किसी सार्वजनिक स्थल, वाटिका या देवस्थान के लिए पीपल के पौधे का दान करना चाहिए.
केले का पौधा लाएगा सुख और संपन्नता
केले का पौधा भगवान विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी का अत्यंत प्रिय माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में केले का पौधा लगाना परिवार के लिए अपार सौभाग्य और कल्याण का कारक बनता है. इस पौधे की नियमित देखरेख करने से पूर्वज संतुष्ट होते हैं और यदि परिवार में लंबे समय से किसी प्रकार का क्लेश अथवा उलझन चल रही हो, तो उसका निवारण होता है. जो श्रद्धालु अपने आवास पर केले का पौधा रोपने में असमर्थ हों, वे पितरों के निमित्त किसी देवालय में अथवा किसी अन्य व्यक्ति को इस पवित्र पौधे को ससम्मान दान कर सकते हैं.
बरगद का वृक्ष: मोक्ष और शांति का प्रतीक
बरगद यानी वट वृक्ष को सनातन धर्म में दीर्घायु, स्थिरता और मोक्ष प्रदान करने वाला महावृक्ष कहा गया है. मान्यताओं के अनुसार इस विशाल वृक्ष में देवी-देवताओं के साथ ही पितरों का भी वास रहता है. पितृपक्ष के दिनों में बरगद का पौधा लगाना पितृदोष से मुक्ति पाने का अचूक साधन माना गया है. इस पावन वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करने और दीपक प्रज्वलित करने से अतृप्त पूर्वजों की आत्मा को शांति तथा सद्गति मिलती है. यदि घर की सीमा में इस विशालकाय वृक्ष को लगाना संभव न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या से पहले किसी मंदिर, आश्रम या खुली भूमि के निमित्त बरगद के पौधे का दान किया जा सकता है.
भगवान शिव का प्रिय बेल वृक्ष और डरावने सपनों से मुक्ति
शिव पुराण के अनुसार बेल का वृक्ष देवाधिदेव महादेव को अत्यंत प्रिय है. पितृपक्ष में बेल का पौधा लगाने से अतृप्त आत्माओं को शांति की प्राप्ति होती है और पितृदोष का पूरी तरह निवारण हो जाता है. धार्मिक मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन भगवान शिव पर ताजे बेलपत्र और पवित्र गंगाजल अर्पित करने से सभी पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और परिजनों को आने वाले डरावने सपनों की समस्या समाप्त हो जाती है. यदि घर पर बेल का पौधा रोपना संभव न हो, तो अमावस्या के पावन दिन या उससे पहले किसी भी समय पितरों के नाम पर बेल का पौधा दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है.



















