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गोंडा के भैरवनाथ मंदिर में इमली के पेड़ में कील ठोकने से दूर होता है दांत का दर्द, हर धर्म के लोग पहुंचते हैं कर्नलगंजअध्यात्म
30 सित॰ 2026, 11:59 pm (44 मिनट पहले)· 0

गोंडा के भैरवनाथ मंदिर में इमली के पेड़ में कील ठोकने से दूर होता है दांत का दर्द, हर धर्म के लोग पहुंचते हैं कर्नलगंज

उत्तर प्रदेश के गोंडा स्थित भैरवनाथ मंदिर परिसर में मौजूद सैकड़ों साल पुराने इमली के पेड़ में कील गाड़कर दांत दर्द से राहत पाने की अनोखी परंपरा आज भी जारी है। मंगलवार और रविवार को यहां विभिन्न जिलों और अन्य राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के कर्नलगंज क्षेत्र में एक अनोखी आस्था देखने को मिलती है, जहां लोग दांत के गंभीर दर्द से निजात पाने के लिए किसी क्लिनिक के बजाय एक प्राचीन इमली के पेड़ के पास पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस पेड़ की लकड़ी में लोहे की कील ठोक देने से दांतों की तकलीफ पूरी तरह गायब हो जाती है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के चलते दूर-दराज के इलाकों से लोग इस स्थान की ओर खिंचे चले आते हैं।

ब्रिटिश कालीन इमली का वृक्ष और भैरवनाथ मंदिर की मान्यता

यह अनोखा पेड़ कर्नलगंज में स्थित प्रसिद्ध भैरवनाथ मंदिर के परिसर में मौजूद है। मंदिर के महंत रमाशंकर गिरी के अनुसार, यह इमली का पेड़ कई पीढ़ियों पुराना है और इसका इतिहास ब्रिटिश शासन काल से जुड़ा हुआ है। अब तक सैकड़ों लोग इस पेड़ के तने में कीलें गाड़ चुके हैं। मंदिर आने वाले कई पीड़ितों का दावा है कि इस साधारण से दिखने वाले पारंपरिक उपाय को अपनाने के तुरंत बाद उनके दांतों की असहनीय पीड़ा शांत हो गई।

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व्यक्तिगत उपस्थिति और कील ठोकने का विशेष नियम

इस अनुष्ठान को लेकर एक कड़ा नियम यह है कि पीड़ित व्यक्ति को स्वयं मंदिर परिसर में उपस्थित होना अनिवार्य होता है। महंत रमाशंकर गिरी स्पष्ट करते हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के नाम पर कील भेजकर राहत नहीं पा सकता है। जिस व्यक्ति को दांत में दर्द की समस्या है, उसे खुद कर्नलगंज आना पड़ता है। वहां आने पर पीड़ित अपने दांत से लोहे की कील को स्पर्श कराता है और फिर बाबा बटुक भैरव का ध्यान करते हुए अपने ही हाथों से उस कील को इमली के तने में ठोक देता है।

मंगलवार और रविवार को जुटती है भारी भीड़

इस अनुष्ठान के लिए सप्ताह के दो दिन विशेष रूप से तय हैं। दांत दर्द से ग्रसित लोग मंगलवार और रविवार के दिन मंदिर पहुंचते हैं। महंत द्वारा झाड़-फूंक की प्रक्रिया पूरी कराने के बाद पीड़ित से पेड़ में कील गड़वाई जाती है। इस उपाय के लिए केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि अयोध्या, बनारस, प्रयागराज, बस्ती, श्रावस्ती, गोरखपुर, बलरामपुर, बहराइच समेत कई अन्य पड़ोसी जिलों और अन्य राज्यों से भी लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

गंगा-जमुनी तहजीब और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक

कर्नलगंज का यह भैरवनाथ मंदिर सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का भी अद्भुत उदाहरण पेश करता है। महंत रमाशंकर गिरी बताते हैं कि इस इमली के पेड़ पर केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग भी गहरी आस्था रखते हैं। दांतों की बीमारी से पीड़ित मुस्लिम और सिख श्रद्धालु भी मंदिर पहुंचते हैं और पूरे विश्वास के साथ बाबा बटुक भैरव का स्मरण करते हुए कील ठोकने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं।

सवाल-जवाब

दांत के दर्द के लिए इमली का यह पेड़ किस स्थान पर स्थित है?
यह पेड़ उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के कर्नलगंज स्थित भैरवनाथ मंदिर परिसर में मौजूद है।
इस इमली के पेड़ में कील ठोकने का अनुष्ठान किन दिनों किया जाता है?
यह अनुष्ठान मुख्य रूप से सप्ताह में दो दिन, मंगलवार और रविवार को आयोजित होता है।
क्या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से कील भिजवाई जा सकती है?
नहीं, नियम के अनुसार जिस व्यक्ति को दांत में दर्द है, उसे स्वयं आकर अपने हाथों से कील ठोकनी पड़ती है।
यह परंपरा कितनी पुरानी बताई जाती है?
मंदिर के महंत रमाशंकर गिरी के अनुसार यह पेड़ ब्रिटिश शासन काल से जुड़ा हुआ है और यह प्रथा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।
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