सनातन परंपरा में प्रत्येक मास की अपनी विशिष्ट महिमा बताई गई है, किंतु अगहन यानी मार्गशीर्ष मास को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पावन और फलदायी स्थान दिया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय भगवान श्री कृष्ण को अतिशय प्रिय है, जिसमें मुख्य रूप से भगवान विष्णु की अर्चना की जाती है। ऐसी आस्था है कि श्रीहरि के पूजन से माता लक्ष्मी स्वतः प्रसन्न हो जाती हैं और साधक के घर में धन-धान्य तथा समृद्धि का निरंतर वास बना रहता है।
भोर के स्नान और नित्य साधना का विशेष विधान
मार्गशीर्ष के दौरान पूजन की विधि काफी हद तक कार्तिक मास के नियमों के अनुरूप ही चलती है। इस कालखंड में श्रद्धालु ब्रह्ममुहूर्त में सूर्योदय होने से पूर्व शय्या त्यागकर पवित्र स्नान करते हैं और विधिपूर्वक ईश वंदना में लीन होते हैं। सागर के पुजारी विद्वत संघ के जिला अध्यक्ष पंडित शिव प्रसाद तिवारी के अनुसार, यदि इस पवित्र मास की दैनिक दिनचर्या में कुछ विशिष्ट आध्यात्मिक क्रियाओं को नियमित रूप से जोड़ लिया जाए, तो व्यक्ति को माता लक्ष्मी का अनुग्रह प्राप्त होने के साथ-साथ मोक्ष का मार्ग भी सुलभ होता है।
पौराणिक ग्रंथों में उल्लिखित सात प्रमुख अनुष्ठान
स्कंद पुराण तथा भागवत पुराण सहित विभिन्न वैदिक ग्रंथों में मार्गशीर्ष मास के दौरान किए जाने वाले कुछ सरल एवं अत्यंत प्रभावशाली नियमों का विशद उल्लेख मिलता है। इन उपायों को जीवन में धारण करने से मिलने वाले लाभ इस प्रकार हैं
- घी का पावन दीपक: स्कंद पुराण के निर्देशानुसार, जो भी आराधक इस मास में ईश्वर के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाता है, उसके भाग्य के बंद द्वार खुल जाते हैं और दुर्भाग्य दूर होता है।
- सूखी तुलसी का चंदन तिलक: भागवत पुराण के अनुसार, यदि भक्तजन सूखी तुलसी की काष्ठ को घिसकर तैयार किए गए चंदन का तिलक भगवान को अर्पित करते हैं, तो उन्हें सौ जन्मों के संचित पापों से छुटकारा मिलता है तथा इस जीवन में धन और ऐश्वर्य की प्रचुर वृद्धि होती है।
- तुलसी मंजरी से ईश वंदना: अगहन मास में तुलसी की मंजरी से भगवान की आराधना करने वाले मनुष्य को सौ जन्मों तक मोक्ष का सौभाग्य मिलता है और भौतिक जगत में भी विपुल संपत्ति की प्राप्ति होती है।
- शहद से नित्य अभिषेक: पंडित शिव प्रसाद तिवारी का कहना है कि सामान्य तौर पर शहद शरीर को निरोगी बनाता है, किंतु यदि अगहन मास में प्रतिदिन इसी शहद से प्रभु का अभिषेक संपन्न किया जाए, तो जीवात्मा को परलोक में स्वर्ग मिलता है। पुनर्जन्म होने की स्थिति में वह व्यक्ति अत्यंत उदार, परोपकारी और राजाओं जैसा वैभवशाली जीवन जीता है।
- दूध से पवित्र स्नान: सांसारिक जीवन में जाने-अनजाने हुए बड़े से बड़े दुष्कर्मों और पापों का शमन करने के लिए भगवान को शुद्ध दूध से स्नान कराया जाना चाहिए। इससे गंभीर पापों का भी नाश माना गया है।
- पूजन में शंख का नाद: देव वंदना के समय शंख की मंगलकारी ध्वनि करने से साधक के पितरों को परलोक में अत्यंत आदरणीय और विशेष स्थान प्राप्त होता है।
- हर क्रिया पर घंटी का नाद: पूजा के दौरान जब भी भगवान को स्नान कराया जाए, चंदन लगाया जाए, पुष्प व वस्त्र अर्पित किए जाएं अथवा दीप प्रज्ज्वलित किया जाए, तब प्रत्येक बार घंटी बजाने का विधान है। ऐसा करने से जातक को सौ चंद्रायण व्रत के समतुल्य पुण्य प्राप्त होता है।
गीता पाठ और वासुदेव मंत्र के निरंतर जप का प्रभाव
शास्त्रों के अनुसार, अगहन के पावन दिनों में श्रीमद्भगवद्गीता का पठन-पाठन करना अलौकिक फल प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, इस संपूर्ण माह में प्रतिदिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ द्वादशाक्षर मंत्र का अविराम जप करने से साधक के जीवन के समस्त संकट, रुकावटें और बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।



















