हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधाष्टमी का पावन पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह शुभ तिथि 19 सितंबर, शनिवार को पड़ रही है, जो कि कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद आती है। इस दिन को राधारानी के प्राकट्य दिवस के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है, विशेषकर ब्रज क्षेत्र के बरसाना और अन्य प्रमुख मंदिरों में भव्य पूजा, अभिषेक, भजन-कीर्तन और उत्सवों का आयोजन होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखकर विधि-विधान से श्रीकृष्ण और राधारानी की आराधना करने से जीवन की सभी परेशानियों का निवारण होता है और घर-परिवार में सुख-शांति का वास होता है। सनातन संस्कृति में राधा और कृष्ण को दो अलग सत्ताओं के रूप में नहीं, बल्कि एक ही ऊर्जा का अभिन्न अंग माना गया है। ऐसी मान्यता है कि राधाजी के बिना कृष्ण अपूर्ण हैं और कृष्ण के बिना राधा, इसीलिए मंदिरों में हमेशा राधा-कृष्ण की संयुक्त प्रतिमाओं के ही दर्शन होते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण और राधा का दिव्य प्रेम और मथुरा प्रस्थान
श्रीकृष्ण और राधारानी का प्रेम भारतीय भक्ति परंपरा में सबसे पवित्र, निष्काम और दिव्य प्रेम का प्रतीक माना जाता है। किंतु जब श्रीकृष्ण अपने प्रिय जनों और राधा को छोड़कर मथुरा चले गए थे, तब राधारानी के जीवन में एक नया और कठिन दौर शुरू हुआ। राधारानी के जाने के बाद भगवान कृष्ण ने किस प्रकार अपना जीवन व्यतीत किया और वृंदावन की क्या स्थिति हुई, यह भक्तों के लिए केवल एक कथा नहीं बल्कि भक्ति, त्याग और विरह की पराकाष्ठा है। प्राचीन लोककथाओं के अनुसार, जब कंस के अत्याचारों का संहार करने के लिए अक्रूरजी श्रीकृष्ण और बलराम को अपने साथ मथुरा ले गए, तो संपूर्ण वृंदावन में गोप-गोपियों के बीच असीम विरह और शोक छा गया। कृष्ण के जाने से पूरा वृंदावन सूना हो गया, वहां न तो पहले जैसी चहल-पहल रही और न ही कोई रासलीला जीवंत रही, क्योंकि हर कोई कृष्ण के बिछड़ने के गम में डूबा हुआ था।
राधारानी का विवाह और द्वारका की यात्रा
हालांकि धार्मिक कथाओं में ऐसा भी वर्णन मिलता है कि कृष्ण के जाने के बाद राधारानी पर इसका बाहरी रूप से कोई गहरा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वे दोनों भावनात्मक रूप से एक ही आत्मा थे, जिससे शारीरिक दूरियों का अधिक अंतर नहीं पड़ता था। कृष्ण के जाने के कुछ समय उपरांत राधारानी के जीवन में एक बड़ा मोड़ आया और परिवार तथा माता-पिता के दबाव के चलते उनका विवाह अन्यत्र कर दिया गया। पलों और वर्षों का यह चक्र बीतता गया, परंतु एक भी पल ऐसा नहीं गुजरा जब राधारानी ने श्रीकृष्ण का स्मरण न किया हो। एक दिन समयानुसार राधारानी अपने घर से चुपचाप निकल पड़ीं और द्वारका जा पहुँचीं।
राधा और कृष्ण की अंतिम भेंट और मान्यताएं
श्रीकृष्ण और राधा की अंतिम मुलाकात को लेकर विभिन्न धार्मिक परंपराओं और ग्रंथों में अलग-अलग मत और मान्यताएं प्रचलित हैं। ब्रज की लोक परंपराओं में रमण रेती, बरसाना और वृंदावन से जुड़ी कई कथाएं आज भी सुनाई जाती हैं। कुछ भक्त परंपराओं का मानना है कि कृष्ण के मथुरा जाने के बाद दोनों की कभी प्रत्यक्ष भेंट नहीं हुई, जबकि अन्य कथाओं में बाद के समय में मिलन का विस्तृत उल्लेख मिलता है। राधारानी के जीवन के अगले पड़ावों को लेकर विभिन्न वैष्णव संप्रदायों में भिन्न-भिन्न कथाएं मौजूद हैं, इसलिए उनके जीवन की इन घटनाओं को किसी एक निश्चित ऐतिहासिक विवरण के रूप में नहीं देखा जाता है। पौराणिक कथाओं और लोकमान्यताओं के अनुसार, पृथ्वी पर श्रीकृष्ण और राधा की आखिरी भौतिक मुलाकात कुरुक्षेत्र में लगे सूर्य ग्रहण के अवसर पर हुई थी। वहीं, दूसरी कुछ मान्यताएं यह भी बताती हैं कि द्वारका में ही दोनों की भेंट हुई थी, जहां श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने महल में देविका के रूप में नियुक्त किया था।
बांसुरी की अंतिम धुन और प्राण त्याग
लोक कथाओं में इस बात का भी बहुत सुंदर वर्णन मिलता है कि जब राधारानी इस नश्वर लोक को त्यागने वाली थीं, तब श्रीकृष्ण ने उनसे आग्रह किया कि यदि वे कुछ मांगना चाहती हैं तो मांग लें। परंतु राधारानी ने कोई भी अन्य वस्तु मांगने से मना कर दिया और केवल एक ही इच्छा व्यक्त की कि वे आखिरी बार श्रीकृष्ण को बांसुरी बजाते हुए देखना और सुनना चाहती हैं। श्रीकृष्ण ने तब ऐसी अत्यंत मधुर और सम्मोहक धुन बजाई कि हर सुनने वाला मंत्रमुग्ध रह गया और मानो संपूर्ण परिवेश ठहर गया, और उस बांसुरी के सुरों के मर्म को केवल राधारानी ही भली-भांति समझ पाई थीं। कृष्ण की बांसुरी की वही अंतिम धुन सुनते-सुनते राधारानी ने अपने प्राण त्याग दिए। इस घटना के पश्चात श्रीकृष्ण ने अपनी उस प्रिय बांसुरी को तोड़कर कोसों दूर फेंक दिया था, क्योंकि उस बांसुरी की हर धुन में असल मायनों में राधारानी ही बसती थीं।



















