राजस्थान के शेखावाटी इलाके में स्थित झुंझुनूं की धरती से समय-समय पर प्राचीन आस्था और कला के अनूठे प्रमाण सामने आते रहे हैं. कभी किसी गांव में खेत जोतते किसान के हल की नोक से जमीन के भीतर दबी पावन मूर्ति बाहर आ गई, तो कभी किसी पुराने मकान की नींव खोदते वक्त सदियों पुरानी नक्काशीदार प्रतिमा मिल गई. अलग-अलग दौर में और अलग-अलग इलाकों से निकली ये तमाम ऐतिहासिक धरोहरें आज झुंझुनूं स्थित जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ मंदिर में पूरी श्रद्धा के साथ स्थापित हैं. इस मंदिर परिसर में कदम रखते ही 976 साल पुरानी भगवान महावीर स्वामी की विशाल प्रतिमा से लेकर सैकड़ों वर्ष पुरानी लाल पत्थर की कलाकृतियां उस दौर की समृद्ध परंपरा की गवाही देती नजर आती हैं.
खुदाई से निकली भगवान महावीर स्वामी की 976 वर्ष पुरानी प्रतिमा
मंदिर परिसर का सबसे प्रमुख आकर्षण भगवान महावीर स्वामी की करीब सात फीट ऊंची आदमकद प्रतिमा है. इस पावन मूर्ति पर विक्रम संवत 1105 दर्ज है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह करीब 976 साल पुरानी है. इस कलाकृति में भगवान महावीर स्वामी की मुख्य पांच फीट की प्रतिमा के साथ परिग्रह का भी बहुत सुंदर और विस्तृत निर्माण किया गया है. यह दुर्लभ प्रतिमा बड़ का बालाजी मंदिर के समीप स्थित एक श्रावक के मकान में खुदाई कार्य के दौरान प्राप्त हुई थी. उस काल के शिल्पकारों द्वारा पत्थरों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी और अद्भुत शिल्पकला आज भी देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है.
पौसाल से लाकर स्थापित की गईं लाल पत्थर की तीन मूर्तियां
मंदिर के गर्भगृह में लाल पत्थर से तराशी गई तीन बेहद प्राचीन प्रतिमाएं भी सुशोभित हैं, जिन्हें करीब 800 वर्ष पुराना आंका गया है. इन तीनों में भगवान पार्श्वनाथ मूलनायक के रूप में मध्य में विराजमान हैं. उनके दायीं दिशा में भगवान ऋषभनाथ और बायीं ओर भगवान महावीर स्वामी की मनोहारी प्रतिमा स्थापित की गई है. वर्तमान मंदिर का निर्माण होने से पहले ये तीनों मूर्तियां श्रीमालों के मोहल्ले में मौजूद एक पौसाल में रखी हुई थीं. उस पौसाल में विचरण करने वाले जैन मुनि और संत प्रवास किया करते थे. कालांतर में जब मंदिर की व्यवस्था बनी, तब पूरे विधि-विधान के साथ इन्हें मंदिर में लाकर विराजित किया गया.
जीर्णोद्धार के दौरान वेदी के नीचे मिले 1887 के सिक्के और पूजन सामग्री
साल 2004 में मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान इतिहास से जुड़ा एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया. जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ संघ के सह सचिव सुशील जैन के अनुसार, उस समय मूर्तियों को अस्थायी रूप से हटाकर वेदियों का नए सिरे से निर्माण कराया जा रहा था. इसी प्रक्रिया में जब भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के नीचे की वेदी को खोदा गया, तो वहां से एक प्राचीन तांबे का सिक्का, तांबे का कलश, साबुत चावल, शुद्ध घी, चीनी और पूजन से संबंधित अन्य वस्तुएं बरामद हुईं. उस सिक्के पर साफ तौर पर वर्ष 1887 अंकित था. यह संपूर्ण सामग्री मूल रूप से उस समय रखी गई थी जब वेदी और प्रतिमा की स्थापना हुई थी. मंदिर की दूसरी मंजिल का निर्माण कार्य भी करीब 137 वर्ष पूर्व पूरा किया गया था.
नरहड़ और नांगल की जमीन से निकलीं अष्टधातु व पत्थर की प्रतिमाएं
जिले के अन्य गांवों से भी जमीन के नीचे छिपी अमूल्य प्रतिमाएं बाहर निकली हैं. मंदिर में स्थापित भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा पर विक्रम संवत 1031 उत्कीर्ण है. इसके अलावा मंदिर में अष्टधातु की छह अन्य दुर्लभ प्रतिमाएं भी पूजी जाती हैं. इनमें से भगवान पार्श्वनाथ, भगवान शांतिनाथ और एक अन्य प्रतिमा नरहड़ (चिड़ावा) क्षेत्र में जमीन से प्राप्त हुई थीं. वहीं भगवान मल्लीनाथ की भव्य प्रतिमा उदयपुरवाटी तहसील के नांगल गांव के एक खेत से मिली थी. नांगल में जब एक किसान खेत में हल चला रहा था, तभी हल टकराने पर जमीन के भीतर से यह पावन मूर्ति प्रकट हुई. मूर्ति के साथ ही चंदन घिसने वाला चकला और दो नक्काशीदार खंभे भी जमीन से निकले थे. आश्चर्य की बात यह रही कि भूमि से निकलते समय प्रतिमा की उंगलियों पर चंदन और केसर के ताजे लेप के स्पष्ट निशान मौजूद थे.
शेखावाटी की गौरवशाली शिल्पकला और संस्कृति का जीवंत केंद्र
झुंझुनूं के इस एकलौते मंदिर में जिले के अलग-अलग कोनों से मिले कई ऐतिहासिक अवशेष एक जगह सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें से कई मूर्तियों का निर्माण 9वीं और 10वीं सदी का माना जाता है, जबकि कई मूर्तियों पर विक्रम संवत की स्पष्ट तिथियां खुदी हुई हैं. यह पूरा संग्रह इस बात को प्रमाणित करता है कि शेखावाटी की धरा पर प्राचीन काल से ही जैन धर्म, मूर्तिकला और स्थापत्य का अत्यधिक विकसित केंद्र रहा है. कई पीढ़ियों के इतिहास और आस्था को अपने आंचल में समेटे यह मंदिर आज भी शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं दोनों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है.



















