सावन के पवित्र महीने में चारों ओर भगवान शिव की भक्ति का माहौल बना हुआ है। शिवालयों में तड़के से लेकर देर रात तक भक्तों की कतारें दिखाई दे रही हैं, जहां लोग सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना कर रहे हैं। गाजियाबाद के गोविंदपुरम क्षेत्र में स्थित संकट मोचन जलेश्वर महादेव मंदिर इस पावन अवधि में आस्था का एक विशेष केंद्र बनकर उभरा है। यह मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं, जल संरक्षण के संदेश, दिव्य शिवलिंग और पीपल के पेड़ से जुड़ी कथाओं के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य बिंदु बना हुआ है। यहां हर दिन हजारों भक्त दर्शन और पूजन के लिए पहुंच रहे हैं।
पीपल के पेड़ से भव्य मंदिर बनने की पौराणिक यात्रा
मंदिर के निर्माण और इसके नामकरण के पीछे एक दिलचस्प इतिहास जुड़ा हुआ है। मंदिर के पुजारी पंडित ओमप्रकाश शास्त्री के अनुसार, कई वर्ष पूर्व इस स्थान पर केवल एक विशाल एवं प्राचीन पीपल का पेड़ हुआ करता था। उस समय पीपल के पेड़ की छांव तले पवनपुत्र हनुमान जी की एक प्रतिमा स्थापित थी, जहां स्थानीय निवासी पूजा-अर्चना किया करते थे। कालक्रम में श्रद्धालुओं के सहयोग से यहां एक सुंदर और भव्य मंदिर परिसर का निर्माण कराया गया। चूंकि सनातन परंपरा में भगवान शिव को जल का अधिपति देव माना जाता है, इसलिए इस पावन धाम का नामकरण संकट मोचन जलेश्वर महादेव मंदिर किया गया। यहां आने वाले श्रद्धालु केवल अपनी पारिवारिक खुशहाली और व्यक्तिगत आरोग्यता की ही कामना नहीं करते, बल्कि लगातार गिरते भूजल स्तर और गहराते जल संकट से मुक्ति पाने के लिए भी महादेव के चरणों में विशेष प्रार्थना करते हैं। यह मंदिर समाज को प्रकृति और जल संपदा के संरक्षण का एक बहुत बड़ा संदेश देता है।
पीपल पर नाग-नागिन का बसेरा और प्रथम जल अर्पण की परंपरा
इस मंदिर की सबसे अद्भुत और अनूठी मान्यता यहां परिसर में स्थित उसी प्राचीन पीपल के पेड़ से जुड़ी हुई है। जनश्रुति और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पीपल के वृक्ष पर वर्षों से नाग-नागिन का एक जोड़ा निवास करता है। इसी आस्था के कारण मंदिर प्रबंधन और श्रद्धालुओं द्वारा एक विशेष परंपरा का पालन निष्ठापूर्वक किया जाता है। मंदिर में आने वाला कोई भी भक्त जब पूजा सामग्री लाता है, तो जल और दूध का पहला अर्पण शिवलिंग पर करने से पूर्व उसी पीपल के पेड़ की जड़ों पर किया जाता है। स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि पीपल पर रहने वाला यह नाग-नागिन का जोड़ा दिन में कम से कम दो बार वृक्ष से नीचे उतरकर मंदिर के भीतर स्थापित शिवलिंग के दर्शन करने आता है और पूजन के पश्चात पुनः पीपल के पेड़ पर लौट जाता है। इस आलौकिक घटना की मान्यता के कारण भक्त अत्यंत श्रद्धा के साथ पीपल वृक्ष की पूजा करते हैं।
शिवलिंग पर स्वयं निर्मित अखंड भारत का मानचित्र और ॐ की आकृति
मंदिर का मुख्य आकर्षण यहां गर्भगृह में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग है। इस शिवलिंग की बनावट और उस पर उकेरी गई आकृतियां हर किसी को अचंभित कर देती हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि शिवलिंग के धरातल पर प्राकृतिक रूप से अखंड भारत का मानचित्र और पवित्र ॐ की आकृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह किसी शिल्पी या मानव द्वारा बनाई गई नक्काशी नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा स्वयं निर्मित एक अद्भुत संरचना मानी जाती है। इसी अद्वितीय विशेषता के कारण यह शिवलिंग दूर-दूर से आने वाले शिवभक्तों के लिए गहरे कौतूहल और अगाध श्रद्धा का विषय बनी हुई है। मंदिर आने वाला हर श्रद्धालु इस अलौकिक शिवलिंग का दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस करता है।
संतान प्राप्ति की अटूट आस्था और पड़ोसी जिलों से श्रद्धालुओं का आगमन
संकट मोचन जलेश्वर महादेव मंदिर से एक और गहरी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है, जो निसंतान दंपतियों से संबंधित है। माना जाता है कि जिन दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो पा रही है, वे यदि सावन के महीने में सच्चे मन से भगवान जलेश्वर महादेव का व्रत, पूजन और जलाभिषेक करें, तो महादेव की कृपा से उनकी सूनी गोद भर जाती है और मनोकामना पूरी होती है। इसी अटूट विश्वास के कारण सावन के दौरान बड़ी संख्या में दंपति यहां आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। केवल गाजियाबाद ही नहीं, बल्कि आसपास के कई पड़ोसी जिलों जैसे दिल्ली, नोएडा, हापुड़ और मेरठ से भी भारी संख्या में भक्त गाड़ियों और पैदल जत्थों में मंदिर परिसर पहुंच रहे हैं। सावन के इस पावन पर्व पर यह मंदिर सनातन धर्म, जल चेतना और लोक आस्था का एक अत्यंत प्रखर केंद्र बना हुआ है।



















