उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में पवित्र सावन माह के प्रारंभ होते ही शिवालयों में भक्तों का तांता लगना शुरू हो जाता है। शहर में यूं तो कई ऐतिहासिक और प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं, लेकिन जागेश्वर मंदिर की महिमा और मान्यता सबसे अलग मानी जाती है। लगभग 300 वर्षों का समृद्ध इतिहास समेटे यह धाम अपने अद्भुत शिवलिंग के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात है। यहां स्थापित शिवलिंग के बारे में जनआस्था है कि यह 24 घंटों के भीतर तीन अलग-अलग रंगों में ढल जाता है। सुबह के समय हल्का ग्रे, दोपहर के समय भूरा और रात्रि काल में जेट ब्लैक रंग में परिवर्तित होने वाले इस शिवलिंग के दर्शन के लिए सावन के महीने में रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।
टीले पर गाय के दूध बहाने से खुला था पवित्र शिवलिंग का भेद
जागेश्वर धाम की उत्पत्ति और इसके नामकरण के पीछे 300 वर्ष पुरानी एक बेहद दिलचस्प पौराणिक व प्रामाणिक कथा जुड़ी हुई है। प्राचीन समय में जिस स्थान पर वर्तमान में यह विशाल मंदिर निर्मित है, वहां एक बहुत ऊंचा मिट्टी का टीला हुआ करता था। उस दौर में स्थानीय निवासी जागे निषाद नाम के एक व्यक्ति वहां रहते थे, जिनकी एक गाय प्रतिदिन चरने के लिए उसी टीले पर जाया करती थी। जब भी गाय शाम को चरकर घर वापस लौटती, तो उसके थनों में दूध नहीं बचता था। कई दिनों तक जब यह सिलसिला लगातार चलता रहा, तो जागे निषाद के मन में संदेह उत्पन्न हुआ और उन्होंने गाय की गतिविधियों पर नजर रखने का निश्चय किया।
एक दिन जागे निषाद चुपके से अपनी गाय का पीछा करते हुए उस ऊंचे टीले तक पहुंचे। वहां उन्होंने जो नजारा देखा, उसने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया। गाय टीले पर एक निश्चित स्थान पर खड़ी होकर अपने आप ही सारा दूध जमीन पर अर्पित कर रही थी। इस अलौकिक घटना को देखने के पश्चात ग्रामीणों की सहायता से उस स्थान की खुदाई करवाई गई। भूमि के भीतर गहराई में जाने पर भगवान शिव का एक अति प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। इस पावन शिवलिंग के प्रकटीकरण के पश्चात भक्तों ने उसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की। चूंकि इस दिव्य स्थल की खोज जागे निषाद के प्रयासों से हुई थी, इसलिए जनसामान्य ने उनके सम्मान में इस पावन धाम का नाम जागेश्वर मंदिर रख दिया। तब से लेकर आज तक यह मंदिर आसपास के तमाम जिलों के लोगों की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है।
दिन में तीन प्रहर बदलता है शिवलिंग का रंग
इस ऐतिहासिक मंदिर की सबसे अनोखी और कौतूहल पैदा करने वाली विशेषता यहां विराजित शिवलिंग का रंग बदलना है। स्थानीय श्रद्धालुओं और प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि यह शिवलिंग दिन के अलग-अलग प्रहर में तीन स्पष्ट रंग प्रस्तुत करता है। प्रातः काल की प्रथम पूजा के समय शिवलिंग का रंग हल्का ग्रे दिखाई देता है। जैसे-जैसे दिन चढ़ता है और दोपहर का समय होता है, इसका रंग बदलकर भूरा हो जाता है। वहीं संध्या और रात्रि की आरती के समय शिवलिंग पूरी तरह जेट ब्लैक रंग में नजर आने लगता है।
रंग बदलने की इस अनूठी मान्यता के कारण केवल कानपुर ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के जनपदों से भी लोग इस अद्भुत रूप के दर्शन करने आते हैं। श्रद्धालु इसे देवों के देव महादेव की अलौकिक शक्ति और चमत्कार का प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं। भक्तजन अत्यंत श्रद्धाभाव से शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा और जल अर्पित कर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
सावन मास में विशेष अनुष्ठान और मंदिर समिति की व्यवस्थाएं
सावन के पावन महीने के दौरान मंदिर परिसर का वातावरण पूरी तरह शिवमय हो जाता है। मंदिर के संयोजक जितेंद्र पांडे ने जानकारी देते हुए बताया कि इस पवित्र माह में मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजनों और अनुष्ठानों की श्रृंखला आयोजित की जाती है। तड़के मंगला आरती से लेकर देर रात तक सतत रूप से जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और महापूजा का क्रम जारी रहता है। विशेषकर सावन के सोमवार के दिन मंदिर में भक्तों की भीड़ कई गुना बढ़ जाती है।
पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव और बम-बम भोले के गगनभेदी जयकारों से निरंतर गुंजायमान रहता है। श्रद्धालु अपने परिवार की सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की मनोकामना लेकर भोलेनाथ के चरणों में शीश नवाते हैं। बढ़ती भीड़ को ध्यान में रखते हुए मंदिर समिति द्वारा श्रद्धालुओं की सुगम आवाजाही, सुरक्षा और जल अर्पण के लिए विशेष बैरिकेडिंग और कतारबद्ध दर्शन की उत्तम व्यवस्थाएं की गई हैं। लगभग तीन शताब्दियों से यह जागेश्वर धाम जन-जन के विश्वास और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।



















