तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के धार्मिक गलियारों में इन दिनों कार्तिक मास की रौनक अपने चरम पर है। हिंदू परंपराओं के अनुसार कार्तिक महीने को साधना, पूजा-पाठ और आराधना के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। इस पूरे महीने में भगवान शिव, उनके परिवार के सदस्यों और नाग देवताओं की पूजा करने की विशेष परंपरा है। इसी का परिणाम है कि तेलंगाना के नवुलूरू गांव में स्थित एक विशेष तीर्थ स्थल पर सुबह से लेकर शाम तक भक्तों का तांता लगा हुआ है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह देखते ही बनता है, क्योंकि इस क्षेत्र में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है।
123 फीट ऊंची भगवान कुमारस्वामी की विशाल प्रतिमा
इस तीर्थ स्थल की सबसे बड़ी और प्रमुख आकर्षण भगवान कुमारस्वामी की 123 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कुमारस्वामी महादेव शिव और माता पार्वती के सुपुत्र हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में श्रद्धालु इन्हें कार्तिकेय, मुरुगन, स्कंद और सुब्रह्मण्य स्वामी जैसे विभिन्न नामों से पूरे आदर और भक्ति भाव के साथ पूजते हैं। नवुलूरू में स्थापित यह विशालकाय प्रतिमा अपनी अद्भुत कला और भव्यता के कारण दूर से ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। कार्तिक मास के पवित्र अवसर पर इस巨大 प्रतिमा के प्रांगण में विशेष धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और भव्य दीपदान का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।
नागेंद्र स्वामी की स्वयंभू बांबी और उसकी मान्यताएं
इस भव्य प्रतिमा के बिल्कुल नजदीक ही नागेंद्र स्वामी की एक स्वयंभू बांबी मौजूद है, जिसका भक्तों के बीच बहुत गहरा आध्यात्मिक महत्व है। स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं का ऐसा विश्वास है कि यह नाग बांबी किसी मनुष्य द्वारा नहीं बनाई गई बल्कि यह अपने आप प्रकट हुई है। खासकर कार्तिक मास और नागुल चविती के पावन पर्व के दौरान इस पवित्र बांबी की पूजा करने का विशेष विधान है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने वाले दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और उनके घर-परिवार में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। महिलाएं बड़ी संख्या में पारंपरिक अनुष्ठानों का पालन करते हुए इस बांबी पर दूध, फल और फूल अर्पित करती हैं तथा अपने परिवार की खुशहाली और सदस्यों की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं।
साम्प्रदायिक सौहार्द और एकता का अनूठा केंद्र
नवुलूरू के इस पावन और प्रतिष्ठित स्थल की सबसे बड़ी और खास विशेषता यहां का अनोखा सामाजिक और धार्मिक भाईचारा है। इस पवित्र नाग बांबी और मंदिर परिसर में केवल हिंदू समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी पूरी श्रद्धा, विश्वास और सम्मान के साथ आकर सिर झुकाते हैं। आपसी मेल-मिलाप, सौहार्द और एकता का यह जीवंत दृश्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण देता है कि सच्ची भक्ति और आस्था किसी भी प्रकार के मजहब की मोहताज नहीं होती। कार्तिक मास की वजह से इस पूरे परिसर का वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय हो चुका है, जहां हर हर महादेव और सुब्रह्मण्य स्वामी के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज रहा है। मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों की सुविधा, सुचारू व्यवस्था और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर सभी आवश्यक पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी को भी किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।



















