दौसा एक्सप्रेसवे पर भीषण सड़क हादसा और जयपुर में शिक्षक भर्ती फर्जीवाड़ा उजागर, राजस्थान की बड़ी खबरेंपिता को स्वाभाविक अभिभावक मानते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया फैसला, एक महीने में ननिहाल पक्ष सौंपे मासूम की कस्टडीनेपाल आपदा में 400 शव मिलने से उपजा प्रबंधन संकट, उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में गंडक नदी उफान परसावन के पावन पर्व पर सिरोही में मावा और रबड़ी वाले घेवर की भारी बिक्री, केवल तीन दिनों तक रहता है इसका खास बाजारवर्ष 2027 में लगेंगे दो सूर्य ग्रहण और अगस्त में भारत में दिखेगा नजारा, जानें तारीखें और समय'टॉक्सिक' का दूसरे दिन का कारोबार धीमा, 64 फीसदी गिरावट के बावजूद 2 दिनों में फिल्म पहुंची ₹137.5 करोड़ के पारराजसमंद के जावद गांव में खस्ताहाल सड़कों और खेल मैदान की किल्लत ने बढ़ाई निकाय चुनाव 2026 की सरगर्मीएथेना फाउंडेशन ने सीज़न निवेशकों के टोकन खरीदे, ENA डिजिटल टोकन में 27 प्रतिशत का बड़ा उछालजयपुर के बस्सी में मिलावटखोरों पर खाद्य सुरक्षा टीम का छापा, 125 किलो संदिग्ध मिल्क केक नष्टसीमा पर तैनात जवानों के लिए बीकानेर से भेजी गईं हजारों राखियां, डाक विभाग के विशेष अभियान से जुड़ीं महिलाएं
वृंदावन में दुत्कार के बाद जागा हुनर, बिना ट्रेनिंग बांके बिहारी की कृपा से लड्डू गोपाल का अद्भुत श्रृंगार कर रहे संतोषधर्म
28 अग॰ 2026, 7:39 am (1 घंटे पहले)· 2

वृंदावन में दुत्कार के बाद जागा हुनर, बिना ट्रेनिंग बांके बिहारी की कृपा से लड्डू गोपाल का अद्भुत श्रृंगार कर रहे संतोष

मथुरा और वृंदावन की गलियों में काम मांगने पर मिले ताने ने एक साधारण युवक का जीवन बदल दिया। आज संतोष बिना किसी औपचारिक ट्रेनिंग के प्रतिदिन दर्जनों लड्डू गोपाल मूर्तियों का भव्य श्रृंगार करते हैं।

मथुरा और वृंदावन के पावन क्षेत्र में आस्था, समर्पण और कला का एक ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जो हर किसी को आश्चर्यचकित कर देता है। रोजगार की तलाश में भटकने और कड़े तानों की मार झेलने वाले एक साधारण युवक संतोष ठाकुर ने अपनी लगन और अटूट विश्वास के बल पर सफलता की एक नई कहानी लिखी है। किसी भी कला संस्थान या उस्ताद से औपचारिक प्रशिक्षण लिए बिना, वे आज रोजाना दर्जनों लड्डू गोपाल की मूर्तियों को दिव्य और अत्यंत सुंदर रूप प्रदान करते हैं। उनकी इस अनोखी कलात्मक प्रतिभा को देखने और अपने घर के आराध्य का विशेष श्रृंगार कराने के लिए न केवल स्थानीय लोग, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।

अपमान का दर्द और बांके बिहारी की चौखट पर समर्पण

संतोष ठाकुर के इस प्रेरणादायक जीवन सफर की शुरुआत एक बेहद कठिन और निराशाजनक परिस्थिति से हुई थी। करीब 12 साल पहले, जब वे आजीविका कमाने की तलाश में इधर-उधर भटक रहे थे, तब उन्होंने लड्डू गोपाल के श्रृंगार का हुनर सीखने का मन बनाया। इसी सिलसिले में जब वे एक स्थानीय व्यापारी और साहूकार के पास काम मांगने गए, तो उन्हें कोई मार्गदर्शन नहीं मिला। इसके विपरीत, साहूकार ने उन्हें ताने मारे, फटकारा और बेइज्जत करके अपनी दुकान से भगा दिया। इस कड़वे अनुभव से संतोष का मन अत्यंत दुखी हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत हारने के बजाय अपना दुख ईश्वर के चरणों में अर्पित करने का फैसला किया। वे सीधे वृंदावन स्थित विश्वप्रसिद्ध ठाकुर बांके बिहारी मंदिर पहुंचे और मंदिर की चौखट पर अपना मस्तक झुकाकर सच्चे मन से प्रार्थना की।

ये भी पढ़ें

बिना किसी प्रशिक्षण के जगी अलौकिक कलात्मक क्षमता

बांके बिहारी मंदिर की चौखट पर की गई अरदास संतोष के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। मंदिर से लौटने के बाद जब उन्होंने पहली बार लड्डू गोपाल की मूर्ति को अपने हाथ में लिया, तो उन्हें एक अद्भुत और अलौकिक बदलाव का अहसास हुआ। संतोष बताते हैं कि जैसे ही लड्डू गोपाल की प्रतिमा उनके हाथों में आती है, उनके हाथ स्वतः ही श्रृंगार और सजावट के लिए चलने लगते हैं। मूर्ति की बनावट के अनुसार कौन सा वस्त्र, कैसा मुकुट, किस रंग का संयोजन और कैसी माला सबसे ज्यादा शोभा बढ़ाएगी, यह सब विचार अपने आप उनके मस्तिष्क में आने लगते हैं। उन्होंने किसी भी उस्ताद या कारीगर से इस विधा की कोई ट्रेनिंग नहीं ली है; वे अपनी इस अनूठी प्रतिभा को पूरी तरह से ठाकुर बांके बिहारी की कृपा और दिव्य प्रेरणा का परिणाम मानते हैं।

12 घंटे की कठिन साधना और दैनिक कार्यप्रणाली

पिछले 12 वर्षों से संतोष लगातार लड्डू गोपाल के भव्य श्रृंगार का कार्य बड़ी ही निष्ठा, पवित्रता और भक्ति भाव के साथ कर रहे हैं। वे रोजाना लगभग 12 घंटे लगातार इस सेवा कार्य में लगे रहते हैं। इस दौरान वे प्रतिदिन औसतन 25 लड्डू गोपाल की मूर्तियों का पूरा श्रृंगार संपन्न करते हैं। उनके पास आने वाले प्रत्येक भक्त की इच्छा और भावना का वे पूरा ध्यान रखते हैं। भक्त जिस तरह का रूप या पोशाक संयोजन अपने लड्डू गोपाल के लिए चाहते हैं, संतोष ठीक वैसा ही सुंदर और आकर्षक श्रृंगार करके उन्हें सौंपते हैं। इस कठिन और बारीकी से भरे काम के बदले वे प्रति मूर्ति ₹200 से ₹400 तक का अत्यंत किफायती शुल्क लेते हैं।

भक्ति भाव में लीनता और 6 से अधिक राज्यों में फैला दायरा

श्रृंगार करते समय संतोष पूरी तरह से भक्ति रस में लीन हो जाते हैं। उनके लिए यह केवल एक व्यावसायिक काम नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण की प्रत्यक्ष सेवा का माध्यम है। उनके हाथ की सफाई और वस्त्र-आभूषणों के अनोखे चयन की ख्याति अब दूर-दूर तक फैल चुकी है। आज उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा हरियाणा, राजस्थान, बिहार, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों से लोग विशेष रूप से अपने घर स्थापित लड्डू गोपाल का श्रृंगार कराने वृंदावन आते हैं। कभी काम की भीख मांगने पर दुत्कारे गए संतोष आज अपनी अटूट आस्था, निरंतर प्रयास और उत्कृष्ट हुनर के बल पर न केवल आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि हजारों कृष्ण भक्तों के दिलों में एक आदरणीय स्थान भी बना चुके हैं।

सवाल-जवाब

संतोष लड्डू गोपाल का श्रृंगार कितने सालों से कर रहे हैं?
संतोष पिछले 12 सालों से लगातार लड्डू गोपाल की मूर्तियों का अद्भुत श्रृंगार कर रहे हैं।
वह एक दिन में कितनी मूर्तियों का श्रृंगार करते हैं?
वह प्रतिदिन लगभग 25 लड्डू गोपाल मूर्तियों का सुंदर और भव्य श्रृंगार तैयार करते हैं।
संतोष श्रृंगार का कितना शुल्क लेते हैं?
वह प्रति लड्डू गोपाल श्रृंगार का ₹200 से ₹400 तक का शुल्क लेते हैं।
उनके पास किन-किन राज्यों से श्रद्धालु आते हैं?
उनके पास उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, पंजाब, गुजरात और अन्य कई राज्यों से भक्त आते हैं।
संतोष प्रतिदिन कितने घंटे काम करते हैं?
वह रोजाना लगभग 12 घंटे लड्डू गोपाल के श्रृंगार का काम करते हैं।
क्या संतोष ने श्रृंगार की कोई औपचारिक ट्रेनिंग ली है?
नहीं, उन्होंने किसी व्यक्ति या संस्थान से श्रृंगार की ट्रेनिंग नहीं ली है; वे इसे बांके बिहारी का आशीर्वाद मानते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR