ब्रह्मांड की रचना और उसके शुरुआती दौर को समझने की दिशा में शोधकर्ताओं ने एक नया मील का पत्थर हासिल किया है। यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन यानी CERN के वैज्ञानिकों ने एक अनोखे प्रयोग के जरिए यह साबित कर दिया है कि प्राचीन काल के उस रहस्यमयी प्लाज्मा को अब बहुत छोटी टक्करों के माध्यम से भी तैयार किया जा सकता है। चूंकि ब्रह्मांड की शुरुआत का वह प्राकृतिक प्रारंभिक पदार्थ अब सीधे तौर पर उपलब्ध नहीं है, इसलिए प्रयोगशाला में किए जाने वाले ये छोटे महाविस्फोट हमें उन पलों की जानकारी देते हैं जब अंतरिक्ष अस्तित्व में आया था।
क्वार्क और ग्लुऑन की भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम को गहराई से समझने के लिए इसकी मूल पृष्ठभूमि को जानना जरूरी है। क्वार्क वे सूक्ष्म कण होते हैं जिनसे प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का निर्माण होता है। इसके बाद ये प्रोटॉन और न्यूट्रॉन मिलकर परमाणुओं की रचना करते हैं और अंततः हमारे आसपास की हर ठोस तथा तरल वस्तु इसी से बनती है। वहीं दूसरी ओर, ग्लुऑन अपने नाम के अनुरूप उन तत्वों को आपस में मजबूती से बांधकर रखते हैं।
जब ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई थी, तो उसके शुरुआती कुछेक माइक्रोसेकंड के दौरान क्वार्क और ग्लुऑन प्रोटॉन या न्यूट्रॉन के भीतर बंधे हुए नहीं थे। उस समय वे एक अत्यंत गर्म और पिघले हुए प्लाज्मा के रूप में मौजूद थे। जैसे-जैसे अंतरिक्ष का विस्तार होता गया और तापमान में गिरावट आई, वैसे-वैसे यह पदार्थ ठंडा हुआ और क्वार्कस ने मिलकर बड़े कणों का रूप ले लेना शुरू कर दिया।
छोटे पैमाने पर प्रयोग की सीमाएं
दशकों तक बड़े स्तर पर परमाणु टक्करों का अध्ययन करने के बाद भौतिकविद अब पदार्थ की इस विचित्र अवस्था की सीमाओं को मापने की कोशिश कर रहे हैं। विशेष रूप से वे यह देखना चाहते हैं कि किसी टक्कर के पैमाने को कितना छोटा किया जाए कि तब भी उसमें से निकलने वाले कणों का समूह किसी तरल बूंद की तरह व्यवहार करना जारी रखे।
फिजिकल रिव्यू लेटर्स में प्रकाशित एक हालिया शोध पत्र के अनुसार, CERN और दुनिया भर के वैज्ञानिकों की एक साझा टीम ने ऑक्सीजन-16 और नियॉन-20 का उपयोग करके इस विशेष पदार्थ को सफलतापूर्वक उत्पन्न कर दिखाया। ये दोनों ही तत्व सीसे के एक परमाणु के वजन के दसवें हिस्से से भी कम भारी हैं। गौरतलब है कि पहले सीसे को ही इस प्रकार का प्राचीन प्लाज्मा तैयार करने में सक्षम सबसे हल्के तत्वों में से एक माना जाता था।
वैज्ञानिकों की सफलता और निष्कर्ष
इस अध्ययन से जुड़े नीदरलैंड्स स्थित नील्स बोहर इंस्टीट्यूट के एक शोधकर्ता और सह-लेखक यू झोउ ने एक आधिकारिक बयान में अपनी बात रखते हुए कहा कि उन्होंने यह सीमा तय कर दी है कि प्राचीन पदार्थ को दोबारा बनाने के लिए परमाणु नाभिक कितने छोटे हो सकते हैं। उन्होंने इसे एक छोटा महाविस्फोट करार देते हुए बताया कि अब उन्हें इस बात की अधिक स्पष्ट जानकारी मिल चुकी है कि किसी पदार्थ को इस अत्यधिक अवस्था में बदलने के लिए किन बुनियादी परिस्थितियों की आवश्यकता होती है।
विशेषज्ञों ने यह पाया कि ऑक्सीजन और नियॉन के नाभिक आकार में बेहद छोटे होने के बावजूद, इनसे होने वाली टक्करों से ऐसे संकेत मिले जो क्वार्क-ग्लुऑन प्लाज्मा से मेल खाते थे। कुछ ही पलों के लिए यह नव-निर्मित पदार्थ एक तरल की तरह एक साथ फैलता हुआ दिखाई दिया और उसके बाद ठंडा होकर वापस सामान्य कणों में बदल गया।
यू झोउ ने आगे उम्मीद जताई कि इस सफलता की मदद से वैज्ञानिकों को यह समझने में आसानी होगी कि ब्रह्मांड की पहली शुरुआत के वक्त प्लाज्मा ने किस तरह का बर्ताव किया था। साथ ही यह भी साफ हो सकेगा कि कैसे वही प्लाज्मा बाद में उन ठोस पदार्थों में विकसित हुआ जिनसे आज यह पूरी दुनिया बनी हुई है।


















