यूरोप में पशुओं के जरिए फैलने वाले एक दुर्लभ संक्रमण ने अब इंसानों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। फ्रांस के लियोन शहर में शमोंडा वायरस से संक्रमित एक मरीज की जान चली गई, जिसे दुनिया भर में इंसानों के भीतर इस रोगाणु का पहला पुष्ट मामला माना जा रहा है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने साफ किया है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई, वह पहले से बेहद गंभीर बीमारी से जूझ रहा था और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक कमजोर थी। आधिकारिक बयान के अनुसार, रोगी को निधन से पहले तंत्रिका तंत्र से जुड़ी गंभीर जटिलताएं पैदा हो गई थीं, जिनका सीधा संबंध इसी रोगाणु के संक्रमण से माना जा रहा है।
संक्रमण का स्रोत और कीटों से फैलाव
प्रारंभिक वैज्ञानिक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि फ्रांस के इस मरीज को किसी कीट के काटने के बाद यह संक्रमण हुआ था। पशुओं के बीच इस रोगाणु के प्रसार का सबसे बड़ा माध्यम बाइटिंग मिज नाम का एक बेहद छोटा उड़ने वाला कीट होता है। यह परजीवी कीट जब किसी संक्रमित पशु का खून चूसता है और फिर दूसरे जीव को काटता है, तो संक्रमण तेजी से फैल जाता है। इंसानी मामले में भी इसी कीट के काटने को प्राथमिक वजह माना जा रहा है, हालांकि वैज्ञानिकों का जोर इस बात पर है कि स्वस्थ लोगों में इस तरह के गंभीर खतरे की आशंका बेहद कम होती है।
नाइजीरिया से लेकर यूरोप तक का सफर
शमोंडा वायरस कोई नया वायरस नहीं है। इसे पहली बार 1960 के दशक के मध्य में अफ्रीकी देश नाइजीरिया में खोजा गया था। इसके बाद के दशकों में अफ्रीका के कई हिस्सों और जापान में मवेशियों के बीच इसके छिटपुट संक्रमण सामने आते रहे हैं। इस रोगाणु का मुख्य पोषक मवेशियों को माना जाता है, क्योंकि गाय और बैलों में इसके लक्षण खुलकर सामने आते हैं। हालांकि यह वायरस भेड़ों और बकरियों को भी संक्रमित कर सकता है, लेकिन उन जानवरों में इसके स्पष्ट चिकित्सीय लक्षण दर्ज नहीं किए गए हैं।
यूरोप लंबे समय तक इस संक्रमण से पूरी तरह मुक्त माना जाता रहा था। लेकिन इसी साल गर्मियों के मौसम में स्थिति बदल गई, जब स्विट्जरलैंड के पशुधन में शमोंडा-यूरोप नाम का एक नया रूप सामने आया। इसके बाद यह बीमारी तेजी से फैली और जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, लिकटेंस्टीन, इटली और स्पेन के फार्मों में दर्ज की गई। स्पेन के कृषि, मत्स्य पालन और खाद्य मंत्रालय के अनुसार, यूरोप में इसके दो आनुवंशिक रूप, जिन्हें शमोंडा टाइप 1 और शमोंडा टाइप 2 कहा जाता है, सक्रिय हैं। फ्रांस के ही 37 प्रांतों में सितंबर की शुरुआत तक इन दोनों रूपों के मामले पशु फार्मों में दर्ज किए जा चुके थे।
पशुओं में दिखने वाले लक्षण और टीके का अभाव
जब बाइटिंग मिज किसी जानवर को काटता है, तो उसके शरीर में इस बीमारी के उभरने की अवधि केवल दो से तीन दिनों की होती है। संक्रमित पशुओं में तेज बुखार, दस्त और दूध उत्पादन में भारी गिरावट जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। सबसे गंभीर असर गर्भवती गायों पर पड़ता है, जहां यह वायरस गर्भपात की वजह बन सकता है या फिर पैदा होने वाले बछड़े के शरीर में गंभीर विकृतियां पैदा कर सकता है।
वर्तमान समय में इस वायरस से बचाव के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पशुपालकों और स्वास्थ्य एजेंसियों के पास केवल कीटनाशकों और कीट भगाने वाले रसायनों के इस्तेमाल का ही रास्ता बचता है। टीकों की कमी के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि आम जनता को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह इंसानी मामला पूरी तरह असाधारण परिस्थितियों में हुआ है।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य की निगरानी
वैज्ञानिक समुदाय इस घटना को काफी गंभीरता से ले रहा है, लेकिन वे इसे किसी व्यापक महामारी का संकेत नहीं मानते। ग्लासगो विश्वविद्यालय में वायरोलॉजी के प्रोफेसर बेन ब्रेनन ने स्पष्ट किया कि रोगी पहले से गंभीर बीमारी से पीड़ित था, जिसके चलते संक्रमण का खतरा बढ़ा और मौत में इस रोगाणु की सटीक भूमिका की जांच जारी है।
वहीं स्पेन के गेम एंड वाइल्डलाइफ रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डेविड रोइज़ का कहना है कि उष्णकटिबंधीय इलाकों में स्तनधारियों के बीच ऐसे रोगाणु आम हैं, जो कभी-कभार इंसानों तक पहुंच जाते हैं। उनके अनुसार बदलती जलवायु और वैश्वीकरण के दौर में पशुओं और सामानों की आवाजाही के कारण ऐसे मामले सामने आना असामान्य नहीं है। स्वास्थ्य एजेंसियों को भयभीत होने के बजाय लगातार निगरानी रखने और सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।



















