मध्यावधि चुनाव में हार के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान सैन्य कार्रवाई का किया बचाव, कहा- परमाणु खतरा रोकना जरूरी थामानसा में परविंदर सिंह झोटा मामले में पंजाब सरकार और इंसाफ कमेटी में समझौता, 6 नवंबर को होगा अंतिम संस्कारक्लासरूम में गूगल की एआई नीति पर विवाद के बीच डकडकगो ने स्कूलों के सामने रखा विकल्पक्लोज्ड लैब से पैदा हो रहे बड़े खतरे, ओपन सोर्स एआई खत्म कर सकता है एकाधिकार: हगिंग फेसओपन सोर्स एआई पर काम शुरू करने से पहले जरूरी सावधानियां और रणनीतियांअमेरिकी मध्यावधि चुनाव नतीजों के बाद कच्चे तेल में भारी गिरावट, डब्ल्यूटीआई 9 फीसदी टूटाविदेशी और अनिवासी निवेशकों को सेबी का तोहफा, डिजिटल केवाईसी से भारत आए बिना शुरू होगा निवेशहल्के डिजाइन और दमदार लेटेंसी के साथ गेमिंग के लिए कैसा है ATK Dragonfly A9 Plusचेन्नई ओपन में हार के बाद ब्रिटिश टेनिस खिलाड़ी जोडी बरेज को मिली जान से मारने की धमकियां, डब्लूटीए ने शुरू की सुरक्षा जांचनाश्ते में ओट्स खाने वाले न करें ये चार गलतियां, फायदे के बदले बिगड़ सकती है सेहत
जमीन के नीचे चींटियों का हैरतअंगेज महानगर, 10 टन सीमेंट भरकर वैज्ञानिकों ने बाहर निकाला साम्राज्यविज्ञान
3 नव॰ 2026, 10:30 pm (1 दिन पहले)· 0

जमीन के नीचे चींटियों का हैरतअंगेज महानगर, 10 टन सीमेंट भरकर वैज्ञानिकों ने बाहर निकाला साम्राज्य

ब्राजील में वैज्ञानिकों ने अट्टा लेविगाटा प्रजाति की चींटियों के एक विशाल भूमिगत ढांचे में तरल सीमेंट भरकर उनकी हैरतअंगेज बनावट को उजागर किया है। 500 वर्ग फीट और 26 फीट गहराई में फैली इस संरचना में कचरा प्रबंधन, खेती और प्राकृतिक वेंटिलेशन की आधुनिक इंसानी शहरों जैसी व्यवस्था मिली।

प्रकृति की दुनिया इंसानी कल्पना से कहीं अधिक समृद्ध और जटिल है। ब्राजील में शोधकर्ताओं ने जमीन के नीचे छिपे चींटियों के एक ऐसे विशाल और हैरान कर देने वाले साम्राज्य की खोज की है, जिसकी बनावट किसी आधुनिक इंसानी महानगर से कम नहीं लगती। अट्टा लेविगाटा प्रजाति की इन चींटियों ने जमीन के भीतर सैकड़ों कमरों, चौड़ी गलियारों और मजबूत सुरंगों का एक बेहद सुनियोजित जाल तैयार कर रखा था। इस अविश्वसनीय दुनिया की बनावट को बिना किसी नुकसान के देखने के लिए शोधकर्ताओं ने एक अनूठी वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया, जिससे इस भूमिगत शहर का हर एक कोना हूबहू बाहर आ गया।

तरल सीमेंट से बाहर आया 500 वर्ग फीट का भूमिगत साम्राज्य

चींटियों के इस विशाल घोंसले के सटीक नक्शे और उसकी जटिल वास्तुकला को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पारंपरिक फावड़े या मशीनी खुदाई को किनारे कर दिया। अगर सामान्य तरीके से खुदाई की जाती तो चींटियों की नाजुक सुरंगें ढह सकती थीं। इसलिए शोधकर्ताओं ने घोंसले के ऊपरी मुहानों से लगभग 10 टन तरल सीमेंट अंदर डाला। यह सीमेंट धीरे-धीरे रिसते हुए घोंसले की संकरी से संकरी गलियों, मुख्य मार्गों और विशाल कक्षों तक पहुंचता रहा। इस पूरी प्रक्रिया में सीमेंट को भीतर तक फैलने में लगभग 10 दिनों का समय लगा।

ये भी पढ़ें

जब सीमेंट पूरी तरह सूखकर ठोस चट्टान में तब्दील हो गया, तब वैज्ञानिकों ने आसपास की मिट्टी को बड़ी सावधानी से हटाना शुरू किया। इसके बाद जो ढांचा सामने आया, उसने सभी को दंग कर दिया। यह पूरी भूमिगत संरचना करीब 500 वर्ग फीट के दायरे में फैली हुई थी और जमीन के भीतर लगभग 8 मीटर यानी 26 फीट की गहराई तक पहुंची हुई थी। लाखों-करोड़ों चींटियों के इस विशाल ठिकाने में रानी चींटी और उसके अंडों व बच्चों के लिए घोंसले के सबसे निचले और सबसे महफूज हिस्से में विशेष चेंबर बनाए गए थे, जहां जमीन के भारी दबाव का भी कोई असर नहीं पड़ता था। वैज्ञानिकों ने चींटियों के इस विशाल श्रम और इंजीनियरिंग कौशल की तुलना चीन की महान दीवार से की है।

40 टन मिट्टी हटाकर गढ़ी गई अटूट इंजीनियरिंग

इस पूरे भूमिगत शहर को बनाने के लिए चींटियों की पूरी कॉलोनी ने सामूहिक रूप से कड़ी मेहनत की थी। अनुमान के मुताबिक चींटियों ने मिलकर जमीन से लगभग 40 टन मिट्टी खोदकर बाहर निकाली थी। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि चींटियों को मिट्टी की बनावट, उसकी मजबूती और दबाव संतुलन की बहुत गहरी प्राकृतिक समझ थी। उन्होंने अपनी सुरंगों और चैंबरों की रूपरेखा इस वैज्ञानिक अंदाज में डिजाइन की थी कि ऊपर मौजूद टन भर मिट्टी का भार बराबर हिस्सों में बंट जाता था, जिससे सुरंगें कभी धंसती नहीं थीं। बिना किसी नक्शे या मशीनों के तैयार यह ढांचा चींटियों की अद्भुत सामूहिक बुद्धिमत्ता को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करता है।

फंगस चेंबर्स में सुनियोजित किसानी और खाद्य प्रबंधन

चींटियों का यह नगर केवल रहने का ठिकाना नहीं था, बल्कि यहां भोजन के उत्पादन और भंडारण की भी स्वायत्त व्यवस्था थी। चींटियों ने घोंसले के भीतर विशेष अंडाकार कमरे तैयार किए थे, जिन्हें फंगस चेंबर्स कहा जाता है। चींटियां बाहर से पेड़-पौधों की पत्तियां काटकर लाती थीं और उन्हें इन कमरों में जमा करती थीं। इन्हीं चबाकर रखी गई पत्तियों पर उनकी मुख्य खुराक, यानी विशेष किस्म का फंगस उगाया जाता था।

इन कमरों के भीतर नमी और तापमान का संतुलन इस तरह से नियंत्रित रहता था कि फंगस की खेती में कोई रुकावट न आए। चींटियों का पूरा समाज अपनी नियमित खाद्य सुरक्षा के लिए इन्हीं खेती वाले कमरों पर निर्भर रहता था। यह व्यवस्था साबित करती है कि इंसान की तरह ही चींटियां भी योजनाबद्ध तरीके से खेती, संरक्षण और भोजन प्रबंधन की कला में पूरी तरह निपुण हैं।

कचरा निपटान के लिए अलग रिफ्यूज चेंबर्स और सैनिटेशन

इतनी विशाल आबादी के एक साथ रहने पर संक्रमण और महामारियों का खतरा स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है, लेकिन चींटियों ने इसका भी एक आधुनिक समाधान निकाला हुआ था। घोंसले को परजीवियों और जानलेवा बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए चींटियों ने मुख्य कॉलोनी से काफी दूरी पर और सबसे निचले स्तर पर अलग से कचरा घर बनाए थे, जिन्हें रिफ्यूज चेंबर्स कहा जाता है।

सड़ी-गली पुरानी पत्तियां, मृत चींटियों के अवशेष और बेकार हो चुका पुराना फंगस इसी कचरा घर में डालकर बंद कर दिया जाता था। कचरे को मुख्य आबादी और भोजन वाले कमरों से दूर रखने की इस समझदार रणनीति की वजह से पूरी कॉलोनी में कभी कोई संक्रमण नहीं फैलता था। चींटियों का यह सैनिटेशन और वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम आधुनिक इंसानी ड्रेनेज और सीवेज तंत्र से काफी मिलता-जुलता दिखाई देता है।

हाईवे जैसी सुरंगें और प्राकृतिक चिमनी इफ़ेक्ट से वेंटिलेशन

चींटियों द्वारा बनाई गई सुरंगें कोई बेतरतीब या टेढ़ी-मेढ़ी नालियां नहीं थीं, बल्कि वे आज के हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे की तरह बिल्कुल सीधी, चौड़ी और स्पष्ट थीं। इन चौड़े रास्तों का मुख्य उद्देश्य भारी पत्तियों को तेजी से अंदर खींचना और पूरे परिसर में ऑक्सीजन का निर्बाध प्रवाह बनाए रखना था।

लाखों चींटियों की मौजूदगी और फंगस की जैविक खेती की वजह से जमीन के भीतर काफी गर्मी पैदा होती है। इसे बाहर निकालने के लिए घोंसले में एक प्राकृतिक चिमनी इफ़ेक्ट काम करता था। गर्म और हल्की हवा मुख्य रास्तों से होकर ऊपर की तरफ बाहर निकल जाती थी, जिससे खाली हुई जगह को भरने के लिए बाहर की ताजी और ठंडी हवा अपने आप नीचे खिंच आती थी। इस प्राकृतिक वेंटिलेशन के कारण जमीन के 26 फीट नीचे भी तापमान हमेशा ठंडा, स्थिर और अनुकूल बना रहता था।

भविष्य के इंसानी निर्माण के लिए बनी बड़ी प्रेरणा

इस सीमेंट कास्टिंग के जरिए वैज्ञानिकों को चींटियों के इस भूमिगत शहर का अध्ययन करने का एक अभूतपूर्व अवसर मिला है। इससे यह स्पष्ट हुआ है कि किस तरह बिना किसी केंद्रीय नियंत्रण, तकनीकी ब्लूप्रिंट या आधुनिक मशीनों के भी एक विशाल, टिकाऊ और सुरक्षित ढांचा खड़ा किया जा सकता है। शोधकर्ता अब इस बात की गहन पड़ताल कर रहे हैं कि चींटियों की इस प्राकृतिक मिट्टी इंजीनियरिंग और हवा के संचलन की तकनीकों का उपयोग भविष्य के इंसानी निर्माण, सुरंगों की डिजाइनिंग और ऊर्जा कुशल इमारतों को विकसित करने में किस तरह किया जा सकता है।

सवाल-जवाब

शोधकर्ताओं ने चींटियों के घोंसले में कितना सीमेंट डाला था?
वैज्ञानिकों ने चींटियों के पूरे घोंसले और उसकी सुरंगों को भरने के लिए लगभग 10 टन तरल सीमेंट डाला था, जिसे अंदर जमने में 10 दिनों का समय लगा।
यह भूमिगत ढांचा कितना बड़ा और कितना गहरा था?
यह पूरी संरचना लगभग 500 वर्ग फीट के क्षेत्र में फैली हुई थी और जमीन के भीतर 8 मीटर यानी करीब 26 फीट की गहराई तक बनी थी।
इस शहर को बनाने में चींटियों ने कितनी मिट्टी खोदी थी?
चींटियों की इस विशाल कॉलोनी ने इस पूरे भूमिगत शहर के निर्माण के दौरान लगभग 40 टन मिट्टी खोदकर जमीन से बाहर निकाली थी।
चींटियों के घोंसले में फंगस चेंबर्स का क्या काम था?
फंगस चेंबर्स में चींटियां पत्तियां जमा करके उन पर अपनी मुख्य खुराक के रूप में फंगस उगाती थीं, जो उनके भोजन का प्राथमिक स्रोत था।
चींटियों ने बीमारी और संक्रमण से बचने के लिए क्या व्यवस्था की थी?
उन्होंने मुख्य घोंसले से दूर और सबसे निचले हिस्से में रिफ्यूज चेंबर्स बनाए थे, जहां सड़ी पत्तियां, मृत चींटियां और कचरा बंद कर दिया जाता था।
जमीन के 26 फीट नीचे घोंसला ठंडा कैसे रहता था?
घोंसले में प्राकृतिक चिमनी इफ़ेक्ट काम करता था, जिससे अंदर की गर्म हवा मुख्य रास्तों से बाहर निकलती थी और बाहर की ताजी ठंडी हवा अंदर खिंच आती थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp