परमाणु संयंत्र के मलबे और वीराने में चार दशकों से जीवन बिता रहे लावारिस कुत्तों की वंशावली ने जीव विज्ञान के सामने एक अनोखी पहेली खड़ी कर दी है। साइंस जर्नल जीन्स में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन के अनुसार, यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र परिसर में मौजूद कुत्तों की आबादी में जैविक बदलाव किसी आकस्मिक आनुवंशिक विचलन का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह सक्रिय प्राकृतिक चयन की ओर इशारा करते हैं। जब विज्ञान कथाओं में परमाणु विकिरण के कारण जीवों में तुरंत नए उत्परिवर्तन यानी म्यूटेशन होने की कल्पना की जाती है, तब वास्तविक आणविक विश्लेषण एक अधिक व्यावहारिक और जटिल प्रक्रिया को उजागर कर रहा है।
दो अलग-अलग दुनिया: संयंत्र के श्वान बनाम चेरनोबिल शहर
शोधकर्ताओं ने परमाणु ऊर्जा संयंत्र के ठीक आसपास रहने वाले श्वानों के डीएनए नमूनों का अध्ययन किया और उनकी तुलना संयंत्र से लगभग 16 किलोमीटर दूर चेरनोबिल शहर में रहने वाले कुत्तों से की। इसके साथ ही इन आंकड़ों की तुलना विश्व भर की अन्य श्वान आबादियों के जेनेटिक प्रोफाइल से भी की गई। इस जांच में दोनों समूहों के बीच का फासला बेहद चौंकाने वाला निकला।
नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी की पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता और इस अध्ययन की प्रमुख लेखक मेगन डिलन ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि चेरनोबिल शहर में रहने वाले कुत्ते जेनेटिक रूप से संयंत्र के कुत्तों की तुलना में गैलापागोस द्वीप समूह के कुत्तों के अधिक करीब दिखते हैं। केवल 16 किलोमीटर के भौतिक अंतर पर आनुवंशिक स्तर पर इतनी भारी दूरी मिलना यह साबित करता है कि संयंत्र क्षेत्र में रहने वाले कुत्तों पर बहुत अलग किस्म के दबाव काम कर रहे थे।
संयोग नहीं, प्राकृतिक चयन की स्पष्ट छाप
वैज्ञानिकों ने जब दोनों आबादियों के आनुवंशिक संरचना के अंतर का विश्लेषण किया, तो यह बात सामने आई कि केवल आकस्मिक संयोग या रैंडम जेनेटिक ड्रिफ्ट इस खाई की व्याख्या नहीं कर सकता। डेटा से यह स्पष्ट संकेत मिला कि संयंत्र स्थल पर मौजूद कुत्तों की वंशावली दशकों से लगातार प्राकृतिक चयन की कसौटी से गुजर रही है।
मेगन डिलन ने विश्लेषण के शुरुआती पलों को याद करते हुए बताया कि जब वह पहली बार डेटा प्रोसेस कर रही थीं, तो उन्हें कुछ पल रुककर यह आश्वस्त करना पड़ा कि उनकी गणना और विधियां पूरी तरह सही हैं, क्योंकि सामने आ रहे परिणाम बेहद दिलचस्प और अप्रत्याशित थे।
डीएनए मरम्मत और सुरक्षा देने वाले जीन का उभार
इस अध्ययन में जिस बिंदु ने सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया, वह था कि प्राकृतिक चयन का सबसे गहरा दबाव किन विशिष्ट जीनोमिक क्षेत्रों पर देखा गया। ये क्षेत्र मुख्य रूप से डीएनए मरम्मत, रोग प्रतिरोधक क्षमता और कोशिकीय उत्तरजीविता से जुड़े कार्यों का संचालन करते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि संयंत्र के कुत्तों में जो आनुवंशिक भिन्नताएं आज बहुतायत में दिख रही हैं, वे कठिन पर्यावरणीय तनावों का सामना करने के लिए सीधे तौर पर प्रासंगिक हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये लक्षण अनिवार्य रूप से विकिरण की वजह से पैदा हुए बिल्कुल नए म्यूटेशन नहीं हैं। इसके विपरीत, यह अधिक संभावना है कि जब 1986 में हादसा हुआ था, तब स्थानीय कुत्तों में पहले से ही एक उच्च स्तर की आनुवंशिक विविधता मौजूद थी। मेगन डिलन के अनुसार, परमाणु संयंत्र में बची शुरुआती आबादी के पास शायद पहले से ऐसा आनुवंशिक ढांचा था जो उन्हें इन कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने में मदद कर सके। बीते 40 वर्षों के दौरान अनुकूल वेरिएंट्स वाली यह जेनेटिक किट आबादी में अधिक सामान्य होती चली गई।
कई पर्यावरणीय कारक और एक अनसुलझा सवाल
यद्यपि अध्ययन स्पष्ट रूप से प्राकृतिक चयन की उपस्थिति की पुष्टि करता है, फिर भी वैज्ञानिक अभी तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि वास्तव में किस पर्यावरणीय कारक ने इन जीनोमिक वेरिएंट्स को आगे बढ़ाया। मेगन डिलन ने बताया कि भले ही जैविक रूप से महत्वपूर्ण जीनों के आसपास चयन के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं, फिर भी यह अंतिम रूप से नहीं कहा जा सकता कि यह सीधे तौर पर कुत्तों द्वारा झेले गए विकिरण जोखिमों से ही जुड़ा है।
1986 में हुए परमाणु विस्फोट और खाली कराए जाने के दौरान पीछे छूटे पालतू जानवरों के वंशज होने के कारण इन श्वानों ने केवल विकिरण ही नहीं झेला है। उन्होंने यूक्रेन की जमा देने वाली भयंकर सर्दियों का सामना किया है और इस इलाके में जमा हुए कीटनाशकों तथा भारी धातुओं जैसे जहरीले रासायनिक प्रदूषकों के बीच जीवन बिताया है। इनमें से कई संदूषकों की कार्यप्रणाली और जैविक प्रभाव एक जैसे होते हैं, जिससे किसी एक अकेले कारक की भूमिका को अलग करना शोधकर्ताओं के लिए अत्यधिक कठिन हो जाता है।
ऐतिहासिक नमूनों की कमी और तकनीक की सीमाएं
अध्ययन की एक बड़ी वैज्ञानिक सीमा यह है कि वैज्ञानिकों के पास समय के साथ हुए बदलावों को चरणबद्ध तरीके से ट्रैक करने के लिए शुरुआती दशकों के आनुवंशिक नमूने मौजूद नहीं हैं। नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी में जीनोमिक्स के प्रोफेसर और अध्ययन के वरिष्ठ लेखक मैथ्यू ब्रीन ने इस चुनौती की तुलना एक एकल स्थिर तस्वीर देखकर यह अनुमान लगाने से की कि उससे पहले वास्तव में क्या घटा था। ब्रीन के अनुसार, दुर्घटना के ठीक बाद के शुरुआती कुछ वर्ष सबसे महत्वपूर्ण समय रहे होंगे, और यदि चयन की कोई प्रक्रिया हुई थी, तो उसी दौर में घटित हुई होगी।
दुर्घटना के वर्ष 1986 में किसी भी जीव, यहां तक कि बैक्टीरिया का भी पूर्ण जीनोम अनुक्रम तैयार करना संभव नहीं था। उस दौर में इंग्लैंड में एक शोध छात्र के रूप में काम कर रहे मैथ्यू ब्रीन ने अपनी यादें साझा करते हुए बताया कि जब पश्चिमी यूरोप के ऊपर से रेडियोधर्मी बादल गुजरे थे, तब वह वेल्श की पहाड़ियों में चरागाहों से भेड़ों को एकत्र करने वाली एक परियोजना में शामिल थे। उस समय उपलब्ध तकनीकों से डेटा में कुछ खास नहीं दिखा था, लेकिन आज तकनीक बहुत बदल चुकी है। इसके अलावा, वे भेड़ें पीढ़ियों तक किसी परमाणु मेल्टडाउन के केंद्र में नहीं रह रही थीं।
वीराने में लौटता वन्यजीवन और प्रकृति की ताकत
हादसे के लगभग चार दशक बीत जाने के बाद, मानवीय गतिविधियों के खत्म होने से चेरनोबिल का एक्सक्लूजन जोन एक अभयारण्य में तब्दील हो चुका है। अब इस क्षेत्र में भेड़िए, हिरण, जंगली सूअर और लिंक्स जैसे वन्यजीव स्वतंत्र रूप से घूम रहे हैं। वैज्ञानिकों ने देखा है कि क्षेत्र में मौजूद भेड़ियों की आबादी में भी कुत्तों की तरह ही कुछ जीनोमिक भिन्नताएं विकसित हुई हैं।
मानव जनित तबाही के बाद पर्यावरण की वापसी पर टिप्पणी करते हुए मैथ्यू ब्रीन ने कहा कि यह इंसानी आपदाओं के सामने प्रकृति के लचीलेपन और दृढ़ता का एक बड़ा उदाहरण है। जब किसी तंत्र को एक दिशा में धकेला जाता है, तो वह उसके जवाब में या तो वापस पलटवार करता है या आगे का रास्ता बदल लेता है। चेरनोबिल में जीवों का यह आनुवंशिक विकास प्रकृति के उसी अनुकूलन का सजीव प्रमाण है।



















