सहारा रेगिस्तान की तपती रेत सदियों से पृथ्वी और पूरे सौर मंडल के प्राचीन इतिहास को अपने सीने में समेटे हुए है। वैज्ञानिक इस विशाल मरुस्थल से 4 करोड़ साल पुराने जीवाश्मों से लेकर अंतरिक्ष से गिरे दुर्लभ उल्कापिंडों तक की खोज करते रहे हैं। उदाहरण के लिए, साल 2019 में यहाँ 4.5 अरब साल पुराना एक ऐसा टुकड़ा मिला था, जिसके बारे में हालिया शोध संकेत देते हैं कि वह चंद्रमा जितने बड़े किसी प्राचीन और अब गायब हो चुके प्रोटोप्लैनेट का हिस्सा हो सकता है। इसी रेगिस्तान में मिला एक और टुकड़ा वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का नया केंद्र बन गया है, जो पृथ्वी के पड़ोसी लाल ग्रह यानी मंगल के अनसुलझे अतीत की परतें खोल रहा है।
तेघाज़ा 001: मंगल ग्रह का एक अनोखा भूगर्भीय नमूना
इस दुर्लभ उल्कापिंड को तेघाज़ा 001 (Teghaza 001) नाम दिया गया है। आमतौर पर पृथ्वी पर मिलने वाले अधिकांश उल्कापिंड मंगल की रासायनिक बनावट और उसकी भूगर्भीय संरचना को समझने में बेहद मददगार साबित होते हैं, मगर वे लाल ग्रह के प्राचीन पर्यावरण और वायुमंडलीय हालात के बारे में सीमित जानकारी ही दे पाते हैं। इसके उलट, साइंस और साइंस एडवांसेज पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध अध्ययनों की एक श्रृंखला से सामने आया है कि तेघाज़ा 001 बाकी सभी पत्थरों से बिल्कुल अलग है। यह चट्टान न केवल असाधारण रूप से पुरानी है, बल्कि इसमें मंगल ग्रह की पपड़ी यानी क्रस्ट और उसके प्राचीन जलमंडल के बीच हुए रासायनिक संपर्कों के साफ़ निशान सुरक्षित हैं। नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी के वैज्ञानिक यांग लियू ने बताया कि शोध पत्र के समीक्षकों में से एक ने इसे मंगल ग्रह के लिए रोज़ेटा स्टोन करार दिया है।
एपेटाइट खनिज और प्राचीन पानी के रासायनिक सुराग
वैज्ञानिकों को इस उल्कापिंड में मौजूद एपेटाइट (apatite) नामक खनिज के सूक्ष्म क्रिस्टलों से हाइड्रोजन के दो अलग-अलग स्रोतों के संकेत मिले हैं। इनमें से एक स्रोत सीधे मंगल ग्रह के आंतरिक हिस्से से जुड़ा है, जबकि दूसरा संकेत ग्रह के प्राचीन जलमंडल की मौजूदगी की तस्दीक करता है। रासायनिक विश्लेषण दर्शाता है कि यह उल्कापिंड उस सामग्री से बना है जो कभी पानी से भरपूर वातावरण के संपर्क में आने से बदल चुकी थी। अंतरिक्ष विज्ञान जगत में लंबे समय से यह पुख्ता सबूत मौजूद रहे हैं कि मंगल की सतह पर कभी तरल पानी बहता था। वैज्ञानिकों के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उस पानी की मौजूदगी ने कभी सूक्ष्म जीवन को पनपने का मौका दिया था, और वह कौन सा घटनाक्रम था जिसने कभी रहने योग्य रहे उस ग्रह को पूरी तरह बदल दिया।
गहरे मैग्मा और सतह के पानी के बीच सीधा संपर्क
तेघाज़ा 001 की संरचना से यह भी स्पष्ट होता है कि मंगल ग्रह की गहराइयों में खौलते मैग्मा और उसकी जलमय सतह के बीच पदार्थों का सक्रिय आदान-प्रदान होता था। चूंकि यह चट्टान मंगल और सौर मंडल के निर्माण के करीब 50 करोड़ साल बाद के दौर की है, इसलिए यह प्रक्रिया ग्रह के अस्तित्व के बेहद शुरुआती दिनों में ही घटित हो रही थी। शोध में शामिल नासा के एक अन्य वैज्ञानिक ली सेपर ने बताया कि यह मंगल ग्रह की क्रस्ट का पहला ऐसा टुकड़ा है, जिसका नमूना पहले कभी हासिल नहीं हुआ था। यह खोज पानी और चट्टान के बीच हुए तालमेल को दर्ज करती है, साथ ही यह उस दौर के वायुमंडल की छाप भी दिखाती है जब मंगल धीरे-धीरे अपने पानी को खो रहा था।
रहस्यमयी बदलाव और भविष्य के मंगल मिशन
वर्तमान समय में मंगल एक ठंडा, सूखा और बंजर ग्रह बन चुका है, लेकिन अरबों साल पहले हालात ऐसे बिल्कुल नहीं थे। आधुनिक अंतरिक्ष अभियानों से जुटाए गए आंकड़े लगातार बताते हैं कि लाल ग्रह पर कभी नदियां, झीलें और शायद पानी के विशाल भंडार मौजूद थे। यह हरा-भरा या जलीय ग्रह समय के साथ इस कदर वीरान कैसे हो गया, यह गुत्थी वैज्ञानिकों के लिए अब भी एक बड़ी पहेली बनी हुई है। इसी पहेली को सुलझाने के लिए अंतरिक्ष एजेंसियां मंगल की ओर रोवर, जांच यान और भविष्य में मानव मिशन भेजने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि, जटिल रोबोटिक मिशनों के बीच कभी-कभी विज्ञान में अप्रत्याशित संयोग भी भारी पड़ते हैं, और कई जटिल सवालों के जवाब सहारा के रेगिस्तान में गिरे उल्कापिंडों के ज़रिए खुद पृथ्वी पर पहुंच जाते हैं।



















