सूर्य के उत्तरायण होने का महापर्व मकर संक्रांति पूरे देश में उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर घरों में तरह-तरह के पारंपरिक पकवान और विशेष रूप से खिचड़ी तैयार करने की सदियों पुरानी धार्मिक व सामाजिक परंपरा रही है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर स्वादिष्ट खिचड़ी का स्वाद लेते हैं और दान-पुण्य करते हैं। सदियों से चली आ रही इस रस्म के बीच आगामी मकर संक्रांति को लेकर एक विशेष धार्मिक स्थिति सामने आई है, जिसके चलते कई श्रद्धालु उस दिन खिचड़ी का सेवन करने से बचेंगे।
19 वर्षों के अंतराल पर षट्तीला एकादशी और मकर संक्रांति का मिलन
धार्मिक गणनाओं के अनुसार, 14 जनवरी 2026 दिन बुधवार को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। पूर्णिया के ज्योतिषाचार्य पंडित मनोत्पल झा के अनुसार, इस दिन खिचड़ी खाना धार्मिक रूप से वर्जित नहीं होता, लेकिन इसी पावन तिथि पर षट्तीला एकादशी का व्रत भी पड़ रहा है। लगभग 19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ऐसा विशिष्ट संयोग बन रहा है, जिसने इस पर्व के महत्व को कई गुना बढ़ा दिया है। दोनों बड़े धार्मिक अवसरों का एक ही दिन पड़ना बहुत खास माना जा रहा है।
एकादशी व्रत में चावल का निषेध
सनातन परंपरा में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होती है। इस पावन व्रत का संकल्प लेने वाले श्रद्धालुओं के लिए चावल और उससे बने व्यंजनों का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है। मान्यता है कि एकादशी के दिन अन्न, विशेषकर चावल ग्रहण करने से व्रत का फल खंडित हो जाता है। चूंकि खिचड़ी मुख्य रूप से चावल और दाल के मिश्रण से बनती है, इसलिए जो भक्त भगवान विष्णु की पूजा के निमित्त षट्तीला एकादशी का उपवास रखेंगे, वे संक्रांति के पारंपरिक पकवान का आनंद उस दिन नहीं ले सकेंगे।
श्रद्धालुओं के लिए विकल्प और व्यवस्था
पंडित मनोत्पल झा ने स्पष्ट किया है कि जो श्रद्धालु नियमित रूप से या विशेष संकल्प के तहत एकादशी का उपवास रखते हैं, केवल उन्हें ही चावल निषेध के नियम के कारण खिचड़ी से परहेज करना होगा। ऐसे लोग व्रत के पारण के बाद यानी अगले दिन खिचड़ी तैयार करके खा सकते हैं। इसके साथ ही, जिन लोगों का एकादशी का व्रत नहीं है, उनके लिए खिचड़ी बनाने या खाने पर किसी भी प्रकार का धार्मिक प्रतिबंध नहीं है और वे सामान्य रूप से पर्व का पूरा आनंद उठा सकते हैं।



















