भाई और बहन के स्नेहिल रिश्ते का उत्सव भैया दूज मिथिलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का एक अभिन्न अंग माना जाता है। पूरे मिथिला क्षेत्र में इस पावन अवसर पर विशेष उल्लास देखने को मिलता है, जहां घर-घर में पारिवारिक आत्मीयता और आस्था की झलक साफ दिखाई देती है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के सुखी जीवन, तरक्की और लंबी उम्र की मंगलकामना करते हुए निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखती हैं। वहीं, भाई अपनी बहनों के घर पहुंचकर उनके हाथों से तैयार किया गया पारंपरिक भोजन बड़े चाव और आदर के साथ ग्रहण करते हैं।
पौराणिक कथा और यमराज से जुड़ा गहरा संबंध
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर ज्योतिष विभागाध्यक्ष, डॉक्टर कुणाल कुमार झा के अनुसार, भैया दूज के इस पावन उत्सव का सीधा ताल्लुक द्वापर युग की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों में वर्णन मिलता है कि पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों ने अपने भाई यमराज को प्रसन्न किया था। इन तीनों पावन नदियों ने यमराज से अपने भाई की लंबी उम्र का वरदान मांगा था। उसी पौराणिक घटना के बाद से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है, जिसमें बहनें यमराज से अपने भाइयों की दीर्घायु और रक्षा की प्रार्थना करती हैं। मिथिलांचल के रीति-रिवाजों में बहन के हाथों बना भोजन करना और उनका आशीष पाना आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।
पारंपरिक अनुष्ठान और पारिवारिक मिलन का उल्लास
इस वर्ष यह पावन पर्व 23 अक्टूबर बृहस्पतिवार को विधि-विधान के साथ आयोजित होगा। भैया दूज की सुबह से ही बहनें व्रत का संकल्प लेकर अपने भाइयों के स्वागत की तैयारियों में जुट जाती हैं। जब भाई घर पहुंचते हैं, तो पारंपरिक रीति से उनका तिलक किया जाता है, आरती उतारी जाती है और उनके मंगलमय भविष्य की प्रार्थना की जाती है। भाई भी अपनी बहनों के प्रति कृतज्ञता और स्नेह दर्शाते हुए उन्हें उपहार भेंट करते हैं। यह आयोजन सिर्फ भाई-बहन के प्रेम को ही प्रगाढ़ नहीं करता, बल्कि पूरे परिवार को एक सूत्र में पिरोने का अनुपम जरिया भी बनता है। समूचे मिथिलांचल में इस दिन उत्सव का वातावरण बना रहता है, जो यहां के पारंपरिक संस्कारों को जीवंत बनाए रखता है।
















