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पिछोला की पाल से भी पुराना है उदयपुर का यह पाला गणेश मंदिर, गाय के गोबर से तैयार होती है प्रतिमाअध्यात्म
13 सित॰ 2026, 10:34 pm (17 दिन पहले)· 1

पिछोला की पाल से भी पुराना है उदयपुर का यह पाला गणेश मंदिर, गाय के गोबर से तैयार होती है प्रतिमा

उदयपुर के पिछोला झील के समीप स्थित ऐतिहासिक पाला गणेश मंदिर का इतिहास महाराणा लाखा के काल से जुड़ा है, जहां गोबर से बनी विशेष गणपति प्रतिमा की पूजा की जाती है।

राजस्थान के उदयपुर में यूं तो बप्पा के कई ऐतिहासिक देवस्थान हैं, लेकिन पिछोला झील की पाल के निकट स्थापित पाला गणेश मंदिर की आस्था सबसे अलग और अनोखी है। स्थानीय लोगों के बीच यह दृढ़ मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना पिछोला झील के इस तटबंध यानी पाल के निर्माण से भी काफी पहले हो चुकी थी। यही कारण है कि इसे क्षेत्र की सबसे प्राचीन और पूजनीय धरोहरों में से एक माना जाता है, जहां हर साल गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर भव्य उत्सव मनाया जाता है और दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं।

मेवाड़ के महाराणा लाखा के काल से जुड़ा गौरवशाली इतिहास

इस पौराणिक देवस्थान का ऐतिहासिक संबंध मेवाड़ राजवंश के स्वर्णिम इतिहास से जुड़ा हुआ है। लोक मान्यताओं के अनुसार, मेवाड़ के शासक महाराणा लाखा के निर्देश पर ही इस पावन स्थल पर भगवान श्रीगणेश के मंदिर का निर्माण कार्य संपन्न करवाया गया था। जैसे-जैसे सदियां बीतती गईं, उदयपुर शहर का भौगोलिक विस्तार हुआ और विश्व प्रसिद्ध पिछोला झील के आस-पास के संपूर्ण क्षेत्र का सुंदरीकरण और विकास किया गया, परंतु इस पौराणिक मंदिर के प्रति जनमानस की अटूट आस्था में तनिक भी कमी नहीं आई। आज भी इसे मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ स्वीकार किया जाता है।

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गाय के गोबर से तैयार होती है गणपति की अनूठी प्रतिमा

पाला गणेश मंदिर की सबसे अनूठी और विस्मयकारी विशेषता यहां की मुख्य गणेश प्रतिमा से जुड़ी प्राचीन परंपरा है। यहां भगवान गजानन की भव्य और अलौकिक प्रतिमा को पूरी तरह से गाय के पवित्र गोबर से तैयार किया जाता है। गोबर से निर्मित इस विग्रह को देखने और उनके दर्शन लाभ उठाने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में एकत्रित होते हैं। यह पावन परंपरा केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह स्थानीय जनमानस की पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली और उनकी प्राचीन लोक संस्कृति का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। लोगों का मानना है कि इस अनूठी प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं।

गणेश चतुर्थी पर उमड़ता है आस्था का सैलाब

गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर पूरे मंदिर परिसर का माहौल अत्यंत भक्तिमय और आलौकिक हो जाता है। इस पावन अवसर पर संपूर्ण मंदिर को विशेष रूप से सुसज्जित किया जाता है और गणपति बप्पा की विशेष पूजा-अर्चना के साथ ही महाआरती का आयोजन किया जाता है। सुबह की पहली किरण के साथ ही यहां श्रद्धालुओं की लंबी-लंबी कतारें लगनी शुरू हो जाती हैं, जो देर रात तक अनवरत चलती रहती हैं। भक्त अपने परिवारों के साथ यहां आकर विघ्नहर्ता के चरणों में शीश नवाते हैं और घर-परिवार के लिए सुख, शांति, समृद्धि तथा दीर्घायु की मंगल कामना करते हैं।

इस दस दिवसीय उत्सव के दौरान स्थानीय लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। इस पर्व पर मंदिर परिसर में विविध प्रकार के धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम मची रहती है। श्रद्धालु बप्पा को अत्यंत प्रिय मोदक और अन्य पारंपरिक नैवेद्य अर्पित करते हैं। सामान्य दिनों की तुलना में गणेश उत्सव के दौरान मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हो जाती है और प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में लोग पाला गणेश के दरबार में हाजिरी लगाकर अपनी श्रद्धा निवेदित करते हैं।

सवाल-जवाब

पाला गणेश मंदिर कहाँ स्थित है?
यह प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के उदयपुर शहर में पिछोला झील की पाल (तटबंध) के पास स्थित है।
इस मंदिर का ऐतिहासिक संबंध किस शासक से है?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण मेवाड़ के महाराणा लाखा के आदेश पर करवाया गया था।
इस मंदिर की मुख्य प्रतिमा की क्या विशेषता है?
यहाँ स्थापित भगवान गणेश की भव्य प्रतिमा गाय के पवित्र गोबर से तैयार की जाती है।
क्या यह मंदिर पिछोला की पाल से भी पुराना है?
हाँ, स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का अस्तित्व पिछोला झील की पाल के निर्माण से भी पहले से है।
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