वैदिक पंचांग के अनुसार आगामी शारदीय नवरात्रि के उत्सव में तिथियों के विशेष संयोग के कारण यह अनुष्ठान नौ की बजाय पूरे 10 दिनों तक चलेगा। पंचांग गणना के आधार पर तृतीया तिथि दो दिवस तक प्रभावी रहने से उत्सव की कालावधि में एक दिन की वृद्धि दर्ज की गई है। इस धार्मिक अनुष्ठान का आरंभ 22 सितंबर 2025, सोमवार से घटस्थापना के साथ होगा और इसका समापन 1 अक्टूबर 2025, बुधवार तक चलने के पश्चात अगले दिन विजयादशमी पर संपन्न होगा। पूर्वोत्तर और पूर्वी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, असम तथा ओडिशा में इस पर्व की भव्यता देखते ही बनती है, जहाँ विशाल पंडालों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से शक्ति स्वरूपा का वंदन किया जाता है।
कलश स्थापना एवं प्रमुख दिनों की दैनिक अनुष्ठान सारणी
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर ज्योतिष विभाग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर कुणाल कुमार झा के विवरण के अनुसार, 22 सितंबर 2025 को सोमवार के दिन पहले नवरात्र पर घटस्थापना और कलश पूजन का अनुष्ठान किया जाएगा। इसके उपरांत 23 सितंबर को हेमंत पूजा की परंपरा निभाई जाएगी। तिथिवार उत्सव आगे बढ़ते हुए 28 सितंबर को गज पूजा और संध्या काल में बेलन्योती का विधान पूरा किया जाएगा। अगले दिन यानी 29 सितंबर को पत्रिका प्रवेश और महारात्रि निशा पूजा संपन्न की जाएगी। उत्सव के अंतिम चरण में 2 अक्टूबर को अपराजिता पूजा, यात्रा और विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा।
षष्ठी तिथि पर मूर्ति स्थापना और बिल्व निमंत्रण
सार्वजनिक दुर्गा पूजा का मुख्य उल्लास षष्ठी तिथि यानी 28 सितंबर 2025, रविवार से व्यापक स्तर पर प्रारंभ होता है। इस दिन साधक मां कात्यायनी की आराधना करते हैं और पूजा पंडालों में देवी की प्रतिमा स्थापना का कार्य संपन्न किया जाता है। मूर्ति प्रतिष्ठा के लिए प्रातः 06:08 बजे से 10:30 बजे तक का समय सबसे शुभ मुहूर्त बताया गया है। इसी तिथि पर देवी को आमंत्रित करने के उद्देश्य से बिल्व पत्र निमंत्रण की प्राचीन परंपरा निभाई जाती है तथा पंडालों की सज्जा को अंतिम रूप दिया जाता है। नवपत्रिका प्रवेश के माध्यम से पूजा की वास्तविक शास्त्रीय शुरुआत मानी जाती है।
अष्टमी-नवमी का संधिकाल और 108 दीपों की संधि पूजा
दुर्गा पूजा के सबसे प्रभावशाली और आध्यात्मिक अनुष्ठानों में संधि पूजा का स्थान सर्वोपरि है, जिसका आयोजन 30 सितंबर 2025, मंगलवार को अष्टमी तिथि पर होगा। यह पूजा अष्टमी के समापन और नवमी के आरंभ के संधिकाल में आयोजित होती है, जिसकी समय सीमा रात्रि 07:36 बजे से 08:24 बजे तक निर्धारित है। इस 48 मिनट की अवधि में मां दुर्गा के उग्र और संहारक चामुंडा स्वरूप की विधिवत वंदना की जाती है। इस विशेष कालखंड में 108 कमल पुष्प और 108 प्रज्वलित दीप अर्पित कर देवी का आह्वान किया जाता है, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक माना गया है।
विजयादशमी और प्रतिमा विसर्जन की विदाई बेला
महिषासुरमर्दिनी के रूप में मां दुर्गा असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की शाश्वत विजय का संदेश देती हैं। यह समूचा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रहकर नारी शक्ति के सम्मान और आंतरिक ऊर्जा के जागरण का अवसर भी प्रदान करता है। अनुष्ठान का समापन 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार को विजयादशमी के पावन अवसर पर होगा। इस दिन अपराजिता पूजन के पश्चात नदियों और तालाबों के पवित्र जल में मां दुर्गा की मृण्मयी प्रतिमाओं का विसर्जन कर उन्हें भावभीनी विदाई दी जाएगी।


















