महाकालेश्वर की पावन नगरी उज्जैन में आगामी सिंहस्थ 2028 की तैयारियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं, और इसके साथ ही देश के कोने-कोने से साधु-संतों का आगमन भी शुरू हो गया है। धार्मिक गतिविधियों के इसी क्रम में इन दिनों शिप्रा नदी के पवित्र तट पर स्थित नरसिंह घाट पर अद्भुत आध्यात्मिक दृश्य देखने को मिल रहा है। यहां एक संत पीपल के पेड़ पर बने एक छोटे से लकड़ी के मचान पर आसीन होकर अत्यंत कठोर तपस्या में लीन हैं, जिसे देखने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है।
विश्व कल्याण के लिए जल और दूध पर आधारित चातुर्मास व्रत
श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े से संबद्ध महंत गणेशानंद सरस्वती महाराज ने चातुर्मास की अवधि के दौरान इस विशेष साधना का संकल्प लिया है। उनकी यह कठिन साधना देवशयनी एकादशी से प्रारंभ हुई है और देवउठनी एकादशी तक अनवरत जारी रहेगी। चार महीने तक चलने वाले इस व्रत में महाराज ने किसी भी प्रकार के अन्न का पूरी तरह से त्याग कर दिया है। वे अपनी देह की रक्षा के लिए केवल जल और सीमित मात्रा में दूध का ही सेवन कर रहे हैं। नीचे बहती शिप्रा नदी का प्रवाह और सामने अवस्थित महाकाल की नगरी का परिवेश इस तपस्या को अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान कर रहा है।
महंत गणेशानंद सरस्वती महाराज के अनुसार, यह तपस्या किसी व्यक्तिगत भौतिक लाभ, प्रसिद्धि या किसी सिद्धि अथवा चमत्कार के प्रदर्शन के लिए नहीं की जा रही है। इसका एकमात्र ध्येय संपूर्ण विश्व में शांति की स्थापना और समस्त मानव जाति का कल्याण है। अपने मचान पर स्थित होकर वे प्रतिदिन जप, वैदिक हवन और विभिन्न अनुष्ठान संपन्न कर रहे हैं। पीपल के पेड़ पर बने इस मचान से उनकी साधना लगातार जारी है, जो सनातन धर्म की प्राचीन आचार-संहिता और तपस्या की भावना को प्रदर्शित करती है।
12 वर्ष की अल्पायु में सांसारिक मोह का त्याग और संन्यास
अपनी जीवन यात्रा के विषय में जानकारी देते हुए महंत गणेशानंद सरस्वती महाराज ने बताया कि मध्य प्रदेश की पावन धरा से उनका गहरा और पुराना नाता रहा है। बाल्यकाल में ही उनके भीतर तीव्र वैराग्य की भावना जागृत हो गई थी। इसके परिणामस्वरूप, महज 12 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने अपने घर-परिवार और सांसारिक बंधनों का पूर्ण रूप से परित्याग कर दिया।
सांसारिक जीवन छोड़ने के पश्चात उन्होंने सनातन परंपरा के अनुसार विधिवत अपना पिंडदान किया और संन्यास मार्ग को चुना। तत्पश्चात अपने गुरुदेव से दीक्षा ग्रहण की, जहां उन्हें गणेशानंद सरस्वती का पावन नाम प्राप्त हुआ। संन्यास लेने के बाद से ही वे श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े से जुड़कर सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और साधना में समर्पित हैं।
भोपाल आश्रम से जुड़ाव और 6 वर्षों से जारी अखंड रामायण पाठ
महंत गणेशानंद सरस्वती महाराज मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के कोलार रोड स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर तथा अमरावती कला धाम आश्रम का संचालन व देखरेख करते हैं। उन्होंने बताया कि भोपाल स्थित इस आश्रम में पिछले छह वर्षों से बिना रुके निरंतर अखंड रामायण का पाठ आयोजित किया जा रहा है।
यद्यपि उज्जैन शहर से उनका आध्यात्मिक जुड़ाव लंबे समय से रहा है, किंतु शिप्रा नदी के किनारे स्थित लक्ष्मी नरसिंह घाट की अत्यंत शांत और पवित्र आबोहवा ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया। इस स्थान की पावन शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रभावित होकर ही उन्होंने चार महीने की संपूर्ण चातुर्मास अवधि यहीं पेड़ के मचान पर बिताने और कठोर तप करने का दृढ़ निर्णय लिया।
स्कंद पुराण में वर्णित नरसिंह घाट का पौराणिक इतिहास
साधना के लिए नरसिंह घाट के चयन के पीछे एक गहरा पौराणिक आधार भी निहित है। सनातन हिंदू शास्त्रों, विशेष रूप से स्कंद पुराण में नरसिंह घाट का अत्यंत महिमामंडित वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण की कथा के अनुसार, यह स्थान भगवान विष्णु के चौथे अवतार यानी भगवान नरसिंह से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान नरसिंह ने दंभी दैत्य हिरण्यकश्यप का संहार किया था, तब संहार के पश्चात भी उनका अति प्रचंड और भयंकर क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनके इस प्रलयंकारी तेज से समस्त ब्रह्मांड में व्याकुलता फैल गई। तब जगत के कल्याण हेतु भगवान शिव ने शरभ रूप धारण किया और भगवान नरसिंह को पवित्र शिप्रा नदी के जल में स्नान करने का परामर्श दिया। भगवान नरसिंह ने जैसे ही शिप्रा के शीतल जल में डुबकी लगाई, उनका उग्र क्रोध तत्काल शांत हो गया और वे सौम्य रूप में आ गए। इसी दिव्य घटना के कारण नरसिंह घाट को मानसिक शांति देने वाला और अत्यंत पवित्र माना जाता है।



















