नई दिल्ली। जीवन के सबसे विकट हालातों और तंगहाली को मात देकर शोहरत की बुलंदियों को छूने की दास्तानें बहुत कम देखने को मिलती हैं। एक वक्त ऐसा भी था जब महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के ताकलीभान गांव का एक छोटा सा बच्चा रेल की पटरियों के पास भटककर प्लास्टिक की खाली बोतलें बीनने को मजबूर था। आज वही लड़का भारत की राष्ट्रीय जर्सी पहनकर अपने सीने पर एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल सजाए शान से खड़ा है। यह केवल एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह तकदीर की कड़वी लकीरों के खिलाफ लड़ी गई एक ऐसी अद्भुत जंग है जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। जब हाल ही में एशियन गेम्स में भारतीय पुरुष और महिला कबड्डी टीमों ने स्वर्ण पदक अपने नाम किए, तो देश भर के अखबारों और खेल प्रेमियों की जुबान पर इस जीत की गूंज थी। इस सुनहरी कामयाबी की पृष्ठभूमि में छिपे हुए कड़े संघर्ष, आंसुओं और अनगिनत कुर्बानियों की सबसे बड़ी और चमकदार मिसाल बनकर उभरे हैं असलम इनामदार।
अभावों से भरी बचपन की दुनिया
महज 26 वर्ष की उम्र में दो बार एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक अपने नाम करने वाले असलम इनामदार का शुरुआती सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगता। उनके बचपन के दिनों में ही सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया था, जिसके बाद पांच बच्चों के लालन-पालन की भारी जिम्मेदारी अकेले उनकी मां के कंधों पर आ गिरी। घर का चूल्हा जलाने और बच्चों का पेट भरने के लिए मां ने लोगों के घरों में बर्तन मांजने और चौका-लगाना शुरू किया। उस दौर में दोनों वक्त का भरपेट खाना मिल जाना ही परिवार के लिए किसी बड़े संघर्ष से कम नहीं हुआ करता था। हालात इतने बदतर थे कि परिवार का हर एक दिन सिर्फ किसी तरह जीवित रहने की जद्दोजहद में गुजरता था। असलम के शुरुआती साल इस बात की गवाही देते हैं कि किस तरह गरीबी इंसान को छोटी उम्र में ही परिपक्व बना देती है।
पेट की आग बुझाने के लिए किए तमाम छोटे-बड़े काम
अपने अस्तित्व को बचाने और पेट की आग शांत करने के लिए असलम इनामदार ने अपने बचपन में वह हर काम किया जिसकी इंसान कल्पना भी नहीं कर सकता। उन्होंने चाय के ढाबों पर जूठे बर्तन साफ किए, गंदे वॉशरूमों की सफाई की, चिलचिलाती धूप में खेतों में मजदूरी की और सड़कों पर घूमकर प्लास्टिक की खाली बोतलें इकट्ठी कीं ताकि उन्हें बेचकर रात के खाने का इंतजाम हो सके। उस समय वड़ा पाव ही उनके दैनिक जीवन का मुख्य सहारा हुआ करता था, जिससे वे किसी तरह अपनी भूख मिटाते थे। कई बार कबड्डी के टूर्नामेंट्स के दौरान जब आयोजकों की तरफ से भोजन मिलता था, तो असलम बचा हुआ खाना भी संभालकर अपने पास रख लेते थे ताकि अगले दिन उन्हें या उनके करीबियों को भूखा न रहना पड़े। गरीबी के इस दौर में उन्होंने हर वो ठोकर खाई जो एक संघर्षशील इंसान के हिस्से में आती है।
कबड्डी से उम्मीद की किरण और ट्रेनों में कटी रातें
इस घनोर अंधेरे और विपत्तियों के बीच कबड्डी ने असलम की जिंदगी में उम्मीद की एक रोशन किरण दिखाई। उनके बड़े भाई वसीम खुद एक बेहतरीन क्षेत्रीय कबड्डी खिलाड़ी थे, जिन्हें देखकर असलम के मन में भी इस खेल के प्रति गहरा लगाव पैदा हुआ। जब वसीम पुलिस सेवा में भर्ती हुए, तो परिवार की आर्थिक स्थिति को थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन तब तक असलम पूरी तरह से कबड्डी के रंग में रंग चुके थे। मात्र 15 साल की कम उम्र में उन्होंने स्थानीय स्तर पर होने वाले मुकाबलों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। उस दौर में उनके पास सफर के लिए पैसे नहीं होते थे, इसलिए वे बिना टिकट ही ट्रेनों में यात्रा करते थे। टीटीई या पुलिस की नजरों से बचने के लिए वे लोकल ट्रेनों की सीटों के नीचे फर्श पर लेटकर रातें काटते थे। दिनभर मैदान पर पसीना बहाने के बाद उन्हें एक मैच के बदले महज 200 से 500 रुपये ही मिल पाते थे। कई बार तो वे सिर्फ इस शर्त पर खेलने चले जाते थे कि खेल खत्म होने के बाद उन्हें भरपेट भोजन मिल जाएगा।
प्रो कबड्डी लीग से मिला जिंदगी का सबसे बड़ा यू-टर्न
संघर्ष की यह लंबी दास्तान तब तक चलती रही जब तक कि प्रो कबड्डी लीग यानी पीकेएल का आगाज नहीं हुआ। पीकेएल ने भारतीय कबड्डी के पूरे परिदृश्य को बदलकर रख दिया और यही वह मोड़ था जो असलम की जिंदगी का सबसे बड़ा यू-टर्न साबित हुआ। इस लीग के आठवें सीजन में पुणेरी पलटन की टीम ने असलम के साथ अपना पहला आधिकारिक अनुबंध किया और उन्हें 8 लाख रुपये की राशि सौंपी। वह पल उनके जीवन का सबसे भावनात्मक क्षण था क्योंकि जिस लड़के ने 200 रुपये के लिए रातें जागकर काटी थीं, उसके लिए 8 लाख रुपये किसी बड़ी जागीर से कम नहीं थे। इस कमाई से उन्होंने सबसे पहले अपनी मां के लिए सोने का एक खूबसूरत हार खरीदा, ताकि उस मां के श्रम और आंसुओं का थोड़ा सा मोल चुकाया जा सके जिसने दूसरों के घरों में काम करके उन्हें पाला था।
कप्तानी से लेकर मैदान पर छा जाने तक का सफर
एक बार जब सफलता का यह सिलसिला शुरू हुआ, तो असलम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेल के मैदान पर उनकी तीव्र फुर्ती, आक्रामक रेडिंग और सूझबूझ से भरे टैकल करने के हुनर ने उन्हें टीम की सबसे मजबूत रीढ़ बना दिया। पीकेएल के मंच पर अब तक खेले गए अपने 87 मुकाबलों में उन्होंने आक्रमण और बचाव दोनों क्षेत्रों में ऐसी छाप छोड़ी है कि वे सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं बल्कि अपनी टीम के निर्विवाद नायक बन चुके हैं। लीग के दसवें सीजन में पुणेरी पलटन की कमान संभालते हुए उन्होंने अपनी टीम को पहली बार चैंपियन का ताज दिलाया और खुद उस सत्र के ‘मोस्ट वैल्युएबल प्लेयर’ (MVP) चुने गए। उनके इस शानदार और निरंतर प्रदर्शन को देखते हुए फ्रेंचाइजी ने उन्हें बारहवें सीजन के लिए भी अपनी टीम में बरकरार रखा है।



















