जापान के तटीय शहर नागोया में सुबह के साढ़े तीन बजे वातावरण में हल्की ठंडक, छाए हुए बादल और हल्की बूंदाबांदी का नजारा था। देखने में यह मौसम दौड़ने के लिए बेहद मुफीद लग रहा था, लेकिन लंबी दूरी के धावकों के लिए यह स्थिति किसी कड़ी परीक्षा से कम नहीं थी। प्रशांत महासागर से आ रही नमी के कारण हवा में उमस का स्तर 85 से 88 प्रतिशत तक पहुंच चुका था। इस तरह की उच्च उमस में दौड़ते समय एथलीटों के शरीर से पानी और आवश्यक लवण बहुत तेजी से खत्म होते हैं, जिससे मांसपेशियों में ऐंठन और थकान हावी हो जाती है। इसी चुनौतीपूर्ण वातावरण में भारत के एथलीट सावन बरवाल 42.195 किलोमीटर लंबी मैराथन रेस जीतने के लक्ष्य के साथ ट्रैक पर उतरे।
सुबह 3:30 बजे जगने के बाद सावन के पेट में ऊर्जा के नाम पर केवल एक केला गया था। इसके बाद सुबह से लेकर दोपहर 10:30 बजे तक यही एक अकेला फल उनकी शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति का मुख्य स्रोत बना रहा। कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाद जब सावन ने रेस पूरी की, तो उनका शरीर इस कदर निर्जलित हो चुका था कि डोपिंग रोधी परीक्षण के लिए यूरिन सैंपल देना भी मुश्किल हो गया। डोप कंट्रोल टेस्ट के लिए आवश्यक सैंपल प्रदान करने के उद्देश्य से उन्हें लगातार एक घंटे से भी अधिक समय तक पानी पीना पड़ा। इस अदम्य साहस और समर्पण के दम पर सावन बरवाल ने 2 घंटे, 11 मिनट और 37 सेकंड का समय निकालकर पुरुषों की मैराथन स्पर्धा में ऐतिहासिक रजत पदक अपने नाम किया। उन्होंने अपने ही पिछले व्यक्तिगत रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया और स्वर्ण पदक विजेता जापान के इचिताका यामाशिता से केवल कुछ ही कदम पीछे रहे, जिन्होंने 2:10:49 के समय के साथ पहला स्थान हासिल किया।
विदेशी सरजमीं पर मैराथन में सूखा खत्म
भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में सावन बरवाल की यह उपलब्धि एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है। इससे पहले भारतीय धावकों ने एशियाई स्तर की मैराथन स्पर्धाओं में जो भी पदक जीते थे, वे सभी केवल घरेलू सरजमीं पर आए थे। भारत ने 1951 और 1982 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के दौरान मैराथन में पदक हासिल किए थे। इस ऐतिहासिक दौड़ से पहले विदेशी धरती पर भारत का मैराथन पदकों का खाता पूरी तरह से खाली था। प्रतियोगिता की शुरुआत से पहले खेल तंत्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी सावन पर किसी पदक का दांव नहीं लगाया था, लेकिन उनके विदेशी कोच को उनकी शारीरिक क्षमता और मानसिक मजबूती पर पूरा भरोसा था।
कांगड़ा की चोटियों से सेना के ट्रैक तक का सफर
सावन बरवाल का जन्म हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में प्रसिद्ध बैजनाथ शिव मंदिर के समीप स्थित एक छोटे से गांव में हुआ था। पर्वतीय इलाकों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में पले-बढ़े होने के कारण बचपन से ही पहाड़ियों पर दौड़ना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में रहने के कारण उनके शरीर में प्राकृतिक रूप से लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) का स्तर काफी अधिक था। रक्त में आरबीसी की यह अधिकता थकी हुई मांसपेशियों तक त्वरित गति से ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करती है, जिससे शरीर को कठिन परिश्रम के बाद तेजी से उबरने में मदद मिलती है।
पिछले 15 वर्षों से लगातार दौड़ रहे सावन को भारतीय सेना में शामिल होने से पहले पेशेवर एथलेटिक्स की तकनीकी बारीकियों की विशेष जानकारी नहीं थी। सेना में भर्ती होने के बाद उन्होंने 10,000 मीटर और 25 किलोमीटर की लंबी दूरी की रेस में भाग लेना शुरू किया। उनकी प्रतिभा को देखते हुए भारत के लंबी दूरी के विदेशी कोच स्कॉट सिमंस ने पिछले वर्ष उन्हें मैराथन स्पर्धा की ओर रुख करने का सुझाव दिया। उस समय तक सावन को मैराथन रेस के तकनीकी पहलुओं का विस्तृत अनुभव नहीं था। कोच सिमंस का मानना था कि भारतीय लंबी दूरी की दौड़ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपार संभावनाएं हैं और 10,000 मीटर में सावन के उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें 42 किलोमीटर की मैराथन के लिए तैयार करना सबसे सही फैसला होगा।
अमेरिका में कठोर प्रशिक्षण और रेस की रणनीति
अंतरराष्ट्रीय मैराथन की तैयारी के लिए सावन को अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग्स भेजा गया। वहां उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लंबी दूरी के धावकों के साथ उच्च स्तरीय अभ्यास सत्रों में भाग लिया। मैराथन में सफलता पाने के लिए अपनी दौड़ने की गति पर नियंत्रण रखना सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। नागोया मैराथन से पहले के तीन महीनों में सावन ने प्रति सप्ताह 190 किलोमीटर की अत्यंत कठिन ट्रेनिंग पूरी की, जिसमें 40 किलोमीटर की तीन चुनौतीपूर्ण लंबी दौड़ शामिल थीं। गौर करने वाली बात यह है कि नागोया में खेली गई यह रेस सावन के करियर की केवल दूसरी फुल मैराथन थी। इससे पहले उन्होंने इस वर्ष अप्रैल में नीदरलैंड्स के रोटरडैम में अपनी पहली फुल मैराथन पूरी की थी।
नागोया की रेस के दौरान सावन ने बेहद समझदारी भरी रणनीति अपनाई। उनका मुख्य लक्ष्य शुरुआती चरण से ही अग्रणी धावकों के समूह के साथ बने रहना था। रेस में 15 किलोमीटर की दूरी तय होने के बाद जब मुख्य समूह की गति थोड़ी धीमी हुई, तो सावन ने संयम बनाए रखते हुए अपनी रफ्तार बढ़ाई। 30 किलोमीटर का आंकड़ा पार करते ही रूट पर एक कठिन चढ़ाई आई, जिसने धावकों की मांसपेशियों और सहनशक्ति की कड़ी परीक्षा ली। इसके बाद जैसे ही एक मुख्य मोड़ आया, रेस की गति अचानक काफी तेज हो गई और मुख्य स्पर्धा में केवल 3 से 4 धावक ही बचे। इसी निर्णायक मोड़ पर सावन को विश्वास हो गया कि वे भारत के लिए पदक जीतने में सफल रहेंगे।
भविष्य की योजनाएं और नया मुकाम
ऐतिहासिक रजत पदक जीतने के बाद सावन बरवाल ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि यदि वे इस रेस में पदक नहीं जीत पाते तो उनके द्वारा बहाया गया सारा पसीना और बिताया गया समय व्यर्थ चला जाता। 42 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करने के बाद अब सावन एक सप्ताह तक पूर्ण विश्राम करेंगे और अपनी नींद पूरी करेंगे। हालांकि, यह आराम बहुत लंबा नहीं होगा क्योंकि आगामी एशियाई चैंपियनशिप के लिए कठोर अभ्यास सत्र जल्द ही शुरू होने वाले हैं। सावन की यह सफलता भारतीय एथलेटिक्स में लंबी दूरी की दौड़ के लिए एक स्वर्णिम मार्ग प्रशस्त करती है।


















