सिरोही जिले का मेर मांडवाड़ा गांव आज पूरे इलाके में हॉकी की नर्सरी के रूप में अपनी एक खास पहचान बना चुका है। इस छोटे से गांव के युवाओं में खेलों के प्रति जो गजब का उत्साह और लगन देखने को मिलती है, वह वाकई में प्रेरणादायक है। पिछले एक दशक के भीतर इस ग्रामीण आंचल से निकलकर कई युवा खिलाड़ियों ने खेल के मैदान पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और क्षेत्रीय पटल पर गांव का नाम रोशन किया है। स्थानीय स्तर पर सीमित संसाधनों के बावजूद यहां के युवाओं का हौसला कभी नहीं डगमगाया और उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर एक नया मुकाम हासिल किया है।
हॉकी की ऐसी दीवानगी की हर कोई हैरान
इस गांव को मुख्य तौर पर हॉकी के खेल के लिए जाना जाता है। एक समय था जब इस पूरे इलाके में हॉकी के खेल के बारे में बहुत कम लोग जानते थे या फिर इसका खास प्रचलन नहीं था। लेकिन वक्त के साथ यहां के सरकारी सीनियर सेकंडरी स्कूल के खेल मैदान पर युवाओं की पसीना बहाने की तस्वीरें बदलने लगीं। सुबह और शाम के वक्त मैदान पर खिलाड़ियों की गूंज और स्टिक से बॉल की आवाज यहां की पहचान बन गई। सरकारी स्कूल के शारीरिक शिक्षक परमवीर सिंह पिछले करीब दस वर्षों से इन युवा खिलाड़ियों को लगातार हॉकी के गुर सिखा रहे हैं और उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। उनकी देखरेख में यहां के छात्र-छात्राओं ने खेल की बारीकियों को बहुत कम उम्र में ही सीख लिया है।
लगातार छह साल से जिला स्तर पर दबदबा
इस गांव के युवाओं की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंडर-19 छात्र और छात्रा दोनों ही टीमें पिछले छह साल से लगातार जिला स्तर पर चैंपियन का खिताब अपने नाम करती आ रही हैं। स्कूली प्रतियोगिताओं में इस गांव का दबदबा ऐसा है कि आसपास की टीमें इनसे मुकाबला करने से पहले अपनी रणनीति तैयार करती हैं। पिछले दस साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस गांव से कुल 175 खिलाड़ी राज्य स्तर यानी स्टेट लेवल तक का सफर तय कर चुके हैं। इसके अलावा 3 खिलाड़ियों ने अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर राष्ट्रीय स्तर यानी नेशनल लेवल पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। इस शानदार सफलता के पीछे स्कूल के शिक्षकों की मेहनत के साथ-साथ स्थानीय भामाशाहों का आर्थिक और नैतिक सहयोग भी बहुत बड़ा आधार रहा है, जो समय-समय पर खेल के सामान और सुविधाओं के लिए आगे आते हैं।
राष्ट्रीय पटल पर चमके इन खिलाड़ियों के नाम
राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ने वाले खिलाड़ियों की फेरबड़ी भी काफी लंबी और प्रेरणादायी है। शिक्षक परमवीर सिंह ने जानकारी दी कि राहुल राव और थानाराम का चयन राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण शिविर यानी नेशनल कैंप के लिए हुआ था, लेकिन वैश्विक महामारी कोरोना के कारण वे आधिकारिक तौर पर टीम में अंतिम रूप से शामिल नहीं हो पाए। इसके बावजूद गांव की बेटी रवीना लोहार मेर मांडवाड़ा की पहली राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया। उनके बाद खुशबू कंवर ने भी नेशनल लेवल पर बेहतरीन प्रदर्शन कर गांव का मान बढ़ाया। इसी तरह इसी वर्ष जोशना देवासी का भी राष्ट्रीय कैंप के लिए चयन हुआ था, हालांकि अंत में खुशबू कंवर को ही अंतिम टीम में जगह मिली।
राजस्थान को स्वर्ण पदक दिलाने में निभाई अहम भूमिका
पिछले वर्ष उदयपुर में आयोजित हुई 69वीं राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में राजस्थान की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया था। इस विजेता टीम में मेर मांडवाड़ा के ही प्रतिभावान खिलाड़ी दिलीप सिंह भी शामिल थे, जिन्होंने राज्य को स्वर्ण पदक दिलाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। इसके अलावा इसी वर्ष गांव के ही दो अन्य युवा चिनाराम और कालाराम का भी नेशनल कैंप के लिए चयन हुआ था, हालांकि अंतिम चयन प्रक्रिया में दिलीप सिंह ने बाजी मारी। इन युवा खिलाड़ियों की इस तरह की बड़ी सफलताओं को देखकर गांव के बाकी छोटे बच्चों और युवाओं में भी हॉकी के प्रति दीवानगी लगातार बढ़ती जा रही है।
तीन पीढ़ियों से हॉकी को समर्पित है पूरा परिवार
इस पूरे खेल अभियान की रीढ़ बने शारीरिक शिक्षक परमवीर सिंह खुद भी अपने दौर के शानदार हॉकी खिलाड़ी रह चुके हैं। उन्होंने पटियाला स्थित प्रतिष्ठित संस्थान एनआईएस से हॉकी की विशेष ट्रेनिंग हासिल की है। इसके अलावा वे वर्ष 2007-08 के दौरान जिनवा जोधपुर की टीम के कप्तान की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि उनका पूरा परिवार ही हॉकी के खेल को समर्पित रहा है। परमवीर सिंह के अलावा उनके चाचा और उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी भी हॉकी में बतौर खिलाड़ी मैदान पर उतरी है और अब नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने का काम कर रही है।
एस्ट्रोटर्फ मैदान की मांग और भविष्य की उम्मीदें
शारीरिक शिक्षक परमवीर सिंह का साफ कहना है कि इन तमाम प्रयासों का एकमात्र उद्देश्य सिरोही जिले में हॉकी और अन्य खेलों को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाना है ताकि ग्रामीण प्रतिभाएं पीछे न रहें। उन्होंने क्षेत्र के सभी सक्षम भामाशाहों और दानदाताओं से अपील की है कि वे गांव के खेल मैदान में आधुनिक एस्ट्रोटर्फ लगवाने में आर्थिक सहयोग करें। यदि खिलाड़ियों को एस्ट्रोटर्फ जैसी आधुनिक सुविधाएं मिल जाएंगी, तो वे और भी बेहतर ढंग से अभ्यास कर सकेंगे और देश तथा दुनिया के नक्शे पर इस छोटे से गांव का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा सकेंगे।

















