रेत के धोरों और रेगिस्तानी जीवन के लिए मशहूर बाड़मेर जिले के धनाऊ गांव के रहने वाले खेताराम सुम्बरा एक अनूठे हुनर के जरिए थार की प्राकृतिक पहचान को जिंदा रखे हुए हैं। आमतौर पर जंगलों या सफारी में दिखने वाले वन्यजीवों को उन्होंने अपने पट्टू के धागों पर उतारना शुरू किया है। उनके हाथों से बुने जाने वाले इन खास पट्टुओं पर थार के प्रसिद्ध वन्यजीव बेहद खूबसूरती से नजर आते हैं। कभी इन डिजाइनों में गोडावण की सुंदर आकृति दिखाई देती है तो कभी रेगिस्तान में दौड़ता हुआ काला हिरण सबका ध्यान खींच लेता है। इसके अलावा कुरजां पक्षी की उड़ान भी इन पारंपरिक डिजाइनों का अहम हिस्सा बन चुकी है।
पारंपरिक पट्टू कला में वन्यजीवों का अनूठा संगम
थार की असली पहचान सिर्फ यहां के रेतीले मैदानों से नहीं है, बल्कि यहां की समृद्ध और अनूठी जैव विविधता से भी जुड़ी हुई है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए खेताराम सुम्बरा पारंपरिक पट्टू निर्माण कला को आधुनिक उपयोग से जोड़ रहे हैं। वे केवल पारंपरिक परिधानों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इन कलाकृतियों के जरिए उन वन्यजीवों को अमर कर रहे हैं जिनकी संख्या लगातार घटती जा रही है। उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले पट्टू उत्पादों में केवल शॉल और स्टॉल ही शामिल नहीं हैं, बल्कि वे कुशन कवर, वॉल हैंगिंग और घर की सजावट के पर्दे जैसी कई उपयोगी चीजें भी बना रहे हैं। उनकी इस मेहनत का परिणाम यह है कि धनाऊ जैसे छोटे से इलाके से शुरू हुआ यह सफर अब देश के बड़े महानगरों तक पहुंच चुका है। उनके बनाए ये उत्पाद दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद और महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में खासे पसंद किए जा रहे हैं।
कला के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश
इस अनूठी पहल के पीछे केवल व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि विलुप्त होती प्रजातियों के प्रति लोगों को जागरूक करना भी मुख्य मकसद है। खेताराम बताते हैं कि गोडावण, काला हिरण और कुरजां जैसे जीव थार के पर्यावरण और प्राकृतिक इतिहास का अभिन्न अंग रहे हैं। इन जीवों को पट्टू के ताने-बाने में पिरोने का उद्देश्य सिर्फ सुंदरता बढ़ाना नहीं है, बल्कि समाज तक एक गंभीर संदेश पहुंचाना भी है। जब कोई व्यक्ति इन उत्पादों को अपने घर में सजाता है या ओढ़ता है, तो उसके साथ थार का पूरा परिवेश और वन्यजीवों की कहानी भी दूर-दूर तक पहुंचती है। आधुनिक दौर में जब कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं, तब यह कला उन्हें जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम बन रही है।
दस वर्षों की लंबी साधना और पुश्तैनी हुनर
यह कला खेताराम को विरासत में मिली है, जिसे वे अपने पिता और दादा से सीखकर आगे बढ़ा रहे हैं। वे पिछले 10 सालों से लगातार इस रचनात्मक कार्य में जुटे हुए हैं। अपनी औपचारिक शिक्षा के बारे में वे बताते हैं कि वे महज आठवीं पास हैं, लेकिन उनके हुनर और लगन ने उन्हें किसी बड़े मुकाम से कम पहचान नहीं दिलाई है। हालांकि यह काम पूरी तरह से पारंपरिक तरीकों से किया जाता है, लेकिन समय के साथ बाजार की मांग और ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए इसमें कई तरह के नए बदलाव भी किए गए हैं। पुश्तैनी कला में आधुनिक समय के अनुसार किए गए इन नवाचारों ने ही इसे देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में मदद की है।



















