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नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों की ग्रीको-रोमन कुश्ती में जीता सिल्वर मेडल, 64 वर्षों का सूखा समाप्तखेल
1 अक्तू॰ 2026, 4:37 pm (1 घंटे पहले)· 0

नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों की ग्रीको-रोमन कुश्ती में जीता सिल्वर मेडल, 64 वर्षों का सूखा समाप्त

हरियाणा के पहलवान नितेश सिवाच ने आईची-नागोया एशियाई खेलों के 97 किलोग्राम ग्रीको-रोमन वर्ग में रजत पदक जीतकर 1962 के बाद भारत का सबसे बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया है।

आईची-नागोया में चल रहे एशियाई खेलों के मैट पर भारतीय पहलवान नितेश सिवाच ने ग्रीको-रोमन कुश्ती में एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। 97 किलोग्राम भारवर्ग के खिताबी मुकाबले में जापान के यूरी नकाजातो से हारने के बावजूद नितेश ने सिल्वर मेडल अपनी झोली में डाला। इस उपलब्धि के साथ ही उन्होंने इस महाद्वीपीय खेल प्रतियोगिता में भारतीय ग्रीको-रोमन कुश्ती के 64 साल के पदक और फाइनल के लंबे इंतजार को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

1962 के बाद पहली बार फाइनल में पहुंचा कोई भारतीय

भारतीय खेलों के इतिहास में इससे पूर्व वर्ष 1962 के जकार्ता एशियाड में गणपत अंदलकर ने 97+ किलोग्राम भारवर्ग में भारत के लिए गोल्ड मेडल हासिल किया था। उस ऐतिहासिक सफलता के बाद से कई दशक बीत गए, किंतु कोई भी भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान न तो गोल्ड मेडल जीत सका था और न ही इस महाद्वीपीय मल्टी-स्पोर्ट इवेंट के फाइनल तक अपनी जगह बना पाया था। नितेश के इस रजत पदक ने भारतीय कुश्ती दल के लिए वर्षों पुराने इस गतिरोध को तोड़ दिया है।

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गंभीर चोट और दूध बांटने से लेकर मैट पर वापसी की कहानी

हरियाणा के सोनीपत जिले स्थित जगसी गांव से आने वाले नितेश की यह सफलता असीम संघर्षों के बाद सामने आई है। प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में अभ्यास के दौरान उनके घुटने में गंभीर चोट आ गई थी, जिसके चलते उन्हें ऑपरेशन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। चोट और सर्जरी के गंभीर दौर के कारण उन्हें एक समय अखाड़ा और पहलवानी तक छोड़नी पड़ गई थी। ठीक होने की लंबी प्रक्रिया के दौरान पारिवारिक जिम्मेदारियों में हाथ बंटाते हुए उन्होंने घर-घर जाकर दूध पहुंचाने का काम भी किया।

उनके पिता आनंद सिवाच अपने गांव से दूध एकत्र करते थे और फिर उसे अपनी दुकान के जरिए या पानीपत में घर-घर पहुंचाकर बेचते थे। स्वयं कुश्ती में रुचि रखने के बावजूद आर्थिक या अन्य कारणों से खेल से दूर रहे पिता हमेशा से अपने बेटे को पहलवान बनाना चाहते थे। रिकवरी के दौरान जब नितेश ने पिता से पूछा कि क्या वह फिर से कुश्ती खेल सकते हैं, तो माता-पिता की निरंतर प्रेरणा और मार्गदर्शन ने उन्हें दोबारा मैट पर लौटने की हिम्मत दी।

फाइनल तक का सफर और प्रतिद्वंद्वियों पर दबदबा

97 किलोग्राम वेट कैटेगरी में नितेश को क्वालिफिकेशन राउंड में बाई मिला था, जिससे उन्हें सीधे अगले दौर में प्रवेश मिला। इसके बाद उन्होंने क्वार्टर फाइनल मुकाबले में तुर्कमेनिस्तान के अमनबेर्डी अगामामेदोव को एकतरफा अंदाज में 7-1 से शिकस्त दी। सेमीफाइनल में उनका सामना मंगोलिया के गंखुयाग गनबातर से हुआ, जिन्होंने चीन के हांग्जो में संपन्न पिछले टूर्नामेंट में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। नितेश ने शानदार तकनीक और ताकत का प्रदर्शन करते हुए मंगोलियाई पहलवान को 9-0 से मात देकर सीधे फाइनल का टिकट कटाया था।

सवाल-जवाब

नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों में कौन सा पदक जीता?
नितेश सिवाच ने आईची-नागोया एशियाई खेलों के 97 किलोग्राम ग्रीको-रोमन कुश्ती वर्ग में सिल्वर मेडल जीता।
फाइनल मुकाबले में नितेश का सामना किस पहलवान से हुआ था?
फाइनल मुकाबले में उनका सामना जापान के यूरी नकाजातो से हुआ, जिन्होंने जीत दर्ज कर गोल्ड मेडल हासिल किया।
ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत का पिछला एशियाई खेलों का पदक कब आया था?
इससे पहले 1962 के एशियाई खेलों में गणपत अंदलकर ने 97+ किग्रा भारवर्ग में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता था।
नितेश सिवाच मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं?
नितेश सिवाच हरियाणा के सोनीपत जिले के जगसी गांव के रहने वाले हैं।
नितेश को पहलवानी से दूरी क्यों बनानी पड़ी थी?
प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में अभ्यास के दौरान घुटने में गंभीर चोट लगने और उसके ऑपरेशन के कारण उन्हें पहलवानी छोड़नी पड़ी थी।
रिकवरी के दौरान नितेश क्या काम करते थे?
चोट से उबरने के दौरान नितेश अपने पिता के साथ पानीपत में घर-घर जाकर दूध पहुंचाने का काम करते थे।
नितेश ने सेमीफाइनल में किस पहलवान को हराया था?
सेमीफाइनल में उन्होंने मंगोलिया के गंखुयाग गनबातर को 9-0 से मात दी थी।
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