महिला हॉकी विश्व कप में भारत और इंग्लैंड के बीच खेला गया मुकाबला बेहद रोमांचक मोड़ पर पहुंच चुका था। मैच खत्म होने में सिर्फ 30 सेकंड का समय शेष था और स्कोरबोर्ड 0-0 की बराबरी दर्शा रहा था। इंग्लैंड की अग्रिम पंक्ति लगातार तीखे हमले बोल रही थी और भारतीय खेल प्रेमियों की धड़कनें थमी हुई थीं। इसी निर्णायक पल में भारतीय गोलकीपर बिचू देवी खारीबाम ने अपनी बायीं तरफ एक अद्भुत डाइव लगाकर गेंद को गोलपोस्ट के अंदर जाने से रोक दिया। यह केवल एक शानदार बचाव नहीं था, बल्कि भारतीय टीम को टूर्नामेंट के अगले चरण का टिकट दिलाने वाला ऐतिहासिक क्षण था। मैच 0-0 से ड्रॉ समाप्त हुआ और इस मुकाबले की वास्तविक नायिका मणिपुर की वही होनहार एथलीट बनीं, जो शुरुआती दिनों में हॉकी की छड़ी भी नहीं थामना चाहती थीं।
इम्फाल में खेल की शुरुआत और फुटबॉल का सपना
मणिपुर की राजधानी इम्फाल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाली बिचू देवी खारीबाम की खेल यात्रा किसी सिनेमाई कहानी से कम नहीं है। बचपन में खेल के मैदान में उनकी पहली पसंद हॉकी नहीं, बल्कि फुटबॉल हुआ करती थी। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह इम्फाल स्थिति भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के क्षेत्रीय केंद्र में आयोजित फुटबॉल ट्रायल्स में भाग लेने गई थीं। हालांकि, किस्मत ने उनके लिए कोई और ही रास्ता तय कर रखा था। नियत तिथि से केवल एक दिन देर से पहुंचने के कारण फुटबॉल का तय कोटा पूरी तरह से भर चुका था और उन्हें ट्रायल में प्रवेश नहीं मिल सका।
मैदान में जगह न मिलने के कारण बिचू देवी को भारी निराशा का सामना करना पड़ा। उनकी हताशा को देखते हुए साई केंद्र के तत्कालीन निदेशक ने उनके पिता को एक व्यावहारिक सलाह दी। उन्होंने सुझाव दिया कि बच्ची को अस्थाई रूप से हॉकी के अभ्यास समूह में शामिल कर दिया जाए, और कुछ महीनों के बाद जब फुटबॉल टीम में कोई स्थान रिक्त होगा, तो उसे वहां स्थानांतरित कर दिया जाएगा। पिता ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बिचू को हॉकी मैदान में भेज दिया।
निराशा के आंसुओं से स्थायी पंजीकरण तक का सफर
अपने पिता की सहमति मिलने के बाद बिचू देवी ने हॉकी का चयन परीक्षण दिया और अपने पहले ही प्रयास में सफलता हासिल कर ली। अगले दो महीनों तक वह इस उम्मीद के साथ मैदान पर कड़ी मेहनत करती रहीं कि जल्द ही उन्हें अपनी पसंदीदा फुटबॉल टीम में जाने का अवसर मिलेगा। लेकिन जब दो महीने बीत जाने के बाद उन्होंने खेल बदलने का विषय उठाया, तो प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि उनका आधिकारिक पंजीकरण एक हॉकी खिलाड़ी के रूप में दर्ज हो चुका है। खेल नियमों के अनुसार अब उनके लिए खेल में बदलाव करना संभव नहीं था।
यह खबर सुनते ही बिचू देवी का दिल टूट गया और वह मैदान पर ही फफक-फफक कर रोने लगीं। उन्होंने अपने पिता से जिद की कि उन्हें खेल छोड़कर वापस घर ले चला जाए। उस कठिन घड़ी में उनके पिता ने अद्भुत धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने अपनी बेटी को ढांढस बंधाया, मानसिक रूप से मजबूत किया और मैदान पर डटे रहकर हॉकी में ही अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित किया। पिता के इसी मार्गदर्शन ने बिचू के भीतर नई ऊर्जा का संचार किया।
कोच नीलकमल सिंह का निर्णय और गोलकीपिंग का नया अध्याय
हॉकी की शुरुआती यात्रा में बिचू देवी एक फॉरवर्ड यानी स्ट्राइकर के रूप में खेलती थीं। विपक्षी टीम के सुरक्षा घेरे को भेदकर गोल दागना और उसके बाद पूरी टीम के साथ उत्साहपूर्ण जश्न मनाना उन्हें बहुत भाता था। मगर उनके करियर में सबसे बड़ा तकनीकी मोड़ तब आया जब उनके कोच नीलकमल सिंह की नजर उनकी असाधारण फुर्ती और रिफ्लेक्स पर पड़ी। कोच ने भांप लिया कि बिचू के अंदर एक विश्वस्तरीय रक्षक बनने की क्षमता मौजूद है।
कोच नीलकमल सिंह ने बिचू को फॉरवर्ड की भूमिका छोड़कर गोलकीपर के भारी-भरकम सुरक्षात्मक पैड्स पहनने की सलाह दी। जिस खिलाड़ी को विपक्षी गोलपोस्ट पर हमले करना पसंद था, उसे अब अपने गोलपोस्ट की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी जा रही थी। यह एक बड़ा मानसिक और शारीरिक बदलाव था, लेकिन बिचू देवी ने अपने कोच के भरोसे पर खरा उतरते हुए इस कठिन चुनौती को पूरी लगन के साथ स्वीकार किया।
महेंद्र सिंह धोनी की मानसिक दृढ़ता से ली प्रेरणा
गोलपोस्ट के ठीक सामने खड़े होकर विरोधी टीमों के प्रचंड प्रहारों का सामना करने के लिए अपार मानसिक मजबूती की आवश्यकता होती है। बिचू देवी मैदान पर दबाव के पलों से निपटने के लिए भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को अपना सबसे बड़ा आदर्श मानती हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की धोनी की कला, जिसे खेल जगत में 'कैप्टन कूल' के नाम से जाना जाता है, बिचू के लिए मार्गदर्शन का स्रोत बनी।
धोनी के जीवन के संघर्ष और उनकी सफलता की गाथा ने बिचू के खेल दृष्टिकोण पर गहरा प्रभाव डाला। जब महेंद्र सिंह धोनी के जीवन पर आधारित फिल्म सिनेमाघरों में आई, तो बिचू ने दबाव के दौरान एकाग्रता और शांत मन बनाए रखने के गूढ़ तरीकों को समझने के लिए उस फिल्म को बार-बार देखा। उन्होंने धोनी की इसी मानसिक शांति को अपने खेल में उतारा।
आज जब अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में विरोधी देश की टीमें भारतीय गोलपोस्ट पर धावा बोलती हैं, तो बिचू देवी एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं। एक दिन की देरी से शुरू हुए इस घटनाक्रम ने जिस फुटबॉलर का मार्ग बदला था, आज उसी खिलाड़ी की सटीक टाइमिंग, सजगता और शानदार डाइव पर पूरा देश गर्व अनुभव कर रहा है।



















