लाइव: मुंबई के कुर्ला में भूस्खलन से 4 लोगों की मौत, कई दबे; राहत व बचाव कार्य जारीलाइव: संसद के मानसून सत्र का 18वां दिन: हंगामे के बाद लोकसभा 2 बजे तक स्थगित, राज्यसभा में नारेबाजी जारीमूलांक 7 अंकराशि 12 अगस्त 2026: केतु की सूक्ष्म दृष्टि से दूर होंगी गलतियां और मजबूत होंगे रिश्तेडॉ. विक्रम साराभाई की जयंती पर राजनाथ सिंह ने दी श्रद्धांजलि, कहा- वैज्ञानिक सोच ने भारत को दी नई दिशामूलांक 9 अंकराशि 12 अगस्त 2026: मंगल और अंक 3 का योग बढ़ाएगा उत्साह, जानिए करियर और सेहत का हालमूलांक 8 अंकराशि 12 अगस्त 2026: शनि के अनुशासन और अंक 3 की ऊर्जा से मिलेगी कार्य में सफलताआवारापन 2 रिव्यू (2026): 19 साल पुरानी डिजास्टर फिल्म का सीक्वल, इमरान हाशमी की वापसी और मेकर्स का बड़ा दांव12 अगस्त 2026 का राशिफल: सूर्य ग्रहण के प्रभाव से चमकेगी इन राशियों की किस्मत, जानें मेष से मीन तक सभी 12 राशियों का सटीक भविष्यफलडोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर नाबालिगों के जेंडर ट्रांजिशन के लिए मेडिकेयड फंडिंग बंदगोरखपुर के महान क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह के बलिदान दिवस पर योगी आदित्यनाथ ने दी श्रद्धांजलि, जानिए तरकुलहा देवी से जुड़ा 7 बार फांसी का अद्भुत इतिहास
बाड़मेर की सीमांत बस्तियों से सात समंदर पार पहुंची सूफ कढ़ाई, विस्थापित महिलाओं ने सुई-धागे से बदली अपनी तकदीरसक्सेस स्टोरी
28 जून 2026, 10:04 am (45 दिन पहले)· 2

बाड़मेर की सीमांत बस्तियों से सात समंदर पार पहुंची सूफ कढ़ाई, विस्थापित महिलाओं ने सुई-धागे से बदली अपनी तकदीर

पाकिस्तान से विस्थापित होकर बाड़मेर आईं सैकड़ों हिंदू महिलाओं ने अपनी पारंपरिक सूफ कढ़ाई के दम पर न केवल आर्थिक स्वतंत्रता हासिल की है, बल्कि अपने नायाब उत्पादों को अमेरिका और यूरोप के शोरूम्स तक भी पहुंचाया है।

भारत और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित रेगिस्तानी जिला बाड़मेर कभी केवल अपने सामरिक महत्व और भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता था। लेकिन हाल के वर्षों में इस रेतीले इलाके की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज यह जिला वैश्विक स्तर पर बेहद खूबसूरत हस्तशिल्प और कलाकृतियों के एक बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। भले ही समय के साथ भौगोलिक सरहदें बदल गईं और परिवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा, लेकिन इस समुदाय की पीढ़ियों पुरानी कलात्मक विरासत विस्थापन के दर्द से पूरी तरह अछूती रही। पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए सैकड़ों हिंदू परिवारों की महिलाओं ने अपनी इस पारंपरिक कला को ही अपनी तकदीर संवारने, पहचान बनाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का सबसे मजबूत जरिया बना लिया है। उन्होंने साबित कर दिया है कि कला की कोई सीमा नहीं होती।

ये विस्थापित परिवार आज भी केवल सुई और धागे की मदद से पारंपरिक 'सूप-कढ़ाई' (सूफ कढ़ाई) का एक जादुई संसार रच रहे हैं। विभाजन और विस्थापन के गहरे दंश को झेलने के बाद, जो कला कभी इन परिवारों के लिए केवल दो वक्त की रोटी का जरिया बनी थी, आज वही कला इनकी सबसे बड़ी और सम्मानजनक पहचान बन चुकी है। इन महिलाओं की कड़ी मेहनत, अटूट धैर्य और बेहद बारीकी से तैयार किए गए उत्पाद अब देश की सीमाओं को लांघकर सात समंदर पार पहुंच रहे हैं। विदेशी बाजारों में, जहां पर्यावरण-अनुकूल फैशन और प्रामाणिक होम डेकोर की भारी मांग है, वहां इन कलाकृतियों को हाथों-हाथ लिया जा रहा है।

ये भी पढ़ें

रंग-बिरंगे धागे, चमकदार कांच और सुई का जादू

इस सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुद्धार के मूल में 'सूफ' कढ़ाई की वह अनूठी शैली है, जिसमें सुई-धागे के काम के लिए अविश्वसनीय धैर्य और अद्वितीय हुनर की आवश्यकता होती है। आधुनिक मशीनों के इस्तेमाल के बिना, ये महिला कारीगर पूरी तरह अपने हाथों से रंग-बिरंगे धागों, छोटे-छोटे चमकदार कांच (मिरर वर्क) और जटिल ज्यामितीय आकृतियों को कपड़ों पर उकेरती हैं। तैयार की गई प्रत्येक कलाकृति इन महिलाओं की मेहनत, ध्यान और नायाब हुनर की कहानी कहती है। पूरी तरह से हाथों से की जाने वाली इस प्रक्रिया के कारण हर उत्पाद अपने आप में अनूठा होता है, जिसमें वह मानवीय स्पर्श होता है जिसे मशीनें कभी रीक्रिएट नहीं कर सकतीं।

SURE संस्थान के सक्रिय सहयोग से ये विस्थापित महिलाएं न केवल अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं, बल्कि वे अपनी इस पुश्तैनी सांस्कृतिक धरोहर को अपने परिवार की अगली पीढ़ी की बेटियों तक भी पूरी शिद्दत से पहुंचा रही हैं। इनके द्वारा तैयार किए जाने वाले उत्पादों की श्रृंखला काफी विस्तृत है। इनमें आकर्षक बैग, दीवार पर सजाने वाले वॉल हैंगिंग, कुशन कवर, पारंपरिक परिधान, बेडशीट और कई तरह की सजावटी वस्तुएं शामिल हैं, जो पहली ही नजर में कला प्रेमियों का दिल जीत लेती हैं। किसी भी आधुनिक मशीन का उपयोग न करना ही इन उत्पादों की सबसे बड़ी USP है, जो इन्हें वैश्विक स्तर पर खास बनाती है।

बाड़मेर की ढाणियों से अमेरिका और यूरोप के आलीशान शोरूम तक

इन ग्रामीण कारीगरों के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव तब आया, जब उन्हें आधुनिक बाजार की जरूरतों और बदलते फैशन ट्रेंड के अनुसार विशेष प्रशिक्षण दिया गया। SURE संस्थान की अध्यक्ष लता कछवाहा के मार्गदर्शन में, इन महिलाओं ने अपनी पारंपरिक कला को वैश्विक और शहरी ग्राहकों की पसंद के अनुरूप ढालना सीखा। इस रणनीतिक पहल ने इनके लिए अवसरों के नए द्वार खोल दिए। आज इन हस्तशिल्प उत्पादों की भारी मांग न केवल राजस्थान के स्थानीय मेलों और प्रदर्शनियों में है, बल्कि दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और बेंगलुरु जैसे देश के बड़े महानगरों में भी इनका जलवा बिखरा हुआ है।

घरेलू बाजार के अलावा, भारत आने वाले विदेशी पर्यटक और बड़े निर्यातक भी इस बारीक सूफ कढ़ाई की खूबसूरती के दीवाने हो चुके हैं। यही वजह है कि इन सीमांत गांवों में तैयार किए जा रहे प्रीमियम उत्पाद अब सीधे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोप के अन्य विकसित देशों के शोरूम तक भेजे जा रहे हैं। इस सीधे व्यापार माध्यम ने बिचौलियों की भूमिका को खत्म कर दिया है, जिससे इन विस्थापित महिलाओं को न केवल अपनी मेहनत का पूरा दाम मिल रहा है, बल्कि उन्हें एक सम्मानित अंतरराष्ट्रीय मंच भी हासिल हुआ है।

सीमावर्ती गांवों में गूंजता स्वावलंबन का स्वर

बाड़मेर जिले के सुदूर और भारत-पाक सीमा से सटे ग्रामीण इलाकों जैसे धनाऊ, चौहटन, रामसर, गडरारोड़, भोजारिया, बावड़ी, बाखासर, सेड़वा और आलमसर सहित इसके आसपास की ढाणियों में जाने पर आपको एक अनोखा नजारा देखने को मिलेगा। यहां लगभग हर दूसरे घर में महिलाएं पूरी तन्मयता से इस पारंपरिक सुई-कढ़ाई के काम में व्यस्त दिखाई देती हैं। इन सीमावर्ती ढाणियों में कपड़े के भीतर जाती और बाहर आती सुइयों की आवाज एक खामोश आर्थिक क्रांति का संकेत देती है।

पाकिस्तान से आए जिन हिंदू परिवारों ने कभी विस्थापन के दौरान अपना सब कुछ, जैसे घर-बार, जमीन-जायदाद और जमापूंजी, खो देने का असहनीय मानसिक और आर्थिक आघात सहा था, आज वही परिवार किसी के आगे हाथ फैलाने या मजदूरी के लिए भटकने के बजाय अपने इसी अद्भुत हुनर के दम पर पूरे सम्मान के साथ समाज में सिर उठाकर जी रहे हैं। इन छोटे-छोटे गांवों में महिलाओं का यह सामूहिक प्रयास इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि कैसे एक पारंपरिक लोक कला इंसानी हौसलों के दम पर विस्थापन की कड़वी यादों को मिटाकर जीवन को दोबारा गरिमा और समृद्धि से भर सकती है।

सवाल-जवाब

बाड़मेर में विस्थापित महिलाओं द्वारा की जाने वाली पारंपरिक कढ़ाई को क्या कहते हैं?
इस पारंपरिक कढ़ाई को 'सूफ' या 'सूप' कढ़ाई कहा जाता है, जो पूरी तरह से बिना मशीनों के केवल सुई और धागे से की जाती है।
इन विस्थापित महिलाओं को आधुनिक बाजार में पहचान दिलाने में किस संस्था ने मदद की?
SURE संस्थान ने इन महिलाओं को बाजार की जरूरतों के अनुसार आधुनिक प्रशिक्षण देकर उनके उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने में मदद की।
बाड़मेर की इन महिलाओं द्वारा तैयार हस्तशिल्प उत्पाद किन देशों में निर्यात किए जा रहे हैं?
ये प्रीमियम उत्पाद सीधे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोप के अन्य विकसित देशों के आलीशान शोरूम्स में भेजे जा रहे हैं।
बाड़मेर के कौन से सीमावर्ती गांवों में यह सुई-कढ़ाई का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है?
यह काम धनाऊ, चौहटन, रामसर, गडरारोड़, भोजारिया, बावड़ी, बाखासर, सेड़वा और आलमसर जैसे सीमावर्ती गांवों में प्रमुखता से किया जा रहा है।
इन सूफ कढ़ाई उत्पादों की मुख्य USP क्या है?
इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें बनाने में किसी भी आधुनिक मशीन का उपयोग नहीं होता; यह पूरी तरह से हाथ की बारीक कारीगरी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR