सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी स्थित आदर्श मध्य विद्यालय मधुबन की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। एक समय था जब ढलते सूरज के साथ ही इस परिसर में शराबियों का जमावड़ा लग जाता था और ताश की महफिलें सजती थीं। असामाजिक तत्वों के कब्जे के कारण बच्चों और शिक्षकों के लिए वहां टिकना मुश्किल था। लेकिन एक शिक्षक के दृढ़ संकल्प ने इस पूरी तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया। इस अभूतपूर्व बदलाव के पीछे द्विजेंद्र कुमार उर्फ द्विजेंद्र सुमन की लंबी मेहनत और दूरदर्शिता शामिल है, जिन्होंने शिक्षा की अलख जगाने का बीड़ा उठाया।
शुरुआत में जर्जर भवन और सुरक्षा थी बड़ी चुनौती
वर्ष 2013 में जब द्विजेंद्र सुमन ने इस विद्यालय में अपनी सेवा देनी शुरू की, तो सबसे बड़ी समस्या स्कूल की खराब हालत और सुरक्षा का अभाव था। परिसर खुला होने के कारण बाहरी लोगों का आना-जाना लगा रहता था। उन्होंने इस स्थिति से निपटने के लिए सबसे पहले ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ संवाद स्थापित किया। सभी के मिले-जुले सहयोग से उन्होंने स्कूल के चारों तरफ आठ से दस फीट ऊंची मजबूत चहारदीवारी का निर्माण कराया और मुख्य द्वार पर ताला लगाने के लिए मजबूत गेट लगवाया।
कबाड़ और पुरानी चीजों का बेहतरीन इस्तेमाल
सुरक्षा पुख्ता होने के बाद विद्यालय के पुराने और जर्जर हो चुके भवनों को गिराया गया। उस मलबे से निकली ईंटों को बेकार नहीं जाने दिया गया, बल्कि उनका उपयोग कर विद्यालय परिसर के भीतर ही सुंदर बागवानी विकसित की गई। इसके अलावा, पुरानी सखुआ की लकड़ी को व्यर्थ फेंकने के बजाय उससे विद्यार्थियों के बैठने के लिए डेस्क, बेंच और भोजन करने के लिए मजबूत मेज तैयार करवाई गईं। जब परिसर पूरी तरह सुरक्षित हो गया और बाहरी तत्वों का आना बंद हुआ, तब जाकर बच्चों के पढ़ने के अनुकूल शांत और सकारात्मक माहौल बन सका।
युवाओं को जोड़कर दूर की शिक्षकों की कमी
विद्यालय के सामने अध्यापकों की भारी कमी एक बहुत बड़ी बाधा थी, जिसका सामना करने के लिए द्विजेंद्र सुमन ने एक अनूठा रास्ता निकाला। उन्होंने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं को आगे आकर बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया और इस नेक काम से जोड़ा। शुरुआत के दिनों में उन्होंने इन युवाओं को अपने पास से वेतन यानी मानदेय देना शुरू किया। बाद में जब लोगों का भरोसा जागा तो गांव के समाज, चंदे और अन्य माध्यमों से आर्थिक मदद जुटाई जाने लगी।
महज चार अतिरिक्त शिक्षकों से शुरू हुई इस व्यवस्था का दायरा बढ़कर चौदह शिक्षकों तक पहुंच गया। इन सभी मददगार युवाओं को हर महीने एक हजार से दो हजार रुपये तक का मानदेय दिया जाता था और यह अनूठी व्यवस्था साल 2016 तक अनवरत चलती रही। इस जनसहयोग वाली पहल का सीधा असर स्कूल की उपस्थिति पर दिखाई दिया। जहां पहले मात्र पचास से साठ बच्चे ही स्कूल आते थे, वहीं बेंचों पर छात्रों की उपस्थिति बढ़कर सीधे सत्तर से पचहत्तर प्रतिशत तक जा पहुंची।
पर्यावरण संरक्षण और जल संचय में भी दिखाई मिसाल
केवल किताबी शिक्षा तक सीमित न रहते हुए द्विजेंद्र सुमन ने विद्यालय परिसर को पर्यावरण के अनुकूल बनाने और जल संरक्षण की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य किए। तत्कालीन जिलाधिकारी राजीव रौशन द्वारा चलाए जा रहे जल संरक्षण अभियान से प्रेरित होकर उन्होंने स्कूल परिसर के भीतर जल स्रोतों के आसपास कुल सात सोखता का निर्माण कराया। उनकी इस सराहनीय पहल ने प्रशासन का ध्यान खींचा, जिसके चलते उन्हें जिला स्तर पर पहला स्थान प्राप्त हुआ और प्रथम पुरस्कार से नवाजा गया। साथ ही उनके विद्यालय को भी विशेष सम्मान प्रदान किया गया।
प्रमंडल और राज्य स्तर पर मिला गौरवशाली सम्मान
विद्यालय की दशा सुधारने और शैक्षणिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए द्विजेंद्र सुमन को कई बड़े मंचों पर सम्मानित किया गया। पांच सितंबर 2016 को प्रमंडलीय आयुक्त ने उन्हें विशेष रूप से अपने पास बुलाकर उनकी पीठ थपथपाई और सम्मानित किया। इसके ठीक अगले साल पांच सितंबर 2017 को पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में बिहार सरकार की ओर से उन्हें राज्य स्तरीय पुरस्कार प्रदान किया गया। इस दौरान एक बेहतरीन मिसाल पेश करते हुए उन्होंने राज्य स्तर पर मिले पंद्रह हजार रुपये के पुरस्कार की पूरी राशि मुख्यमंत्री के माध्यम से शिक्षक कल्याण कोष में दान स्वरूप जमा करवा दी।
राष्ट्रपति के हाथों मिला देश का सर्वोच्च शिक्षक सम्मान
दशकों की कड़ी मेहनत, समर्पण और लगातार किए गए सकारात्मक प्रयासों का सुखद परिणाम वर्ष 2023 में सामने आया, जब देश ने उनके कामों का लोहा माना। राष्ट्रपति द्वारा द्विजेंद्र कुमार को प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिससे पूरे जिले का सिर गर्व से ऊंचा हो गया। उसी वर्ष तेरह सितंबर को उन्हें उसी विद्यालय में नियमित प्रधानाध्यापक के पद पर आधिकारिक रूप से नियुक्त कर दिया गया। असामाजिक तत्वों के चंगुल से निकलकर शिक्षा का प्रकाश फैलाने वाला यह विद्यालय आज पूरे देश के सरकारी स्कूलों के लिए एक जीवंत मिसाल बन चुका है।



















