झारखंड के बोकारो जिले में पारंपरिक फसलों की जगह आधुनिक तौर-तरीकों से सब्जियों की खेती कर किसान अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं. पेटरवार प्रखंड स्थित भंगाट गांव के रहने वाले किसान अरुण महतो ने इस दिशा में एक सफल मिसाल पेश की है. उन्होंने अपनी एक एकड़ जमीन पर मचान और मल्चिंग विधि के जरिए झींगा यानी तोरई की खेती की और कम समय में शानदार मुनाफा अर्जित किया. अरुण कुमार महतो एक पारंपरिक कृषि परिवार से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने इस काम की बुनियादी सीख अपने माता-पिता और दादा-दादी से हासिल की थी. पारिवारिक प्रेरणा को आधुनिक तकनीक से जोड़कर उन्होंने खेती को अपनी आय का मुख्य जरिया बनाया और कई तरह की सब्जियों की पैदावार शुरू की.
अगस्त में बुवाई और 35 दिनों में पहली तुड़ाई
अरुण महतो ने अगस्त के महीने में एक एकड़ खेत में झींगा की बुवाई शुरू की थी. इस दौरान उन्होंने खेत में पौधों के बेहतर फैलाव के लिए मचान बनाया और जमीन की सुरक्षा के लिए मल्चिंग प्लास्टिक का सहारा लिया. इस संयुक्त तकनीक की बदौलत बेलों का विकास काफी तेजी से और सुरक्षित माहौल में हुआ. मल्चिंग के कारण जमीन में लंबे समय तक आवश्यक नमी बनी रही, जिससे पानी की बर्बादी भी रुकी. पौधों में बढ़वार के बाद मात्र 30 से 35 दिनों के भीतर फसल तुड़ाई के योग्य हो गई. एक बार तुड़ाई शुरू होने के बाद लगभग डेढ़ महीने तक लगातार खेत से ताजी तोरई मिलती रही, जिससे किसान को दैनिक स्तर पर नियमित आमदनी हासिल करने में काफी मदद मिली.
लागत, उत्पादन और मुनाफे का पूरा गणित
एक एकड़ खेत में इस पद्धति से झींगा लगाने का पूरा खर्च लगभग 50 हजार रुपये के आसपास बैठता है. अगर फसल की देखरेख समय पर हो, तो एक एकड़ से करीब 50 क्विंटल तक झींगा का कुल उत्पादन हासिल किया जा सकता है. बाजार में आमतौर पर पूरे साल झींगा सब्जी का औसत मूल्य 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक बना रहता है. यदि 50 क्विंटल उपज को 30 रुपये प्रति किलोग्राम के सामान्य भाव पर भी बेचा जाए, तो किसान को करीब 1.50 लाख रुपये की सकल कमाई प्राप्त होती है. इसमें से 50 हजार रुपये की शुरुआती लागत घटाने के बाद किसान के पास लगभग 1 लाख रुपये का सीधा शुद्ध मुनाफा बचता है.
रोग प्रबंधन और कृषि विशेषज्ञों की सलाह
झींगा की सफल फसल लेने के लिए अरुण महतो अन्य किसानों को सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं. उनके मुताबिक फसल की बढ़वार के दौरान कई बार पत्तों का पीला पड़ना और पत्तियों का मुड़ना जैसी परेशानियां सामने आ जाती हैं. ऐसी समस्याओं के उभरने पर किसानों को खुद से या बिना सोचे-समझे किसी भी कीटनाशक दवा का इस्तेमाल करने से परहेज करना चाहिए. सही तरीका यही है कि समय रहते किसी योग्य कृषि विशेषज्ञ से परामर्श लिया जाए और उनकी बताई हुई दवाओं का ही संतुलित छिड़काव किया जाए. इस तरह के वैज्ञानिक प्रबंधन से फसल को नुकसानदेह कीटों और बीमारियों से आसानी से बचाया जा सकता है, जिससे पैदावार की गुणवत्ता और मात्रा दोनों सुरक्षित रहती हैं.



















