झारखंड के कोडरमा जिले में झुमरी तिलैया के गौशाला रोड पर रहने वाले संतोष मोदी अपने घर के सामने राशन की छोटी दुकान और नाश्ते का ठेला चलाकर परिवार चलाते हैं. वे खुद हाथों से चाय बनाकर और पकौड़ियां तलकर ग्राहकों को परोसते हैं. उन्हीं के बेटे सत्यम मोदी ने अब री-नीट 2026 में शानदार अंक हासिल कर पूरे परिवार का सपना पूरा कर दिया है और जल्द ही वे एमबीबीएस डॉक्टर बनने की राह पर आगे बढ़ेंगे.
पहली बार में मिली नाकामी, फिर मेहनत से पलटी बाजी
सत्यम की शुरुआती पढ़ाई कोडरमा में ही हुई. 2023 में उन्होंने डीएवी पब्लिक स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की. दसवीं के बाद उन्होंने विज्ञान संकाय चुना और बायोलॉजी विषय के साथ पढ़ाई शुरू की. यहीं से उनके मन में डॉक्टर बनने की चाहत जगी. इस सपने को पूरा करने के लिए वे राजस्थान के कोटा शहर चले गए, जहां देशभर से लाखों छात्र नीट की तैयारी करने आते हैं. 2025 में सत्यम ने पहली बार नीट परीक्षा दी थी लेकिन नतीजा उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, उनकी ऑल इंडिया रैंक करीब 36 हजार आई थी. इस झटके के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी कमजोरियों को बारीकी से समझा और दोगुनी मेहनत के साथ दोबारा तैयारी में जुट गए. नतीजा यह रहा कि 2026 की परीक्षा में उन्होंने 720 में से 640 अंक हासिल किए. इस बार उनकी ऑल इंडिया रैंक 2321 आई, जबकि ओबीसी एनसीएल श्रेणी में उन्हें 838वीं रैंक मिली.
मॉक टेस्ट और सही रणनीति ने बदली किस्मत
सत्यम बताते हैं कि इस सफलता के पीछे सबसे बड़ी भूमिका नियमित मॉक टेस्ट देने और हर बार अपनी गलतियों का बारीकी से विश्लेषण करने की रही. उनका मानना है कि छात्रों को घंटे गिनकर पढ़ाई करने की बजाय समझदारी से पढ़ाई करनी चाहिए. अगर कोई छात्र सिर्फ तय समय पूरा करने के इरादे से किताब लेकर बैठता है, तो उसका ध्यान आसानी से भटक जाता है, जबकि विषय को असल में समझने और सीखने पर ध्यान देने से कम समय में भी बेहतर नतीजे मिलते हैं. कोटा में रहते हुए सत्यम कोचिंग की क्लास और सेल्फ स्टडी को मिलाकर रोजाना 10 से 12 घंटे पढ़ाई करते थे. इस दौरान उन्होंने मोबाइल और सोशल मीडिया की आदत पर पूरी तरह लगाम कसे रखी. वे सिर्फ यूट्यूब और व्हाट्सएप का उतना ही इस्तेमाल करते थे जितना जरूरी हो. यूट्यूब पर पढ़ाई से जुड़े वीडियो देखकर वे मुश्किल कॉन्सेप्ट समझते थे, जबकि व्हाट्सएप के जरिए कोचिंग संस्थान और शिक्षकों के ग्रुप से जरूरी स्टडी मैटेरियल मिल जाता था.
तीन साल तक नहीं लौटे घर, छूट गईं शादियां और त्योहार
सत्यम ने बताया कि जिस दिन वे कोटा के लिए निकले थे, उसी दिन उन्होंने ठान लिया था कि सफलता हासिल किए बगैर घर वापस नहीं आएंगे. इस संकल्प को निभाते हुए वे लगातार तीन साल तक घर नहीं लौटे. इन तीन बरसों में परिवार में कई शादियां हुईं, कई त्योहार आए और कई पारिवारिक आयोजन हुए, लेकिन सत्यम हर बार इनसे दूर रहे और अपना पूरा ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर लगाए रखा. अब नीट में मिली सफलता के साथ उनका यह तीन साल का 'वनवास' खत्म हुआ है और वे वापस अपने घर कोडरमा लौटे हैं.
अब एम्स से एमबीबीएस की उम्मीद
सत्यम ने अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता, शिक्षकों और परिवार के सहयोग को दिया. उन्होंने बताया कि अपनी मौजूदा रैंक के हिसाब से उन्हें एम्स पटना या एम्स देवघर में एमबीबीएस में दाखिला मिलने की पूरी उम्मीद है. सत्यम का कहना है कि वे एक कुशल और संवेदनशील डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना चाहते हैं. गौशाला रोड पर छोटी सी दुकान चलाने वाले उनके पिता संतोष मोदी के लिए बेटे की यह उपलब्धि किसी बड़े सम्मान से कम नहीं है.

















