सागर की स्पेशल ब्रांच में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात दिनेश कुमार कौशल का नाम आजकल हर तरफ लिया जा रहा है, वजह है उनका असाधारण करियर, जिसमें एसपी बनने से पहले उन्होंने पूरे आठ अलग-अलग सरकारी पदों पर काम किया और हर बार उन्हें छोड़कर आगे बढ़ते गए. पिछले 28 वर्षों से पुलिस महकमे में सेवा दे रहे कौशल स्वभाव से हंसमुख और मिलनसार माने जाते हैं, मगर ड्यूटी के मोर्चे पर उनकी सख्ती के किस्से भी कम मशहूर नहीं हैं.
छतरपुर के लड़के का पुलिस अफसर बनने तक का सफर
छतरपुर जिले के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे दिनेश कौशल के मन में वर्दी को लेकर लगाव किशोरावस्था में ही जाग गया था, जब उन्होंने एनसीसी (NCC) की वर्दी पहनी. यहीं से पुलिस अफसर बनने की ठान ली गई. मंजिल तक पहुंचना आसान नहीं रहा, इसके लिए उन्हें लंबा रास्ता तय करना पड़ा. सबसे पहले उन्हें पटवारी के पद पर नौकरी मिली. इसके बाद पुलिस महकमे में ही कांस्टेबल से सब इंस्पेक्टर तक पांच अलग-अलग पदों पर काम करने का मौका मिला. आखिरकार 1998 बैच में उनका चयन डीएसपी के पद पर हुआ, यानी डीएसपी बनने से पहले वे कुल आठ सरकारी नौकरियों का अनुभव समेट चुके थे.
दतिया में डकैतों से आमने-सामने की मुठभेड़
साल 2004 में दतिया में एसडीओपी (SDOP) की जिम्मेदारी संभाल रहे दिनेश कौशल को सूचना मिली कि एक डकैत गिरोह अपहरण की साजिश रच रहा है. इस पर पुलिस टीम ने पूरी रात घात लगाकर इंतजार किया. अगली सुबह-सुबह बदमाशों ने एक बस को निशाना बनाकर गोलीबारी शुरू कर दी, तभी कौशल और उनकी टीम ने डटकर मोर्चा संभाला और सीधी टक्कर ली. इस मुठभेड़ में गिरोह के दो प्रमुख सरगना ढेर हो गए. इनमें एक ऐसा बदमाश भी शामिल था, जिसके खिलाफ पहले से 35 आपराधिक केस दर्ज थे और उसे पकड़ने के लिए तीन प्रदेशों की पुलिस ने अलग-अलग इनाम घोषित कर रखे थे.
आतंकियों की गिरफ्तारी और दंगे पर काबू
भोपाल एटीएस (ATS) में डीएसपी रहते हुए दिनेश कौशल ने उस टीम की अगुवाई की, जिसने 10 खतरनाक आतंकवादियों को धर दबोचा. इस बहादुरी पर मुख्यमंत्री ने उन्हें पिस्टल अवार्ड देकर सम्मानित किया. इसके बाद ग्वालियर में एडिशनल एसपी के तौर पर तैनाती के दौरान शहर में भड़के एक बड़े दंगे, जो सांप्रदायिक रंग ले चुका था, को उन्होंने बेहद सूझबूझ से संभाला, नतीजा ये रहा कि इस दंगे में किसी की जान नहीं गई.
15 साल से नहीं पड़े बीमार, फिटनेस का राज योग और साइकिलिंग
ड्यूटी के अलावा दिनेश कौशल की सेहत को लेकर अनुशासन भी चर्चा का विषय बना रहता है. बीते 15 सालों से वे नियमित रूप से योग, साइकिलिंग और स्विमिंग करते आ रहे हैं. हर दिन वे अपनी सेहत के लिए दो घंटे निकालते हैं, इसमें एक घंटा योग के लिए तय है, जबकि बचा हुआ समय साइकिलिंग या स्विमिंग में जाता है. इसी अनुशासन का नतीजा है कि पिछले 15 साल में वे एक भी दिन बीमार नहीं पड़े, यहां तक कि कोरोना महामारी के दौर में भी वे पूरी तरह स्वस्थ बने रहे.
पत्नी वकील, बेटी डॉक्टर, बेटा इंजीनियर
पढ़ाई और अनुशासन के मामले में दिनेश कौशल का परिवार भी किसी से पीछे नहीं है. उनकी पत्नी कानून की जानकार हैं, उन्होंने एलएलबी और एलएलएम के अलावा पीएचडी (PhD) की डिग्री भी हासिल की है. परिवार में बेटी श्रुति ने डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की है, उन्होंने इस साल लखनऊ से एमबीबीएस (MBBS) किया है. वहीं बेटा क्षितिज इंजीनियर है, उसने आईआईटी (IIT) दिल्ली से बीटेक की पढ़ाई की है.
राष्ट्रपति वीरता पदक से लेकर दो पिस्टल अवार्ड तक
दिनेश कुमार कौशल की बहादुरी को राष्ट्रपति वीरता पदक से नवाजा जा चुका है, वहीं मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें केएफ रुस्तम जी अवार्ड से भी सम्मानित किया है. अब तक उन्हें कुल दो बार पिस्टल अवार्ड मिल चुका है. संघर्ष से सफलता तक का उनका यह सफर आज के युवाओं के लिए एक बड़ी सीख बन चुका है.

















