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मधुबनी के मोहनपुर से निकला गांव का पहला डॉक्टर, कैंसर पीड़ित पिता के बेटे त्रिपुरारी ने रचा इतिहाससक्सेस स्टोरी
2 घंटे पहले· 3

मधुबनी के मोहनपुर से निकला गांव का पहला डॉक्टर, कैंसर पीड़ित पिता के बेटे त्रिपुरारी ने रचा इतिहास

बिहार के मधुबनी जिले के मोहनपुर गांव के त्रिपुरारी सिंह यादव ने पहले ही प्रयास में नीट यूजी क्वालीफाई कर लिया है और गांव के पहले डॉक्टर बनने जा रहे हैं, जबकि उनके पिता कैंसर से जूझ रहे हैं।

बिहार के मधुबनी जिले के मोहनपुर गांव से निकला एक किसान परिवार का बेटा अब अपने गांव का पहला डॉक्टर बनने जा रहा है। पंडौल प्रखंड के इस गांव के त्रिपुरारी सिंह यादव ने पहले ही प्रयास में नीट यूजी क्वालीफाई कर लिया है और ऐसा करने वाले वे अपने गांव के पहले युवा हैं।

बीमार पिता और सीमित संसाधनों के बीच बड़ा मुकाम

त्रिपुरारी एक आम परिवार से आते हैं। उनके पिता विनोद कुमार यादव कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, घर पर ही रहते हैं और थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी संभाल लेते हैं। मां कुमारी किरण जीविका में काम करती हैं। उनका कहना है कि बेटा शुरू से ही पढ़ाई में होनहार रहा है, कभी कोई शिकायत नहीं मिली और गांव में रहकर ही दसवीं और बारहवीं तक पढ़ाई की, हमेशा अच्छे अंक हासिल किए। परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि बच्चों को बेहतरीन शिक्षा दिलाई जा सके, लेकिन शुरू से ही मामा का पूरा साथ मिला, जिन्होंने पढ़ाई से जुड़ी हर जरूरत का ख्याल रखा। मां बताती हैं कि उनका सपना था कि बेटा कुछ बड़ा करे, और अब जब वह एमबीबीएस करने जा रहा है तो यह परिवार के लिए बहुत खुशी की बात है।

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गांव में जहां साक्षरता ही मुश्किल, वहां से नीट तक का सफर

त्रिपुरारी के गांव में शिक्षा का स्तर बेहद कम है। यहां ज्यादातर बच्चे दसवीं और बारहवीं तक पहुंचना भी मुश्किल मानते हैं और साक्षरता दर भी कम है। इसी माहौल में रहते हुए त्रिपुरारी ने दसवीं में 94.6 प्रतिशत और बारहवीं में 80 प्रतिशत अंक हासिल किए और पहले ही प्रयास में नीट क्वालीफाई कर लिया, जिससे वे अपने गांव के अब तक के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे युवा बन गए हैं।

डॉक्टर बनने की चाहत क्यों

त्रिपुरारी कहते हैं कि उन्हें कार्डियो यानी हृदय से जुड़े इलाज में खास दिलचस्पी रही है और वे हमेशा से डॉक्टर बनना चाहते थे। उनका मानना है कि इस क्षेत्र में लोगों को समाज में बहुत सम्मान मिलता है और नाम के साथ-साथ लोगों की ढेर सारी दुआएं भी मिलती हैं, यही वजह है कि उनकी इस क्षेत्र में हमेशा से रुचि रही।

री-एग्जाम में थोड़े कम आए अंक

त्रिपुरारी के नीट के सफर में एक मोड़ भी आया। पहली बार हुई असली परीक्षा में उन्हें शानदार 651 अंक मिले थे। लेकिन जब बाद में दोबारा परीक्षा आयोजित हुई, तो उनके अंक थोड़े घटकर इस बार 570 रह गए। उनका कहना है कि दोबारा हुई परीक्षा में सवाल काफी कठिन थे, कुछ सवाल तो समझ से ही बाहर लगे। एनसीईआरटी से जुड़े सवाल आसान थे, लेकिन फिजिक्स और केमिस्ट्री के सवालों को समझना उनके साथ-साथ कई और परीक्षार्थियों के लिए भी मुश्किल रहा।

आगे क्या, एमबीबीएस और काउंसलिंग की उम्मीद

अंक कम होने के बावजूद त्रिपुरारी को भरोसा है कि उन्हें एमबीबीएस सीट मिल जाएगी। बता दें कि आमतौर पर 30 हजार तक की ऑल इंडिया रैंक पर एमबीबीएस मिल जाता है, और इस बार यानी 2026 में री-एग्जाम के बाद कटऑफ पहले से नीचे गया है। त्रिपुरारी को उम्मीद है कि उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलेगा, ऑल इंडिया कोटा से न सही तो अपने गृह राज्य में स्टेट काउंसलिंग के जरिए आसानी से सीट मिल जाएगी।

सवाल-जवाब

त्रिपुरारी सिंह यादव कौन हैं?
वे बिहार के मधुबनी जिले के पंडौल प्रखंड स्थित मोहनपुर गांव के छात्र हैं, जिन्होंने पहले ही प्रयास में नीट यूजी क्वालीफाई किया है।
त्रिपुरारी को नीट में कितने अंक मिले?
पहली परीक्षा में उन्हें 651 अंक मिले थे, जबकि दोबारा हुई परीक्षा में उनके अंक घटकर 570 रह गए।
उनके अंक री-एग्जाम में कम क्यों हुए?
त्रिपुरारी के मुताबिक दोबारा हुई परीक्षा में सवाल बहुत कठिन थे और फिजिक्स-केमिस्ट्री के सवाल समझना मुश्किल था।
त्रिपुरारी के माता-पिता क्या करते हैं?
उनके पिता विनोद कुमार यादव कैंसर से जूझते हुए घर पर रहकर थोड़ी खेती करते हैं, जबकि मां कुमारी किरण जीविका में काम करती हैं।
क्या त्रिपुरारी को एमबीबीएस सीट मिलेगी?
उन्हें भरोसा है कि 30 हजार तक की ऑल इंडिया रैंक पर एमबीबीएस मिल जाता है और इस बार कटऑफ भी कम गया है, इसलिए उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलने की उम्मीद है।
त्रिपुरारी डॉक्टर क्यों बनना चाहते हैं?
उनका कहना है कि उन्हें कार्डियो में खास दिलचस्पी है और डॉक्टरों को समाज में मिलने वाला सम्मान व दुआएं उन्हें हमेशा से आकर्षित करती रही हैं।
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