जोधपुर के पास बसे छोटे से गांव नांदड़ी में इन दिनों उत्सव जैसा माहौल है. वजह है इस गांव की बेटी डिम्पल खींची, जिन्होंने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षाओं में गिनी जाने वाली NEET में 617 अंक हासिल कर पूरे इलाके का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है. डॉक्टर बनने की राह पर आगे बढ़ रही डिम्पल सिर्फ किताबों की दुनिया तक सीमित नहीं हैं, वे मैदान पर भी उतनी ही दमदार हैं, और यही बात उनकी कहानी को बाकियों से अलग बनाती है.
क्लासरूम से लेकर मैदान तक बराबर दबदबा
डिम्पल की सबसे बड़ी खासियत उनकी बहुमुखी प्रतिभा है. वे सिर्फ परीक्षा हॉल में ही तेज नहीं हैं, बल्कि नेशनल लेवल पर खेलों में हिस्सा लेकर भी अपना दमखम दिखा चुकी हैं. पढ़ाई और खेल, दोनों में बराबर समय और ऊर्जा लगाना आसान काम नहीं है, क्योंकि दोनों क्षेत्रों की मांग अलग तरह के अनुशासन की होती है. फिर भी डिम्पल ने दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया, जिससे उनके गांव और आसपास के इलाके में उन्हें एक ऑल-राउंडर के तौर पर देखा जाने लगा है. कम उम्र में इतने अलग-अलग क्षेत्रों में पकड़ बनाना आसान नहीं होता, लेकिन डिम्पल ने साल दर साल यह साबित किया है कि सही योजना के साथ दोनों काम एक साथ संभव हैं.
यह पहली नहीं, लगातार चौथी बड़ी कामयाबी है
NEET का यह स्कोर डिम्पल के करियर की अकेली उपलब्धि नहीं है, बल्कि एक लंबी फेहरिस्त की ताजा कड़ी है. स्कूली पढ़ाई के दौर में ही उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय की दाखिला परीक्षा में पूरे देश में दूसरा स्थान हासिल कर लिया था, जो अपनी उम्र के हिसाब से एक असाधारण उपलब्धि थी. इसके बाद पिछले साल उन्होंने इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी दाखिला परीक्षा जेईई मेन्स में भी हाथ आजमाया और 94.58 प्रतिशत अंक हासिल कर अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया. फिर करीब दस दिन पहले एक और अच्छी खबर आई, जब एम्स की नर्सिंग दाखिला परीक्षा के नतीजे घोषित हुए और उसमें डिम्पल ने देशभर में 387वीं रैंक हासिल की. इतने अलग-अलग क्षेत्रों की परीक्षाओं में बार-बार अच्छा प्रदर्शन दिखाता है कि यह किस्मत का खेल नहीं बल्कि बरसों की तैयारी और मेहनत का नतीजा है, और यही निरंतरता उन्हें बाकी छात्रों से अलग खड़ा करती है.
पिता के साथ और सामाजिक सम्मान ने दिया हौसला
इतनी बड़ी कामयाबी अकेले नहीं मिलती, और डिम्पल के मामले में उनके परिवार की भूमिका बेहद अहम रही है. उनके पिता कुंदन सिंह खींची जोधपुर शहर में अपना कोरियर का काम खुद संभालते हैं. एक छोटे कारोबार को चलाने के साथ-साथ उन्होंने कभी बेटी की पढ़ाई और खेल को दूसरे नंबर पर नहीं रखा, बल्कि दोनों में उसे लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. डिम्पल की इसी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें पहले भी महाराजा गजसिंह और सम्पूर्ण मारवाड़ राजपूत सभा जैसे बड़े मंचों से सम्मानित किया जा चुका है, जो यह दिखाता है कि उनकी काबिलियत की पहचान इस परीक्षा परिणाम से भी पहले हो चुकी थी.
गांव में जश्न, बेटियों के लिए नई मिसाल
जैसे ही NEET में 617 अंक की खबर नांदड़ी पहुंची, गांव में बधाई देने वालों का तांता लग गया. सिर्फ गांव ही नहीं, आसपास के इलाके और राज्यभर से लोग डिम्पल को शुभकामनाएं भेज रहे हैं. गांव के शिक्षकों और समाज के जानकार लोगों का मानना है कि डिम्पल की यह यात्रा आने वाली पीढ़ी के लिए मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य पर टिके रहने का बेहतरीन सबक है. यह कामयाबी अब सिर्फ खींची परिवार तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे जोधपुर और राजस्थान के लिए गर्व का विषय बन चुकी है. ग्रामीण इलाकों में रहने वाली हजारों बेटियों के लिए डिम्पल की यह कहानी यह भरोसा दिलाती है कि अगर लक्ष्य साफ हो और मेहनत सच्ची हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद कोई भी मंजिल दूर नहीं रहती.




















