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जर्मनी से आई 60 हजार की मशीन और एक कैंडी फैक्ट्री, ऐसे बना अंग्रेजों को टक्कर देने वाला पारले-जीसक्सेस स्टोरी
5 अग॰ 2026, 4:24 pm (3 घंटे पहले)· 1

जर्मनी से आई 60 हजार की मशीन और एक कैंडी फैक्ट्री, ऐसे बना अंग्रेजों को टक्कर देने वाला पारले-जी

आजादी से 18 साल पहले 1929 में एक छोटी कैंडी फैक्ट्री के तौर पर शुरू हुआ कारोबार कैसे बना अंग्रेजों के महंगे बिस्कुट को टक्कर देने वाला भारत का सबसे भरोसेमंद ब्रांड पारले-जी, जानिए इस सफर की पूरी कहानी।

चाय के साथ हर भारतीय के बचपन का साथी रहा वह पीला-सफेद पैकेट, यानी अपना पारले-जी बिस्कुट, दरअसल आजादी की एक ऐसी जंग की निशानी है जिसका जिक्र इतिहास की किताबों में कम ही मिलता है। यह कहानी सिर्फ स्वाद की नहीं, बल्कि उस दौर की भी है जब बिस्कुट खाना अंग्रेजों का विशेषाधिकार माना जाता था और एक भारतीय परिवार ने इसी सोच को चुनौती देने की ठान ली।

आजादी की लड़ाई का जिक्र होते ही जेहन में क्रांतिकारियों, नारों और जुलूसों की तस्वीरें उभरती हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में उन कारोबारियों का जिक्र अक्सर कहीं खो जाता है, जिन्होंने अपनी जमा पूंजी दांव पर लगाकर स्वदेशी को हथियार बनाया। इसी गुमनाम संघर्ष को सामने लाने के लिए 'स्वदेशी का स्वैग' नाम से एक सीरीज शुरू की जा रही है, और इसकी पहली कड़ी पारले जी की उसी कहानी को समर्पित है, जो आजादी मिलने से पूरे 18 साल पहले शुरू हुई थी।

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बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में चला स्वदेशी आंदोलन विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और भारतीय उत्पादों को अपनाने पर जोर देता था। कपड़े से लेकर रोजमर्रा के सामान तक, हर क्षेत्र में स्वदेशी विकल्प खड़ा करने की कोशिशें हो रही थीं। इसी माहौल में मोहनलाल दयाल जैसे कारोबारियों ने खाने पीने के सामान को भी इस मोर्चे में शामिल करने की ठानी।

कैंडी से शुरू हुआ किस्सा

पारले ब्रांड की नींव रखने वाले मोहनलाल दयाल ने अपने सफर की शुरुआत बिस्कुट से नहीं बल्कि कैंडी से की थी। साल 1929 में जब उन्होंने अपनी पहली फैक्ट्री लगाई, तब देश में स्वदेशी आंदोलन जोरों पर था और मोहनलाल इससे गहरे प्रभावित हुए। उस दौर में कैंडी का स्वाद ज्यादातर विदेश से आयातित मिठाइयों तक सीमित था, और आम भारतीय के लिए यह स्वाद चखना किसी सपने से कम नहीं था। मोहनलाल ने ठान लिया कि यह मिठास अब भारत में ही बनेगी। इसके लिए वह जर्मनी गए और वहां से करीब ₹60,000 खर्च कर कैंडी बनाने की एक मशीन खरीद लाए। मुंबई के एक पुराने कारखाने से महज 12 कर्मचारियों के साथ यह सफर शुरू हुआ, और खास बात यह रही कि ये 12 लोग कोई बाहरी कामगार नहीं बल्कि मोहनलाल के अपने घर के सदस्य थे। जल्द ही कंपनी ने नारंगी रंग की कैंडी बाजार में उतारी, जिसने आम भारतीयों की जुबान पर अपनी मिठास घोल दी।

फैक्ट्री की लोकेशन से पड़ा पारले नाम

यह फैक्ट्री मुंबई के इरला और पार्ला इलाके में लगाई गई थी। जब ब्रांड का नाम तय करने की बारी आई, तो मोहनलाल ने फैक्ट्री की इसी लोकेशन से प्रेरणा ली और अपने ब्रांड को नाम दिया पार्ले। आगे चलकर यही नाम भारत के सबसे भरोसेमंद बिस्कुट ब्रांड की पहचान बन गया।

जब बिस्कुट बना अंग्रेजों को जवाब

कैंडी से मिली शुरुआती कामयाबी के बाद मोहनलाल की असली लड़ाई अब अंग्रेजी बिस्कुट ब्रांडों से थी। उस दौर में देश में बिकने वाला ज्यादातर बिस्कुट विदेश से आयात होता था और इसकी कीमत आम आदमी की पहुंच से बाहर होती थी। मानो यह एक अघोषित नियम था कि बिस्कुट खाना सिर्फ अंग्रेजों का हक है। यही बात मोहनलाल को नागवार गुजरी, और उन्होंने साल 1939 में बिस्कुट बनाने का फैसला ले लिया, यानी आजादी मिलने से ठीक 8 साल पहले। कंपनी ने बाजार में उतारा पारले ग्लूकोज बिस्कुट, जिसका स्वाद लाजवाब था और कीमत बेहद कम। अंग्रेजों के महंगे बिस्कुट के मुकाबले यह सस्ता और स्वादिष्ट विकल्प देखते ही देखते पूरे देश की जुबान पर चढ़ गया। उस समय बाजार में यूनाइटेड बिस्कुट्स, हंटली एंड पामर्स, ब्रिटानिया और ग्लैक्सो जैसे ब्रिटिश ब्रांडों का दबदबा था, लेकिन पार्ले ने अपनी कम कीमत और बेहतर क्वालिटी के दम पर इन दिग्गजों को कड़ी टक्कर देनी शुरू कर दी।

विश्व युद्ध ने बदल दी किस्मत

साल 1939 से 1945 के बीच चले दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटेन को अपनी सेनाओं के लिए भारी मात्रा में संसाधन जुटाने पड़े, और सैनिकों को ऊर्जा देने वाले ग्लूकोज बिस्कुट की मांग तेजी से बढ़ी। पारले जी को जिस मुकाम की तलाश थी, वह उसे इसी दौर में मिला। गेहूं से बना यह ग्लूकोज बिस्कुट अपने स्वाद और किफायती दाम के चलते पहले ही मशहूर हो चुका था, और युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना को इसी बिस्कुट की सप्लाई शुरू कर दी गई। सेना तक पहुंच बनते ही पारले जी की साख देशभर में और मजबूत हो गई। इसी कामयाबी ने बिस्कुट बनाने वाली ब्रिटिश कंपनियों के पैरों तले जमीन खिसका दी और भारतीय बाजार में उनकी पकड़ धीरे धीरे ढीली पड़ने लगी।

आज 50 से ज्यादा देशों में पहचान

जो कंपनी कभी मुंबई की एक छोटी सी फैक्ट्री और 12 पारिवारिक सदस्यों के साथ शुरू हुई थी, उसका कारोबार आज 50 से अधिक देशों तक फैल चुका है। आज करोड़ों भारतीय हर सुबह चाय की चुस्की के साथ इसी बिस्कुट का स्वाद लेते हैं, भले ही उनमें से ज्यादातर को इसके संघर्ष भरे इतिहास के बारे में पता न हो। पारले जी सिर्फ एक बिस्कुट नहीं, बल्कि भारत की उस स्वदेशी सोच की मिसाल है, जिसने अंग्रेजों को उन्हीं के व्यापार के मैदान में मात दी।

सवाल-जवाब

पारले-जी बिस्कुट की शुरुआत कब हुई थी?
इसकी शुरुआत 1929 में कैंडी फैक्ट्री के तौर पर हुई थी, जबकि बिस्कुट बनाने का फैसला 1939 में लिया गया।
पारले-जी नाम कैसे पड़ा?
फैक्ट्री मुंबई के इरला और पार्ला इलाके में लगी थी, इसी लोकेशन से प्रेरणा लेकर ब्रांड का नाम पार्ले रखा गया।
कंपनी के संस्थापक कौन थे?
पारले ब्रांड की नींव मोहनलाल दयाल ने रखी थी।
शुरुआत में फैक्ट्री में कितने कर्मचारी थे?
शुरुआत में सिर्फ 12 कर्मचारी थे, और वे सभी मोहनलाल के अपने परिवार के सदस्य थे।
कैंडी बनाने वाली मशीन कहां से और कितने में खरीदी गई थी?
यह मशीन जर्मनी से करीब ₹60,000 खर्च कर खरीदी गई थी।
पारले-जी बिस्कुट को असली सफलता कब मिली?
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, जब ब्रिटिश भारतीय सेना को इसके ग्लूकोज बिस्कुट की सप्लाई शुरू हुई।
पारले-जी ने किन ब्रिटिश ब्रांड्स को टक्कर दी थी?
यूनाइटेड बिस्कुट्स, हंटली एंड पामर्स, ब्रिटानिया और ग्लैक्सो जैसे ब्रिटिश ब्रांडों को।
आज पारले-जी का कारोबार कहां तक फैला हुआ है?
आज इसका कारोबार 50 से अधिक देशों तक फैल चुका है।
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