झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली रेशमा ने पारंपरिक परिधानों की दुनिया में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान बनाई है। उन्होंने कपड़ों के एक ऐसे मेल को चुना जो आम तौर पर देखने को नहीं मिलता। झारखंड का पारंपरिक तसर सिल्क और लखनऊ की मशहूर चिकनकारी कला को एक साथ लाकर उन्होंने महिलाओं के लिए खास सलवार सूट और कुर्तियां तैयार करना शुरू किया। उनकी यह रचनात्मक सोच आज एक मजबूत और आत्मनिर्भर पहचान में तब्दील हो चुकी है।
तसर सिल्क और चिकनकारी का अनूठा तालमेल
रेशमा के इस काम की सबसे बड़ी खूबी कपड़ों का यह खास संयोजन है। तसर सिल्क के कपड़े पर कुशल कारीगरों की मदद से चिकनकारी की बारीक कढ़ाई करवाई जाती है। इस तरह का संयोजन बाजार में बहुत दुर्लभ है, क्योंकि तसर सिल्क की अपनी एक अनूठी बनावट होती है और उस पर चिकनकारी का बारीक काम काफी धैर्य और हुनर मांगता है। डिजाइनों की परिकल्पना से लेकर पूरे काम की निगरानी तक रेशमा खुद अपने हाथों से करती हैं।
हाथ का हुनर, 25 दिन की मेहनत और 25000 तक की कीमत
इस कारोबार की सबसे अहम विशेषता इसकी प्रमाणिकता और पूरी तरह हस्तनिर्मित प्रक्रिया है। इन परिधानों को तैयार करने में किसी भी तरह की मशीन का इस्तेमाल नहीं होता। सलवार सूट को सिलने से लेकर उसके ऊपर की जाने वाली कढ़ाई तक सारा काम हाथों से ही संपन्न किया जाता है। एक सूट को मुकम्मल रूप देने में लगभग 25 दिन का वक्त लग जाता है और इसे बनाने में 4 से 5 कारीगर मिलकर मेहनत करते हैं।
इतनी बारीक कारीगरी और लंबे समय की मेहनत के चलते इन सूटों की कीमत 5000 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक होती है, जबकि सबसे खास और विस्तृत काम वाले सूट की कीमत 25000 रुपये तक पहुंच जाती है। इसके अलावा रेशमा साधारण चिकनकारी के विकल्प भी उपलब्ध कराती हैं, जिसमें ग्राहकों को 25 से 30 रंगों के विकल्प मिलते हैं। ग्राहक अपनी पसंद का जो भी रंग चाहते हैं, वह तैयार किया जाता है क्योंकि डिजाइनिंग और रंगाई का काम भी वे खुद संभालती हैं।
गुणवत्ता पर भरोसा और बड़े शहरों तक विस्तार
रेशमा का स्पष्ट मानना था कि कारोबार भले ही सीमित संख्या में हो, लेकिन वह पूरी तरह ओरिजिनल और उच्च गुणवत्ता वाला होना चाहिए। उनकी सोच थी कि चाहे केवल दो ही पीस बिकें, लेकिन वे इतने शानदार होने चाहिए कि खरीदार को अपनी पसंद पर गर्व हो। इसी सोच का नतीजा है कि आज दक्षिण भारत के बड़े शहरों जैसे बेंगलुरु और चेन्नई से भी उनके पास लगातार आर्डर आ रहे हैं।
आज 47 साल की उम्र में रेशमा पूरी तरह अपने पैरों पर खड़ी हैं। हालांकि वे पहले भी अपने परिवार और पति के सहयोग से स्वतंत्र थीं, लेकिन अपने दम पर कारोबार खड़ा करने और आत्मनिर्भर बनने का अनुभव उनके लिए बिल्कुल नया और संतोषजनक है। अब उन्हें काम के सिलसिले में बाहर जाने का अवसर मिलता है और वे देश के बड़े शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में शामिल होकर अपने उत्पादों का प्रदर्शन और विपणन खुद करती हैं।



















