अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर भारतीय खिलाड़ियों की लगन और अनुशासन का लोहा एक बार फिर साबित हुआ है। किर्गिस्तान में 8 से 12 सितंबर तक आयोजित की गई वर्ल्ड स्ट्रेंथ लिफ्टिंग चैंपियनशिप में जयपुर जिले के लालचंदपुरा गांव के एथलीट पवन कुमावत ने बेहतरीन खेल दिखाते हुए देश की झोली में सिल्वर मेडल डाला। 85 किलो पुरुष भारवर्ग में उतरे पवन ने मजबूत प्रतिद्वंद्वियों के बीच अपनी शारीरिक क्षमता, मानसिक मजबूती और तकनीकी कुशलता का उम्दा परिचय दिया। इस अंतरराष्ट्रीय सफलता से उनके गृह क्षेत्र लालचंदपुरा सहित पूरे राजस्थान और खेल जगत में खुशी की लहर दौड़ गई है।
120 किलो वजन उठाकर इंक्लाइन बेंच प्रेस में जमाई धाक
प्रतियोगिता के तकनीकी पहलुओं और पवन के प्रदर्शन के बारे में राजस्थान स्ट्रेंथ लिफ्टिंग एसोसिएशन के सचिव चंद्रेश सोनी ने विवरण साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पवन कुमावत ने प्रतियोगिता की चुनौतीपूर्ण इंक्लाइन बेंच प्रेस स्पर्धा में अपनी ताकत का शानदार प्रदर्शन किया। इस इवेंट में पवन ने पूरे संतुलन के साथ 120 किलो भार उठाया और मुकाबले में दूसरा स्थान हासिल करते हुए रजत पदक पक्का किया। लंबे समय से चल रहे कड़े अभ्यास और अनुशासन के दम पर हासिल किए गए इस मुकाम के बाद साथी खिलाड़ियों, खेल अधिकारियों और प्रशंसकों ने पवन को इस बड़ी उपलब्धि के लिए शुभकामनाएं दी हैं।
थाईलैंड की असफलता से ली सीख और बदला खेल का नतीजा
पवन कुमावत के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह जीत केवल एक पदक नहीं, बल्कि पुरानी असफलता से उबरने की मजबूत मिसाल भी है। पवन ने बताया कि इससे पहले थाईलैंड में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान वे अपने मनमुताबिक परिणाम हासिल नहीं कर सके थे और उन्हें निराशा झेलनी पड़ी थी। उस असफलता से विचलित होने के बजाय उन्होंने अपनी कमियों का विश्लेषण किया और नियमित प्रशिक्षण में दोगुना पसीना बहाया। अपनी उस पिछली सीख को मजबूत आधार बनाकर पवन ने किर्गिस्तान में दमदार वापसी की और पिछली हार के दर्द को इस बार चमकदार सिल्वर मेडल में तब्दील कर दिया। अब उनका अगला स्पष्ट लक्ष्य आगामी प्रतियोगिताओं में इस रजत पदक को गोल्ड मेडल में बदलना है, जिसके लिए वे निरंतर कठोर अभ्यास जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
एक दशक का अंतरराष्ट्रीय सफर और परिवार का निरंतर संबल
भारतीय स्ट्रेंथ लिफ्टिंग परिदृश्य में पवन कुमावत एक मंझे हुए खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। वे पिछले करीब 10 साल से भारतीय टीम का अटूट हिस्सा रहे हैं और इस दौरान विभिन्न वेट कैटेगरी में भारत के लिए दर्जनों पदक अपने नाम कर चुके हैं। पवन ने अपनी इस सतत यात्रा का श्रेय अपने कोच पुष्पेन्द्र सिंह राठौड़ के मार्गदर्शन और माता-पिता के त्याग को दिया है। उनके पिता जगदीश प्रसाद और माता नान्छी देवी ने हर परिस्थिति में उनका मनोबल बढ़ाया। पवन के अनुसार परिवार के अटूट विश्वास और कोच के सटीक दिशा-निर्देशों ने ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बेहतर करने और देश का प्रतिनिधित्व करने की ताकत दी है।
जयपुर वापसी पर हुआ भव्य और आत्मीय अभिनंदन
किर्गिस्तान के वैश्विक मंच पर तिरंगा लहराने के उपरांत पवन कुमावत 14 सितंबर को जयपुर लौटे। उनके आगमन की खबर मिलते ही लालचंदपुरा गांव और समीपवर्ती क्षेत्रों के निवासियों में अपार उत्साह देखने को मिला। ग्रामीणों, स्थानीय गणमान्य नागरिकों और भारी संख्या में मौजूद खेल प्रेमियों ने उनका आत्मीय और भव्य स्वागत किया। उपस्थित जनसमूह ने कहा कि पवन की यह अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पूरे क्षेत्र के युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी और उन्होंने अपने गांव का नाम दुनिया भर में गौरवान्वित किया है।



















