हैदराबाद के बाचुपल्ली इलाके में स्थित एक छोटी सी कार्यशाला इन दिनों दुनिया भर के कलम प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां लेथ मशीनों की निरंतर आवाजों के बीच कुशल हाथों से ऐसे फाउंटेन पेन तराशे जाते हैं, जो कई पीढ़ियों तक साथ निभाने का माद्दा रखते हैं। पीएलपी हैंडमेड पेन्स के संस्थापक पूना लक्ष्मीपति पिछले 55 से अधिक वर्षों से कलम निर्माण की इस बारीक कला में सक्रिय हैं। अपने शुरुआती दौर में वे अन्य स्थापित कंपनियों के लिए पेनों का निर्माण करते थे। समय के साथ उन्होंने अपने समृद्ध अनुभव को एक स्वतंत्र पहचान देने का फैसला किया और अपने बेटे पूना सतीश कुमार के साथ मिलकर अपने खुद के ब्रांड पीएलपी की नींव रखी। आज यह उपक्रम भारतीय हस्तकला की बारीकी को वैश्विक पटल पर मजबूती से स्थापित कर रहा है।
उत्कृष्ट कच्चा माल और हाथ से तराशने की प्रक्रिया
इन अनूठी कलमों के निर्माण में उच्च गुणवत्ता वाले एबोनाइट और ऐक्रेलिक कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है। कारखाने के भीतर पूरी उत्पादन प्रक्रिया बेहद सावधानी और मानवीय नियंत्रण के तहत संचालित होती है। सबसे पहले रॉ रॉड्स को सटीक नाप में काटा जाता है। इसके बाद लेथ मशीन के जरिए थ्रेडिंग, शेपिंग और पूरी बॉडी को आकार देने का काम कारीगरों के हाथों से ही पूरा किया जाता है। पेन का ढांचा तैयार होने के बाद उसकी सतह को चिकना बनाने और बेहतरीन फिनिशिंग प्रदान करने के लिए खास पॉलिशिंग तकनीक अपनाई जाती है, जिससे कलम को एक प्रीमियम स्पर्श मिलता है।
किफायती दाम में अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनावट
लिखावट के दौरान स्याही के सुचारू प्रवाह के लिए इन कलमों में आईड्रॉपर और आधुनिक कनवर्टर दोनों तरह की प्रणालियां प्रदान की जाती हैं। सुगम और सहज हैंडराइटिंग का अनुभव देने के मकसद से इनमें नंबर 5 और नंबर 6 आकार की प्रीमियम निब्स लगाई जाती हैं, जो कागज पर चलने वाले हर शब्द को स्पष्ट और सुंदर बनाती हैं। वैश्विक बाजार में जहां मोंट ब्लांक जैसे लग्जरी ब्रांड्स के कस्टमाइज्ड पेन लाखों रुपयों की कीमत में बेचे जाते हैं, वहीं हैदराबाद में तैयार ये टिकाऊ पेन 1,500 से 5,600 रुपए की शुरुआती कीमत में उपलब्ध हो जाते हैं। इसके साथ ही ग्राहकों की सहूलियत के लिए मात्र 75 रुपए में खास फाउंटेन इंक भी उपलब्ध कराई जाती है।
आधी सदी तक की मजबूती और दुनिया भर से मांग
इन हैंडमेड पेनों की सबसे बड़ी खासियत इनका असाधारण टिकाऊपन है। निर्माताओं के अनुसार, एक बार खरीदी गई यह कलम बिना किसी बड़ी तकनीकी खराबी के 50 साल या उससे भी अधिक समय तक लगातार काम कर सकती है। बाचुपल्ली से निकला यह देसी शिल्प अब भारत की सीमाओं को पार कर चुका है। डिजिटल दौर में टाइपिंग के बढ़ते चलन के बावजूद हाथ की लिखावट और पारंपरिक शिल्प के प्रति लोगों की दीवानगी कम नहीं हुई है। आज पीएलपी को अमेरिका, जर्मनी, समूचे यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों से ऑनलाइन माध्यम के जरिए लगातार ऑर्डर्स मिल रहे हैं, जो भारतीय कारीगरी की मजबूती को प्रमाणित करते हैं।


















