बिहार के ग्रामीण अंचल में स्वरोजगार के प्रयासों ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर बड़ा बदलाव लाना शुरू कर दिया है। शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड अंतर्गत खलीलचक गांव में रहने वाले एक दंपती ने सरकारी योजना का लाभ उठाकर खाद्य उत्पादन क्षेत्र में एक सफल मिसाल कायम की है। संजय कुमार और उनकी जीवनसंगिनी रंजना कुमारी ने विपरीत पारिवारिक परिस्थितियों के बीच नूडल्स तैयार करने का एक छोटा कारखाना स्थापित किया। आज इस निर्माण इकाई के जरिए वे अपने क्षेत्र के 10 जरूरतमंद महिला और पुरुष कामगारों को नियमित काम उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे ग्रामीण स्तर पर ही लोगों को आत्मनिर्भरता की राह मिली है।
घरेलू तंगहाली से उद्यम स्थापना तक का सफर
कुछ समय पहले तक इस परिवार की माली हालत काफी चिंताजनक दौर से गुजर रही थी। लगातार बढ़ती घरेलू जरूरतों और बच्चों की स्कूल फीस का भुगतान करने में रोजमर्रा की दिक्कतें पेश आ रही थीं। रंजना कुमारी उस दौर में केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित थीं, मगर वे लगातार किसी ऐसे स्वतंत्र काम की तलाश में थीं जिससे आमदनी का जरिया बन सके। इसी दौरान उन्हें केंद्र सरकार द्वारा संचालित सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम से जुड़ी योजना की जानकारी हासिल हुई। कागजी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उन्हें वित्तीय और तकनीकी मदद स्वीकृत हुई, जिससे संयंत्र लगाने का रास्ता साफ हुआ।
रंजना कुमारी के मुताबिक, सरकारी मदद के बिना उनके लिए इस तरह के निर्माण संयंत्र की परिकल्पना करना भी मुमकिन नहीं था। उन्होंने बताया कि इस पहल ने उन्हें समाज में एक नई पहचान दी है और आज वे अपने पूरे परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को मजबूती से निभा रही हैं। उद्यम के मुनाफे से बच्चों की उच्च शिक्षा की राह आसान हुई और उनकी बेटी अपनी पढ़ाई पूरी करके आत्मनिर्भर बन चुकी है।
मशीनों की स्थापना और क्षेत्रीय बाजारों तक पहुंच
योजना के तहत मिली पूंजी से कारखाने में आधुनिक मशीनें स्थापित की गईं और स्मृति नूडल्स नाम से उत्पादन की शुरुआत हुई। कारखाने के प्रबंधन में हाथ बंटाने वाले संजय कुमार बताते हैं कि शुरुआत में संसाधनों की कमी सबसे बड़ी रुकावट थी, लेकिन सरकारी मदद ने राह आसान बना दी। उत्पादन शुरू होने के बाद उत्पाद की गुणवत्ता के चलते आसपास के बाजारों में मांग तेजी से बढ़ने लगी।
वर्तमान में इस ग्रामीण कारखाने में बने नूडल्स की आपूर्ति शेखपुरा के अलावा नालंदा, नवादा और राजगीर के थोक एवं खुदरा बाजारों में की जा रही है। लगातार मिल रहे आर्डर को देखते हुए दंपती अब उत्पादन क्षमता बढ़ाने और अतिरिक्त कामगारों को जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं ताकि क्षेत्रीय स्तर पर और लोगों को रोजगार मिल सके।
पलायन रोकने में मददगार बनी स्थानीय इकाई
इस निर्माण इकाई ने गांव के युवाओं को घर के करीब ही काम करने का बेहतरीन विकल्प दिया है। कारखाने में काम कर रहे देवानंद कुमार पहले आजीविका कमाने के लिए उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में रहकर नौकरी करते थे। अपने गांव के पास ही सम्मानजनक काम मिलने से वे अब अपने घर लौट आए हैं। देवानंद का कहना है कि घर के निकट रोजगार मिलने से रोजमर्रा का जीवन काफी सुगम हो गया है और वे जल्द ही अपने पूरे परिवार को वापस गांव में ही बसाने की तैयारी कर रहे हैं।



















