बिहार के ग्रामीण अंचलों में कृषि के साथ-साथ पशुपालन की परंपरा काफी पुरानी और मजबूत रही है। गांवों में दुधारू मवेशी रखना केवल दूध की घरेलू जरूरत पूरी करने का जरिया नहीं रहा, बल्कि खाद के लिए गोबर और जुताई के लिए बैलों का उपयोग भी सदियों से होता रहा है। वक्त के साथ अब पशुपालन पारंपरिक ढर्रे से निकलकर एक संगठित और लाभदायक व्यवसाय का रूप ले चुका है। जहानाबाद जिले के कई किसान और युवा इसे आजीविका का मुख्य माध्यम बनाकर बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं।
आठवीं पास अरविंद ने तलाशा स्वरोजगार का रास्ता
जहानाबाद जिले के घोसी प्रखंड अंतर्गत साहोबिगहा ज्ञानगढ़ मठ गांव के रहने वाले अरविंद कुमार इस बदलाव का एक सटीक उदाहरण हैं। अरविंद सिर्फ आठवीं कक्षा तक पढ़े हैं और अपनी कम शैक्षणिक योग्यता के कारण नौकरी की तलाश में अक्सर चुनौतियों का सामना करते थे। उन्होंने गांव से बाहर जाने या हताश होने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही कुछ नया शुरू करने का मन बनाया। वर्ष 2024 में उन्होंने केवल 2 गायों के साथ डेयरी व्यवसाय की शुरुआत की।
सरकारी योजना बनी टर्निंग पॉइंट
शुरुआती दौर में अरविंद ने पूरी लगन के साथ दोनों गायों की देखभाल की और डेयरी के कामकाज की बारीकियां सीखीं। लगभग एक साल तक जमीनी स्तर पर कड़ी मेहनत करने के बाद उन्हें जिला पशुपालन कार्यालय के गव्य विकास प्रभाग में चल रही एक सरकारी योजना के बारे में पता चला। अरविंद ने तुरंत गव्य विकास कार्यालय जाकर योजना से जुड़ी सभी शर्तें समझीं और आवेदन पत्र जमा कर दिया। उनका आवेदन स्वीकृत हुआ और योजना के सहयोग से उनके फार्म में गायों की संख्या बढ़कर 15 तक पहुंच गई।
प्रतिदिन एक क्विंटल से अधिक दूध का उत्पादन
मौजूदा समय में अरविंद के पास कई उन्नत नस्ल की दुधारू गायें हैं। इनमें से एक-दो गायों की बाजार कीमत 1 लाख रुपये से भी अधिक है। नस्ल सुधार और बेहतर रखरखाव के चलते उनके फार्म से रोजाना 100 किलोग्राम यानी एक क्विंटल से अधिक दूध का उत्पादन हो रहा है। इस दूध की नियमित बिक्री से उन्हें हर दिन अच्छी खासी आमदनी हो रही है, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।
गांव में रहकर ही मिली पहचान और स्वावलंबन
अरविंद बताते हैं कि कम पढ़ा-लिखा होने की वजह से भविष्य को लेकर हमेशा चिंता रहती थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने कहा कि 15 गायों से हर दिन 100 किलो से अधिक दूध की आपूर्ति हो रही है, जिससे उन्हें बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ी और गांव में ही सम्मानजनक कमाई हो रही है। उनका मानना है कि सही योजना, सरकारी सहयोग और अटूट मेहनत के बल पर कोई भी व्यक्ति अपनी परिस्थिति बदल सकता है।



















