झुंझुनूं जिले में अपनी एक अलग ही पहचान बना चुके दिल्ली पुलिस के सेवानिवृत्त एसआई जगदीशप्रसाद झाझड़िया इन दिनों अपने सामाजिक सरोकारों के चलते खासे चर्चा में हैं। पुलिस विभाग की नौकरी पूरी करने के बाद उन्होंने अपने जीवन का एक ही मकसद बना लिया है और वह है समाज के उत्थान और जरूरतमंदों की मदद के लिए खुद को पूरी तरह समर्पित कर देना। वे पिछले कई वर्षों से लगातार बुजुर्गों की देखभाल, असहाय लोगों की सहायता और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास से जुड़े विभिन्न कार्यों में सक्रिय रूप से अपना योगदान दे रहे हैं। बुजुर्ग माता-पिता और अपने परिजनों की सेवा करने वाले लोगों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने अनूठी पहल करते हुए श्रवण पुरस्कार की शुरुआत की है। इस योजना के तहत ऐसे सेवाभावी लोगों को 10 ग्राम का चांदी का सिक्का और एक प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया जाता है, ताकि समाज में एक सकारात्मक संदेश जा सके।
इस अनूठे श्रवण पुरस्कार की स्थापना के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प और सोचने पर मजबूर कर देने वाली कहानी जुड़ी है। करीब नौ साल पहले जब वे अपनी पुलिस सेवा पूरी करने के बाद अपने पैतृक गांव लौटे, तो उन्होंने आसपास की युवा पीढ़ी में बुजुर्गों के प्रति लगातार कम होते सम्मान और उपेक्षा की भावना को बहुत गहराई से महसूस किया। इस तरह के बर्ताव ने उनके मन को काफी ठेस पहुंचाई और उन्होंने तभी यह दृढ़ संकल्प ले लिया कि जो लोग आज के दौर में भी अपने बीमार, बुजुर्ग या असहाय माता-पिता और परिजनों की बिना किसी स्वार्थ के पूरी निष्ठा से सेवा कर रहे हैं, उन्हें समाज के सामने लाकर सम्मानित किया जाएगा।
इसी नेक सोच को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2025 में कुल सात गांवों के सात आदर्श पुत्र और पुत्रवधुओं को इस प्रतिष्ठित श्रवण पुरस्कार से नवाजा गया था। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस वर्ष उन्होंने आठ और ऐसे समर्पित लोगों को यह सम्मान प्रदान किया है। अब जगदीशप्रसाद ने आने वाले वर्ष 2027 के लिए एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसके तहत वे कुल 100 लोगों को श्रवण पुरस्कार से सम्मानित करने की योजना बना रहे हैं। उनका पूरा विश्वास है कि इस तरह के सार्वजनिक सम्मान से समाज में बुजुर्गों की सेवा के प्रति एक नई सकारात्मक सोच मजबूत होगी और आने वाली युवा पीढ़ी भी अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से समझेगी।
हालांकि, जगदीशप्रसाद की समाजसेवा का दायरा केवल श्रवण पुरस्कार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने अन्य कई क्षेत्रों में भी बड़े स्तर पर काम किया है। उन्होंने वर्ष 2018 में अपने सामाजिक कार्यों की शुरुआत करते हुए एक ऐसा अभियान चलाया जिसके तहत 100 फीट से अधिक ऊंचा तिरंगा स्थापित कराया गया। इसके बाद उन्होंने करीब 40 गांवों के सरकारी स्कूलों में 40 से 60 फीट ऊंचे तिरंगे लगवाने का बीड़ा उठाया। इनमें से कई तिरंगे उन्होंने अपनी देखरेख में स्वयं स्थापित करवाए, जबकि कुछ अन्य स्थानों पर स्थानीय भामाशाहों के आर्थिक सहयोग से इस कार्य को पूरा किया गया। उनका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण बच्चों के दिलों में देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति की भावना को और अधिक मजबूत करना था। इसी महान कार्य की बदौलत उन्हें पूरे इलाके में तिरंगा मैन के नाम से जाना जाने लगा और उनकी यह पहचान दूर-दूर तक फैल गई।
नौकरी से सेवानिवृत्ति के समय मिली आर्थिक राशि का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्होंने पूरी तरह से समाजहित के कार्यों में ही लगा दिया। अक्टूबर 2018 से मार्च 2019 के बीच जखोड़ा गांव में एक खेल स्टेडियम का निर्माण कराया गया, जिसमें उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर दी। इस स्टेडियम के भीतर बाउंड्रीवॉल का निर्माण, रनिंग ट्रैक और खेलकूद से जुड़ी अन्य जरूरी बुनियादी सुविधाएं विकसित कराई गईं। इसके अलावा स्थानीय मोक्षधामों में शवों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्लेटफॉर्म बनवाए गए। मंड्रेला उपतहसील कार्यालय के ठीक बाहर, धतरावाला और जखोड़ा के अस्पतालों के बाहर यात्रियों की सुविधा के लिए बस स्टैंड का निर्माण कराया गया, और साथ ही बुडानिया में भी एक बस स्टैंड बनवाया गया। सरकारी स्कूलों, शहीद स्मारकों और आयुर्वेदिक अस्पतालों में भी विकास कार्य कराए गए।
अपनी इन तमाम सामाजिक गतिविधियों के बारे में बात करते हुए जगदीशप्रसाद बताते हैं कि उन्होंने इन कार्यों को गति देने के लिए अपनी पेंशन और खेती से होने वाली आय को मुख्य जरिया बनाया है। रिटायरमेंट के वक्त मिली राशि के साथ-साथ वर्ष 2018 से लेकर अब तक वे अपनी पेंशन और कृषि आमदनी का एक बड़ा हिस्सा लगातार समाज के भले के लिए खर्च करते आ रहे हैं। उन्होंने यह भी साझा किया कि वे अब तक अपने जीवन की कमाई के लगभग 88 लाख रुपए समाजसेवा के इन कामों में लगा चुके हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि धन या पैसा केवल मनुष्य की अपनी व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए नहीं होता है, बल्कि यदि यह समाज के किसी काम आ जाए तो इसका वास्तविक महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है.
उनके मन में तिरंगा लगाने का यह विचार एक छोटी सी घटना के बाद आया था जब उन्होंने रिटायरमेंट के तुरंत बाद अपने घर पर 101 फीट ऊंचा तिरंगा फहराया था। उस समय उनके घर आए एक स्थानीय व्यक्ति ने उस झंडे को देखकर उनसे यह सवाल पूछ लिया था कि यह आखिर किस देवता का झंडा है। वह एक साधारण सा सवाल उनके भीतर तक को झकझोर गया और उन्होंने तभी यह पक्का इरादा कर लिया कि वे गांव-गांव जाकर तिरंगा फहराएंगे। महज तीन साल के भीतर उन्होंने विभिन्न स्कूलों और तहसील स्तर पर 40 फीट से अधिक ऊंचाई वाले करीब 15 तिरंगे लगवा दिए। अब वे इसी राष्ट्रभक्ति और सेवा की भावना को श्रवण पुरस्कार के माध्यम से बुजुर्गों के सम्मान के साथ जोड़ रहे हैं और उनका अगला बड़ा लक्ष्य वर्ष 2027 तक 100 सेवाभावी लोगों को सम्मानित करने का है।



















